भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 23 जनवरी 2024

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण

23 जनवरी 2024


अगली प्रातः हमारा यात्री दल सुबह-सबेरे ही कृष्ण जन्मभूमि मथुरा में दर्शन के लिए पहुँच गया। आज का सारा दिन मथुरा और गोकुलधाम के प्रमुख तीर्थ स्थलों के दर्शन में बीत गया।

मथुरा भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा ज़िले में स्थित एक नगर है। यह भगवान कृष्ण की जन्मस्थली और भारत की प्राचीन नगरी है। हालांकि उत्खनन द्वारा प्राप्त इस नगर के साक्ष्य कुषाण काल के हैं। पुराण कथा के अनुसार शूरसेन देश की यहाँ राजधानी थी। पौराणिक साहित्य में मथुरा को अनेक नामों से संबोधित किया गया है जैसे शूरसेन नगरी, मधुपुरी, मधुनगरी, मधुरा आदि।

भारतवर्ष का वह भाग जो हिमालय और विंध्याचल के बीच में पड़ता है, प्राचीनकाल में आर्यावर्त कहलाता था। यह यमुना नदी के किनारे बसा हुआ है। वाल्मीकि रामायण में मथुरा को मधुपुर या मधु दानव का नगर कहा गया है तथा यहाँ लवणासुर की राजधानी बताई गई है। इस नगरी को मधु दैत्य द्वारा बसाई गई बताया गया है। लवणासुर, जिसे शत्रुघ्न ने युद्ध में हराकर मारा था, इसी मधु दानव का पुत्र था। इससे मधुपुरी या मथुरा के रामायण-काल में बसाए जाने का संकेत मिलता है। रामायण में इस नगरी की समृद्धि का वर्णन है। इस नगरी को लवणासुर ने भी सजाया-संवारा था।

दानव, दैत्य, राक्षस जैसे संबोधन विभिन्न कालों में अनेक अर्थों में प्रयुक्त हुए हैं—कभी जाति या क़बीले के लिए, कभी आर्य-अनार्य सन्दर्भ में, तो कभी दुष्ट प्रकृति के व्यक्तियों के लिए। प्राचीनकाल से अब तक इस नगर का अस्तित्व अखंडित रूप से चला आ रहा है।

भारतवर्ष के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गौरव की आधारशिला इसकी सात महापुरियाँ हैं। गरुड़पुराण में इनके नाम इस क्रम से वर्णित हैं। इनमें मथुरा का स्थान अयोध्या के पश्चात अन्य पुरियों के पहले रखा गया है। पद्मपुराण में मथुरा का महत्व सर्वोपरि मानते हुए कहा गया है कि यद्यपि काशी आदि सभी पुरियाँ मोक्षदायिनी हैं, तथापि मथुरापुरी धन्य है। यह पुरी देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। इसका समर्थन गर्गसंहिता में भी मिलता है, जिसमें इसे पुरियों की रानी, कृष्णापुरी, मथुरा बृजेश्वरी, तीर्थेश्वरी और मोक्ष प्रदायिनी धर्मपुरी कहा गया है।

मथुरा के कुछ प्रमुख दर्शनीय स्थल इस प्रकार से हैं:

1. कृष्ण जन्मभूमि

कृष्ण जन्मभूमि, जिसे कृष्ण जन्मस्थान मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, मल्लापुरा, मथुरा, उत्तर प्रदेश में हिंदू मंदिरों का एक समूह है। ये मंदिर उस स्थान पर स्थित हैं जहाँ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ माना जाता है। जन्मभूमि के निकट ही औरंगज़ेब द्वारा निर्मित एक इमारत भी स्थित है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व से इस स्थान का धार्मिक महत्व रहा है। मुगल शासक औरंगज़ेब ने 1670 में यहाँ के मंदिर को नष्ट कर ईदगाह मस्जिद का निर्माण करवाया। 20वीं शताब्दी में, उद्योगपतियों की आर्थिक मदद से केशवदेव मंदिर, गर्भगृह मंदिर और भागवत भवन जैसे मंदिरों का निर्माण किया गया।

केशवदेव मंदिर

केशवदेव मंदिर का निर्माण रामकृष्ण डालमिया ने अपनी मां जड़ियादेवी डालमिया की स्मृति में करवाया था। मंदिर का निर्माण 29 जून 1957 को शुरू हुआ और 6 सितंबर 1958 को हनुमान प्रसाद पोद्दार द्वारा इसका उद्घाटन किया गया। यह मंदिर शाही ईदगाह के दक्षिण में स्थित है।

गर्भगृह तीर्थ

ऐसा माना जाता है कि शाही ईदगाह का निर्माण मूल मंदिर के सभामंडप पर किया गया था और गर्भगृह को छोड़ दिया गया था। इसे उस जेल की कोठरी का स्थान माना जाता है, जहाँ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ। यहाँ एक संगमरमर का मंडप और भूमिगत जेल प्रकोष्ठ बनाया गया है। इसके निकट योगमाया देवी का मंदिर भी स्थित है।

भागवत भवन

श्रीमद्भागवत पुराण को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 11 फरवरी 1965 को शुरू हुआ और देवताओं की स्थापना का समारोह 12 फरवरी 1982 को आयोजित किया गया। इसमें पाँच मंदिर हैं:

मुख्य मंदिर में राधा-कृष्ण की मूर्तियाँ।• दाहिनी ओर बलराम, सुभद्रा और जगन्नाथ का मंदिर।

बाईं ओर राम, लक्ष्मण और सीता का मंदिर।

दुर्गा और शिवलिंग का मंदिर।भवन की दीवारों और स्तंभों पर कृष्ण और उनके भक्तों के जीवन से जुड़ी घटनाओं के भित्ति चित्र अंकित हैं।

पोतरा कुंड

जन्मस्थान मंदिर के दक्षिण-पूर्व में स्थित पोतरा कुंड, बाल कृष्ण के जन्म के बाद उनके पहले स्नान के लिए प्रयुक्त माना जाता है। इसका निर्माण 1782 में महादजी सिंधिया ने करवाया था और 1850 में उनके वंशजों द्वारा इसे बहाल किया गया।

2. द्वारिकाधीश मंदिर मथुरा

मथुरा का द्वारिकाधीश मंदिर नगर के राजाधिराज बाज़ार में स्थित है। यह मंदिर अपने सांस्कृतिक वैभव, कला और सौंदर्य के लिए अनुपम है। श्रावण के महीने में प्रतिवर्ष यहाँ लाखों श्रद्धालु सोने-चाँदी के हिंडोले देखने आते हैं। मथुरा के विश्राम घाट के निकट असिकुंडा घाट के पास यह मंदिर स्थित है। ग्वालियर राज्य के कोषाध्यक्ष सेठ गोकुल दास पारीख ने इसका निर्माण 1814-15 में प्रारंभ कराया। उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी संपत्ति के उत्तराधिकारी सेठ लक्ष्मीचंद्र ने मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण कराया। वर्ष 1930 में यह मंदिर सेवा-पूजन के लिए पुष्टिमार्ग के आचार्य गिरधरलाल जी कांकरौली वालों को भेंट किया गया। तब से यहाँ पुष्टिमार्गीय पद्धति के अनुसार सेवा-पूजा होती है।

3. मथुरा संग्रहालय

राजकीय संग्रहालय, मथुरा (जिसे आमतौर पर मथुरा संग्रहालय के रूप में जाना जाता है) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा शहर में स्थित एक पुरातात्त्विक संग्रहालय है। इसकी स्थापना 1874 में मथुरा जिले के तत्कालीन कलेक्टर सर एफ.एस. ग्रोसे ने की थी। शुरुआत में इसे “कर्जन पुरातत्व संग्रहालय” और बाद में “पुरातत्व संग्रहालय, मथुरा” के नाम से जाना जाता था। अंत में इसका नाम बदलकर “राजकीय संग्रहालय, मथुरा” कर दिया गया।

संग्रहालय में मुख्य रूप से मथुरा और उसके आसपास की कलाकृतियाँ, मिट्टी के बर्तन, मूर्तियाँ, पेंटिंग और सिक्के संग्रहित हैं। इनमें से कई प्रसिद्ध औपनिवेशिक पुरातत्त्वविदों (जैसे अलेक्जेंडर कनिंघम, एफ.एस. ग्रोसे और फ्यूहरर) द्वारा खोजी गई थीं। यह संग्रहालय तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से 12वीं शताब्दी ईस्वी तक की मथुरा स्कूल की मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध है। आज यह उत्तर प्रदेश के प्रमुख संग्रहालयों में से एक है।

गोकुलधाम तीर्थ

आज से लगभग 5,129 वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के मथुरा में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। गोकुल, मथुरा से 15 किलोमीटर दूर है। यमुना के इस पार मथुरा और उस पार गोकुल स्थित है। मथुरा के बाद गोकुल की यात्रा अवश्य करनी चाहिए।

दुनिया के सबसे नटखट बालक, भगवान कृष्ण ने यहाँ 11 साल, 1 माह और 22 दिन बिताए थे। महावन और गोकुल एक ही स्थान हैं। वर्तमान में 8,000 की आबादी वाला यह गाँव उस समय कैसा रहा होगा, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। शोध के अनुसार, उस काल में इसका नाम गोकुल नहीं था। गो, गोप और गोपियों के समूह के कारण महावन को गोकुल कहा जाने लगा। वर्तमान गोकुल को औरंगजेब के समय श्रीवल्लभाचार्य के पुत्र श्रीविट्ठलनाथ ने बसाया था।

गोकुल से 2 किमी आगे महावन स्थित है। इसे पुरानी गोकुल भी कहा जाता है। यहाँ चौरासी खंभों का मंदिर, नंदेश्वर महादेव, मथुरानाथ और द्वारिकानाथ जैसे मंदिर स्थित हैं। मथुरा में कृष्ण के जन्म के बाद कंस के सभी सैनिकों को नींद आ गई थी और वासुदेव की बेड़ियाँ किसी चमत्कार से खुल गई थीं। तब वासुदेव भगवान कृष्ण को नंदराय के घर गोकुल में छोड़ आए थे। कृष्ण और बलराम का पालन-पोषण यहीं हुआ।

बलराम और कृष्ण अपनी लीलाओं से सभी का मन मोह लेते थे। गोपियाँ नटखट बाल गोपाल को छाछ और माखन का लालच देकर नचाती थीं। कृष्ण ने गोकुल में रहते हुए पूतना, शकटासुर और तृणावर्त जैसे असुरों का वध किया।

गोकुल, भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं का स्थान है। गोकुल में प्रवेश करते ही वह पेड़ दिखाई देता है जहाँ बाल गोपाल बंसी बजाते थे। पास के कुंड में माँ यशोदा और अन्य गोपियाँ कपड़े धोती थीं।

बंसीवट के पास से नंद भवन जाने का रास्ता है। नंद भवन के संगमरमर के फर्श पर उन भक्तों के नाम अंकित हैं जिन्होंने भगवान कृष्ण को अर्पण के लिए दान दिया था। भवन में एक स्थान ऐसा है जहाँ माता यशोदा भगवान कृष्ण को झूले में झुलाती थीं। भवन के तलघर में वह स्थान भी है जहाँ भगवान कृष्ण ने पूतना का वध किया था।

गोकुल में कई अन्य मनोरम स्थल भी हैं, जैसे - गोविंद घाट, गोकुलनाथजी का बाग, बाजनटीला, सिंहपौड़ी, यशोदा घाट और रमणरेती।

तीन धामों की यात्रा के इस अंतिम पड़ाव में, गोकुलधाम में एक भव्य विदाई समारोह आयोजित किया गया। एकता तीर्थ यात्रा संगम सुंदर नगर के संचालक आदरणीय श्री सुरजीत राम शर्मा जी और उनकी टीम का यात्रा दल ने हार्दिक धन्यवाद व्यक्त किया।


लायक राम शर्मा

शिमला

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 21~22 जनवरी 2024

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण

21~22 जनवरी 2024

21 जनवरी को प्रातः हम पुष्कर से वृंदावन के लिए रवाना हुए और सायंकाल को भगवान कृष्ण की लीला स्थली वृंदावन पहुँच गये। अगली प्रातः वृंदावन के सभी प्रमुख मंदिरों में दर्शन किए और यमुना के विभिन्न घाटों पर गए। वृंदावन के कण कण में भगवान कृष्ण की अनुभूति है।

वृन्दावन, भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा ज़िले में स्थित एक महत्वपूर्ण धार्मिक व ऐतिहासिक नगर है। वृन्दावन भगवान श्रीकृष्ण की लीला से जुडा हुआ है। यह स्थान श्री कृष्ण की कुछ अलौकिक बाल लीलाओं का केन्द्र माना जाता है। यहाँ विशाल संख्या में श्री कृष्ण और राधा रानी के मन्दिर हैं। बांके विहारी जी का मंदिर, श्री गरुड़ गोविंद जी का मंदिर व राधावल्लभ लाल जी का, ठा.श्री पर्यावरण बिहारी जी का मंदिर बड़े प्राचीन हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ श्री राधारमण, श्री राधा दामोदर, राधा श्याम सुंदर, गोपीनाथ, गोकुलेश, श्री कृष्ण बलराम मन्दिर, पागलबाबा का मंदिर, रंगनाथ जी का मंदिर, प्रेम मंदिर, श्री कृष्ण प्रणामी मन्दिर, अक्षय पात्र, वैष्णो देवी मंदिर। निधि वन, श्री रामबाग मन्दिर आदि भी दर्शनीय स्थान है।

यह कृष्ण की लीलास्थली है। हरिवंशपुराण, श्रीमद्भागवत, विष्णु पुराण आदि में वृन्दावन की महिमा का वर्णन किया गया है। कालिदास ने इसका उल्लेख रघुवंश में इंदुमती-स्वयंवर के प्रसंग में शूरसेनाधिपति सुषेण का परिचय देते हुए किया है। इससे कालिदास के समय में वृन्दावन के मनोहारी उद्यानों के अस्तित्व का भान होता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार गोकुल से कंस के अत्याचार से बचने के लिए नंदजी कुटुंबियों और सजातीयों के साथ वृन्दावन में निवास के लिए आये थे। विष्णु पुराण में इसी प्रसंग का उल्लेख है। विष्णुपुराण में भी वृन्दावन में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन है।

वर्तमान में टटिया स्थान, निधिवन, सेवाकुंज, मदनटेर, बिहारी जी की बगीची, रामबाग, लता भवन (प्राचीन नाम टेहरी वाला बगीचा) आरक्षित वनी के रूप में दर्शनीय हैं। निधि वन श्री बांके बिहारी जी मन्दिर से करीब में ही है। यहां की मान्यता है कि यहीं भगवान कृष्ण गोपियों संग रास रचाते थे। किंवदंती है कि आज भी रात में रास रचाते हैं।

वृंदावन का जन्म

द्वापरयुग के आरम्भ में जब पृथ्वी पर बहुत पाप बढ़ने लगा तो सभी देवता भगवान के पूर्णावतार वामन रूप के बाये चरण के अंगूठे के नख से फटे ब्रह्माण्ड के ऊपर हुए छिद्र से बाहर निकल कर ( नासा और विज्ञान जिसे ब्लैक होल कहता है) जब ऊपर स्थित गोलोक (गेलेक्सी) में गये तो वहाँ पर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ।

वामपादां गुष्ठनखभिन्न ब्रह्मांडमस्तके ॥श्रीवामनस्यविवरे ब्रह्मद्रवसमाकुले ॥

उसी गोलोक में गोवर्धन पर्वत के संग वृंदावन भी शोभित था, ये सभी ने देखा।

अथदेवगणाः सर्वगोलोकंददृशुः परम् ।। तत्रगोवर्द्धनोनामगिरिराजोविराजते ॥ ३२ ॥ वृन्दावनंभ्राजमानंदिष्यद्रुमलताकुलम् ॥ चित्र- पक्षिमधुत्रातैर्वेशीवटविराजितम् ॥३५

आगे वर्णन आता है कि वही से श्री राधा जी के कहने पर भगवान श्री कृष्ण ने अपने उस धाम से चौरासी कोस की वृजभूमि, गोवर्धन पर्वत और यमुना नदी, इन सब को नीचे पृथ्वी लोक में लीला करने हेतु भेजा। यह वृंदावन वही से आया हुआ वृंदावन है। तभी तो इसकी रज बहुत अमूल्य है। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं कि कभी भी वृंदावन की कण नहीं लानी चाहिए और अगर कोई लाना चाहता है तो उसे उस रज के बराबर का स्वर्ण वहीं पर दान करना चाहिए। वृंदावन के कण-कण में राधामाधव निवास करते हैं, ये यूँ ही नहीं कहा जाता।

वृंदावन का उल्लेख ऋषि श्रीपराशर दारा रचित श्रीविष्णुपुराण में भी बहुत बार किया गया है। इसके अनुसार वहाँ की भूमि काक तथा भास इत्यादि पक्षियों से व्याप्त थी। बगुलों की पंक्तियाँ वहाँ सुशोभित रहती थी। श्रीकृष्ण और बलराम के संग वहाँ पर मयूर और चातकगण सुशोभित रहते थे। गोप और गोपियाँ कदम्ब पुष्पाों से स्वयं का श्रृंगार करते थे।

वृन्दावनमितः स्थानात्तस्माद्गच्छाम मा चिरम् । यावद्भौममहोत्पातदोषो नाभिभवेद्वजम् ॥ २४ ( श्रीविष्णुपुराण, पंचम अंश, अ॰६, श्रीपराशर उचाव, श्लोक स॰२४-५१)

वहाँ पर रह कर भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन-धारण (ग्यारहवाँ अध्याय) इत्यादि बहुत सी लीलाओं को पूर्ण किया। यमुना नदी वहीं पास में ही बहती थी। प्रसिद्ध कालियानाग की लीला भी वहीं यमुना में हुई थी। यही वर्णन श्रीहरिवंशपुराण के विष्णुपर्व के पंचम अध्याय में भी आया है। (श्लोक संख्या १६-२८)

श्री मद् भागवत महापुराण के ग्यारहवें अध्याय में श्री शुकदेव राजा परीक्षित को बताते हैं कि जब श्रीकृष्ण के बाबा नंद ने देखा कि मथुरा में बहुत उत्पात होने लगे हैं तो वे सबको साथ लेकर वृन्दावन महावन जाने का फ़ैसला करते हैं। उन्होंने सुना भी था कि वृन्दावन के पास में एक बहुत बड़ा पर्वत भी है। वहाँ प्रत्येक ऋतु में सुख ही सुख रहता है। गायों के लिए वहाँ चारा भी बहुत है। तो सब लोग नंद बाबा के संग वृन्दावन में आ कर रहने लगे। जहां पर आगे चल कर भगवान श्रीकृष्ण बहुत सी लीलाओं को करते हैं।

प्राचीन वृन्दावन

कहते है कि वर्तमान वृन्दावन असली या प्राचीन वृन्दावन नहीं है। श्रीमद्भागवत के वर्णन तथा अन्य उल्लेखों से जान पड़ता है कि प्राचीन वृन्दावन तो गोवर्धन के निकट कहीं था। यह तब गोवर्धन-धारण की प्रसिद्ध कथा की स्थली वृन्दावन पारसौली (परम रासस्थली) के निकट था। अष्टछाप कवि महाकवि सूरदास इसी ग्राम में दीर्घकाल तक रहे थे। सूरदास जी ने वृन्दावन रज की महिमा के वशीभूत होकर गाया है-हम ना भई वृन्दावन रेणु।

ब्रज का हृदय

वृन्दावन को ‘ब्रज का हृदय’ कहते है जहाँ श्री राधाकृष्ण ने अपनी दिव्य लीलाएँ की हैं। इस पावन भूमि को पृथ्वी का अति उत्तम तथा परम गुप्त भाग कहा गया है। पद्म पुराण में इसे भगवान का साक्षात शरीर, पूर्ण ब्रह्म से सम्पर्क का स्थान तथा सुख का आश्रय बताया गया है। इसी कारण से यह अनादि काल से भक्तों की श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है। चैतन्य महाप्रभु, स्वामी हरिदास, श्री हितहरिवंश, महाप्रभु वल्लभाचार्य आदि अनेक गोस्वामी भक्तों ने इसके वैभव को सजाने और संसार को अनश्वर सम्पति के रूप में प्रस्तुत करने में जीवन लगाया है। यहाँ आनन्दप्रद युगलकिशोर श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा की अद्भुत नित्य विहार लीला होती रहती है।

महाप्रभु चैतन्य का प्रवास

15वीं शती में चैतन्य महाप्रभु ने अपनी ब्रजयात्रा के समय वृन्दावन तथा कृष्ण कथा से संबंधित अन्य स्थानों को अपने अंतर्ज्ञान द्वारा पहचाना था। रासस्थली, वंशीवट से युक्त वृन्दावन सघन वनों में लुप्त हो गया था। कुछ वर्षों के पश्चात शाण्डिल्य एवं भागुरी ऋषि आदि की सहायता से महाप्रभु और उनके शिष्यगणों ने वृन्दावन व ब्रजमण्डल के लीलास्थलियों को पुनः प्रकाशित किया।

वृन्दावन में यमुना के घाट

वृन्दावन में यमुना के किनारे कई घाट हैं। प्रमुख घाटों में से कुछ घाट निम्नलिखित हैं:

1 श्रीवराह घाट

2. कालीयदमन घाट

3. सूर्य घाट

4. युगल घाट

5. श्रृंगार घाट

6. चीर घाट

इनके अलावा अन्य घाट जैसे महन्ताजी घाट, नामावाला घाट, कडिया घाट, धूसर घाट भी

प्रमुख मंदिर

वृन्दावन में बहुत से प्रमुख मंदिर हैं। इनमें कुछ प्रमुख मन्दिर इस प्रकार हैं:

1 बांके बिहारी मन्दिर

2. प्रेम मन्दिर

3. इस्कॉन मन्दिर

4. श्री राधा रमण मन्दिर

5. गोपेश्वर महादेव मन्दिर

6. शाहजी मन्दिर

7. श्री रघुनाथ मन्दिर

वृन्दावन भ्रमण के दौरान इन मन्दिरों को देखना एक अद्वितीय अनुभव होता है। आज पूरा दिन वृन्दावन में भ्रमण किया और रात का विश्राम यहीं किया।

लायक राम शर्मा

शिमला

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 18–20 जनवरी 2024

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण

18–20 जनवरी 2024


भगवान शिव की पावन धरा सोमनाथ से 18 जनवरी को प्रातः हमारा यात्री दल पुष्कर के लिए रवाना हुआ। आज का सारा दिन सफ़र में बीत गया और रात्रि विश्राम रास्ते में किया गया। अगले दिन, 19 जनवरी को प्रातः फिर से यात्रा शुरू हुई और शाम होते-होते हम राजस्थान के पावन स्थल पुष्कर पहुँच गए।

पुष्कर, अजमेर शहर के पास स्थित एक पवित्र नगर है, जो भारतीय राज्य राजस्थान के अजमेर जिले में पुष्कर तहसील का मुख्यालय है। संस्कृत में पुष्कर का अर्थ है “नीले कमल का फूल”। यह अजमेर से लगभग 10 किमी उत्तर-पश्चिम में और जयपुर से लगभग 150 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। यह हिंदुओं और सिखों का तीर्थ स्थल है। पुष्कर में कई मंदिर हैं। पुष्कर के अधिकांश मंदिर और घाट 18वीं शताबदी और उसके बाद के हैं, क्योंकि मुस्लिम विजय के दौरान कई मंदिरों को नष्ट कर दिया गया था, और बाद में इन्हें पुनर्निर्मित किया गया। पुष्कर के मंदिरों में सबसे प्रसिद्ध लाल शिखर वाला ब्रह्मा मंदिर है। इसे हिंदुओं द्वारा विशेष रूप से शक्तिवाद में एक पवित्र शहर माना जाता है। पुष्कर गुरु नानक और गुरु गोबिंद सिंह के गुरुद्वारों के लिए भी महत्वपूर्ण है। स्नान घाटों में से एक को गोविंद घाट कहा जाता है, जिसे सिखों ने गुरु गोबिंद सिंह की याद में बनवाया था।

पुष्कर शहर अपनी झील के लिए प्रसिद्ध है, जिसे पुष्कर झील के नाम से जाना जाता है। झील में 52 घाट हैं और इसके चारों ओर लगभग 400 नीले रंग के मंदिर हैं। यह वातावरण को और अधिक आध्यात्मिक और दिव्य बनाता है, क्योंकि कोई भी मंदिरों से मंत्र सुन सकता है।

पुष्कर अपने वार्षिक मेले (पुष्कर ऊंट मेले) के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसमें मवेशियों, घोड़ों और ऊंटों का व्यापार होता है। यह हिंदू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा को चिह्नित करते हुए शरद ऋतु में सात दिनों तक आयोजित किया जाता है।

ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर (जिसे जगतपिता ब्रह्मा मंदिर भी कहा जाता है) एक हिंदू मंदिर है, जो राजस्थान राज्य के पुष्कर में स्थित है, जो पवित्र पुष्कर झील के पास है। यह मंदिर भारत में हिंदू निर्माता-भगवान ब्रह्मा को समर्पित बहुत कम मौजूदा मंदिरों में से एक है और उनमें से सबसे प्रमुख बना हुआ है। मंदिर की संरचना 14वीं शताब्दी की है, और बाद में इसका आंशिक पुनर्निर्माण किया गया था। यह संगमरमर और पत्थर की पटियों से बना है और इसका शिखर लाल रंग का है, साथ ही इसमें एक हंस पक्षी की आकृति है। मंदिर के गर्भगृह में चार सिर वाले ब्रह्मा और उनकी पत्नी गायत्री (वेदों की देवी) की छवि है। मंदिर का संचालन संन्यासी (तपस्वी) संप्रदाय के पुरोहितों द्वारा किया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा पर ब्रह्मा को समर्पित एक उत्सव आयोजित किया जाता है, जब बड़ी संख्या में तीर्थयात्री पवित्र झील में स्नान करने के बाद मंदिर जाते हैं।

किंवदंती के अनुसार, पुष्कर के बारे में ऐसा माना जाता है कि यह वह स्थान है जहाँ ब्रह्मा ने बहुत लंबे समय तक तपस्या की थी, और इसलिए यह उन दुर्लभ स्थानों में से एक है जहाँ हिंदू निर्माता देवता का मंदिर है। पद्म पुराण के अनुसार, एक बार ब्रह्मा ने पृथ्वी पर जाने का निर्णय लिया और वर्तमान पुष्कर क्षेत्र में पहुँचकर, उन्होंने एक ऐसे वन में प्रवेश किया, जो अनेक वृक्षों और लताओं से भरा हुआ था, अनेक फूलों से सुशोभित था, अनेक पक्षियों के स्वरों से भरा हुआ था, और अनेक जानवरों के समूहों से भरा हुआ था। ब्रह्मा वन और वृक्षों से बहुत प्रसन्न हुए और पुष्कर में एक हज़ार वर्षों तक रहने के बाद उन्होंने ज़मीन पर एक कमल फेंका, जिससे पृथ्वी काँप उठी। देवता भी हिल गए और यह न जानते हुए कि उथल-पुथल का कारण क्या था, वे ब्रह्मा को खोजने गए, लेकिन उन्हें नहीं मिला। विष्णु ने उन्हें झटकों का कारण बताया। बहुत समय बाद सृष्टिकर्ता देवता उन्हें दिखाई दिए और उनसे पूछा कि वे इतने व्यथित क्यों हैं। देवताओं ने उन्हें बताया कि कमल गिरने के कारण उत्पन्न हुए कोलाहल के बारे में और इसका कारण पूछा। ब्रह्मा ने उन्हें बताया कि वज्रनाभ नामक एक राक्षस जो बच्चों के प्राण हर लेता था, देवताओं को मारने के लिए वहाँ प्रतीक्षा कर रहा था, लेकिन ब्रह्मा ने कमल गिराकर उसका विनाश कर दिया। चूँकि उन्होंने कमल वहीं गिराया था, इसलिए उस स्थान को पुष्कर के नाम से जाना जाएगा, जो एक महान और पवित्र स्थान है, जो धार्मिक पुण्य प्रदान करता है।

पुष्कर का उल्लेख रामायण, महाभारत और पुराणों में मिलता है, जो हिंदू धर्म की ऐतिहासिक और धार्मिक परंपरा में इसके महत्व को दर्शाता है। इस शहर का उल्लेख पहली सहस्राब्दी के कई ग्रंथों में मिलता है, हालाँकि ये ग्रंथ ऐतिहासिक नहीं हैं। पुष्कर और अजमेर से संबंधित सबसे पुराने ऐतिहासिक अभिलेख इस्लामी ग्रंथों में पाए जाते हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों पर आक्रमण और विजय का वर्णन करते हैं।

पुष्कर भारत की कुछ सबसे पुरानी भूवैज्ञानिक संरचनाओं के पास स्थित है। खेड़ा और कादेरी के पास माइक्रोलिथ्स से पता चलता है कि यह क्षेत्र प्राचीन काल में बसा हुआ था। इसके पास की अरावली पहाड़ियों में मोहनजोदड़ो शैली की कलाकृतियाँ मिली हैं, लेकिन इनका संबंध स्पष्ट नहीं है, क्योंकि ये वस्तुएं बाद में यहाँ लाई गई होंगी। इसके पास की जगहों पर प्राचीन ब्राह्मी लिपि के शिलालेखों के स्रोत पाए गए हैं, जिन्हें बादली गाँव के पास अशोक से पहले का माना जाता है। स्थानीय उत्खनन में लाल बर्तन और चित्रित ग्रे बर्तन मिले हैं, जो प्राचीन बस्ती के अस्तित्व को पुष्टि करते हैं।

20 जनवरी को पवित्र ब्रह्म सरोवर में स्नान करने के पश्चात हम ब्रह्मा मंदिर गए। यह एक छोटा सा स्थान है, लेकिन यहाँ बहुत सारे मंदिर हैं। यहाँ पर ख़रीदारी के लिए एक अच्छा बाज़ार उपलब्ध है। आज का रात्रि ठहराव पुष्कर में ही था।

लायक राम शर्मा

शिमला

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 17 जनवरी 2024

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण

17 जनवरी 2024

रात्रि विश्राम के पश्चात, सुबह तड़के हम सोमनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए गए। यहाँ पर काफ़ी भीड़ रहती है और दर्शन के लिए काफ़ी समय इंतजार करना पड़ता है। आज सारा दिन हम सोमनाथ के विभिन्न दर्शनीय स्थलों पर गए। यहाँ पर सागर हर समय उफान पर रहता है।

सोमनाथ मंदिर भारतवर्ष के पश्चिमी छोर पर गुजरात में स्थित एक अत्यन्त प्राचीन और ऐतिहासिक शिव मंदिर है। यह भारतीय इतिहास तथा हिन्दुओं के अत्यंत महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है। इसे आज भी भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में माना जाता है। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में स्पष्ट रूप से किया गया है। लोककथाओं के अनुसार, यहीं श्रीकृष्ण ने देहत्याग किया था। इस कारण इस क्षेत्र का महत्त्व और भी बढ़ गया।

यह मंदिर हिन्दू धर्म के उत्थान-पतन के इतिहास का प्रतीक रहा है। अत्यन्त वैभवशाली होने के कारण, इतिहास में कई बार यह मंदिर तोड़ा और पुनर्निर्मित किया गया। वर्तमान भवन के पुनर्निर्माण का आरंभ भारत की स्वतंत्रता के पश्चात लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने करवाया और 1 दिसम्बर 1955 को भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया। सोमनाथ मंदिर विश्व प्रसिद्ध धार्मिक और पर्यटन स्थल है। मंदिर प्रांगण में रात साढ़े सात से साढ़े आठ बजे तक एक घंटे का साउंड एंड लाइट शो चलता है, जिसमें सोमनाथ मंदिर के इतिहास का बड़ा ही सुंदर सचित्र वर्णन किया जाता है।

भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिम में अरब सागर के तट पर स्थित आदि ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ महादेव मंदिर की छटा ही निराली है। यह तीर्थस्थान देश के प्राचीनतम तीर्थस्थानों में से एक है और इसका उल्लेख स्कंद पुराणश्रीमद्‍भागवत गीताशिवपुराण आदि प्राचीन ग्रंथों में भी है। वहीं ऋग्वेद में भी सोमेश्वर महादेव की महिमा का उल्लेख है।यह लिंग शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है।

यह मंदिर गर्भगृहसभामंडप और नृत्यमंडप तीन प्रमुख भागों में विभाजित है। इसका 150 फुट ऊंचा शिखर है। इसके शिखर पर स्थित कलश का भार दस टन है और इसकी ध्वजा 27 फुट ऊंची है। इसके अबाधित समुद्री मार्गत्रिष्टांभ के विषय में ऐसा माना जाता है कि यह समुद्री मार्ग परोक्ष रूप से दक्षिणी ध्रुव में समाप्त होता है। यह हमारे प्राचीन ज्ञान  सूझबूझ का अद्‍भुत साक्ष्य माना जाता है। इस मंदिर का पुनर्निर्माण महारानी अहिल्याबाई ने करवाया था। 

सोमनाथजी के मंदिर की व्यवस्था और संचालन का कार्य सोमनाथ ट्रस्ट के अधीन है। सरकार ने ट्रस्ट को ज़मीन और बाग-बग़ीचों से आय का प्रबंध किया है। यह तीर्थ पितृगणों के श्राद्ध, नारायण बलि आदि कर्मों के लिए भी प्रसिद्ध है। चैत्र, भाद्रपद, और कार्तिक माह में यहाँ श्राद्ध करने का विशेष महत्त्व बताया गया है। इन तीन महीनों में यहाँ श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ लगती है। इसके अलावा, यहाँ तीन नदियाँ—हिरण, कपिला, और सरस्वती का महासंगम होता है। इस त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्त्व है।

प्राचीन हिन्दू ग्रंथों के अनुसार, सोम अर्थात् चन्द्र ने दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं से विवाह किया था। लेकिन उनमें से रोहिणी नामक अपनी पत्नी को अधिक प्यार और सम्मान दिया करता था। इस अन्याय को होते देख क्रोध में आकर दक्ष ने चन्द्रदेव को शाप दे दिया कि अब से हर दिन तुम्हारा तेज (कान्ति, चमक) क्षीण होता रहेगा। फलस्वरूप, हर दूसरे दिन चन्द्र का तेज घटने लगा। शाप से विचलित और दुःखी सोम ने भगवान शिव की आराधना शुरू कर दी। अन्ततः शिव प्रसन्न हुए और सोम-चन्द्र के शाप का निवारण किया। सोम के कष्ट को दूर करने वाले प्रभु शिव का प्रतिष्ठान यहाँ करवाया गया, और उनका नामकरण “सोमनाथ” हुआ।

ऐसी मान्यता है कि श्रीकृष्ण भालुका तीर्थ पर विश्राम कर रहे थे, तब शिकारी ने उनके पैर के तलुए में पदचिह्न को हिरण की आँख समझकर अनजाने में तीर मारा था। तत्काल ही श्रीकृष्ण ने देह त्याग कर यहीं से वैकुण्ठ गमन किया। इस स्थान पर एक सुंदर कृष्ण मंदिर बना हुआ है।

सोमनाथ महादेव का शिवलिंग प्राचीन समय से अपने दिव्य चमत्कारी प्रभाव के लिए जाना जाता है। भगवान महादेव का यह अत्यन्त सिद्ध स्थान है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्र नीच का है या चंद्र के कारण दोष बना हुआ है, तो इनके दर्शन और पूजा से उसे इस पीड़ा से मुक्ति मिलती है। सोमनाथ महादेव के दर्शन से साधक के जीवन के समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं।

सर्वप्रथम यह मंदिर ईसा के पूर्व अस्तित्व में था, जिस स्थान पर द्वितीय बार मंदिर का पुनर्निर्माण सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया। आठवीं सदी में सिंध के अरबी गवर्नर जुनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी। गुर्जर प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका तीसरी बार पुनर्निर्माण किया। इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी। अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतांत में इसका विवरण लिखा, जिससे प्रभावित हो महमूद ग़ज़नवी ने सन 1025 में लगभग 5,000 साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। 50,000 लोग मंदिर के अंदर हाथ जोड़कर पूजा अर्चना कर रहे थे, प्रायः सभी कत्ल कर दिए गए।

इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। सन 1297 में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर कब्जा किया, तो इसे पाँचवीं बार गिराया गया। मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 में गिरा दिया। इस समय जो मंदिर खड़ा है, उसे भारत के गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया और 1 दिसम्बर 1955 को भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।

मंदिर प्रांगण में हनुमानजी का मंदिर, पर्दी विनायक, नवदुर्गा, खोडीयार, महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा स्थापित सोमनाथ ज्योतिर्लिंग, अहिल्येश्वर, अन्नपूर्णा, गणपति और काशी विश्वनाथ के मंदिर हैं। अघोरेश्वर मंदिर के समीप भैरवेश्वर मंदिर, महाकाली मंदिर, दुखहरण जी की जल समाधि स्थित है। पंचमुखी महादेव मंदिर कुमारवाड़ा में, विलेश्वर मंदिर नंबर 12 के नजदीक और नंबर 15 के समीप राम मंदिर स्थित है। नागरों के इष्टदेव हाटकेश्वर मंदिर, देवी हिंगलाज का मंदिर, कालिका मंदिर, बालाजी मंदिर, नरसिंह मंदिर, नागनाथ मंदिर सहित कुल 42 मंदिर नगर के लगभग दस किलोमीटर क्षेत्र में स्थापित हैं।

सोमनाथ ट्रस्ट द्वारा बहुत भव्य सराय बनाई गई है, तथा यहाँ ठहरने की बहुत अच्छी व्यवस्था है। आज रात हम सोमनाथ में ही ठहरे।

लायक राम शर्मा

शिमला

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 16 जनवरी 2024

 भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण

16 जनवरी 2024


द्वारका दर्शन के दूसरे दिन सुबह तड़के ही बेट द्वारका, जो कि समुद्र के बीच में एक छोटा सा टापू है, के दर्शन किए और उसके पश्चात गोमती द्वारका में द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए।

नागेश्वर मन्दिर एक प्रसिद्ध मन्दिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में दसवां स्थान है। यह ज्योतिर्लिंग प्रमाणिक रूप से कहाँ स्थित है, यह विद्वानों के दावे-प्रतिदावे चलते रहने के कारण कहना आसान नहीं है, फिर भी गुजरात राज्य में गोमती द्वारका के बीच दारूकावन क्षेत्र में इसके प्रामाणिक स्थान होने की मान्यता अधिक है। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग होने के दावे जिन दो अन्य स्थानों पर किए जाते हैं, उनमें से एक आंध्रप्रदेश में अवढा गांव में माना जाता है। यह अवढा गांव महाराष्ट्र राज्य के परभनी क्षेत्र से होकर हिंगोली जाते हुए पड़ता है। दूसरा स्थान उत्तराखंड राज्य में अल्मोड़ा से सत्रह मील दूर जोगेश्वर नामक तीर्थ बताया जाता है। यहाँ उत्तर वृंदावन आश्रम के पास जोगेश्वर नाम का एक पुराना मंदिर है। इससे डेढ़ मील की उतराई पर देवदार के सघन वृक्षों के मध्य नदी के तट पर नागेश्वर ज्योतिर्लिंग बताया जाता है। स्कंध पुराण में इन्हीं नागेश्वर लिंग का वर्णन एवं महात्म्य वर्णित है।

शिव पुराण में गुजरात राज्य के भीतर ही दारूकावन क्षेत्र में स्थित ज्योतिर्लिंग को ही नागेश्वर ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तुति में भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग को दारूकावन क्षेत्र में ही वर्णित किया गया है। महात्म्य के अनुसार जो आदरपूर्वक इस शिवलिंग की उत्पत्ति एवं महात्म्य को सुनेगा और इसके दर्शन करेगा, वह सभी पापों से मुक्त होकर समस्त सुखों को भोगता हुआ अंततः परमपद को प्राप्त होगा।

इस ज्योतिर्लिंग के संबंध में पुराणों में यह कथा वर्णित है।

सुप्रिय नामक एक बड़ा धर्मात्मा और सदाचारी वैश्य था। वह भगवान शिव का अनन्य भक्त था। वह निरंतर उनकी आराधना, पूजन और ध्यान में तल्लीन रहता था। अपने सारे कार्य वह भगवान शिव को अर्पित करके करता था। मन, वचन, कर्म से वह पूर्णतः शिवार्चन में ही तल्लीन रहता था। उसकी इस शिव भक्ति से दारुक नामक एक राक्षस बहुत क्रुद्ध रहता था। उसे भगवान शिव की यह पूजा किसी प्रकार भी अच्छी नहीं लगती थी। वह निरंतर इस बात का प्रयत्न किया करता था कि उस सुप्रिय की पूजा-अर्चना में विघ्न पहुँचे। एक बार सुप्रिय नौका पर सवार होकर कहीं जा रहा था। उस दुष्ट राक्षस दारुक ने यह उपयुक्त अवसर देखकर नौका पर आक्रमण कर दिया। उसने नौका में सवार सभी यात्रियों को पकड़कर अपनी राजधानी में ले जाकर कैद कर लिया। सुप्रिय कारागार में भी अपने नित्यनियम के अनुसार भगवान शिव की पूजा-आराधना करने लगा।

अन्य बंदी यात्रियों को भी वह शिव भक्ति की प्रेरणा देने लगा। दारुक ने जब अपने सेवकों से सुप्रिय के विषय में यह समाचार सुना, तब वह अत्यंत क्रुद्ध होकर उस कारागार में आ पहुँचा। सुप्रिय उस समय भगवान शिव के चरणों में ध्यान लगाए हुए दोनों आँखें बंद किए बैठा था। उस राक्षस ने उसकी यह मुद्रा देखकर अत्यंत भीषण स्वर में उसे डाँटते हुए कहा- “अरे दुष्ट वैश्य! तू आँखें बंद कर इस समय यहाँ कौन-से उपद्रव और षड्यन्त्र करने की बातें सोच रहा है?” उसके यह कहने पर भी धर्मात्मा शिवभक्त सुप्रिय की समाधि भंग नहीं हुई। अब तो वह दारुक राक्षस क्रोध से एकदम पागल हो उठा। उसने तत्काल अपने अनुचरों को सुप्रिय तथा अन्य सभी बंदियों को मार डालने का आदेश दे दिया। सुप्रिय उसके इस आदेश से जरा भी विचलित और भयभीत नहीं हुआ।

वह एकाग्र मन से अपनी और अन्य बंदियों की मुक्ति के लिए भगवान शिव से प्रार्थना करने लगा। उसे यह पूर्ण विश्वास था कि मेरे आराध्य भगवान शिवजी इस विपत्ति से मुझे अवश्य ही छुटकारा दिलाएँगे। उसकी प्रार्थना सुनकर भगवान शंकरजी तत्क्षण उस कारागार में एक ऊँचे स्थान में एक चमकते हुए सिंहासन पर स्थित होकर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गए।

उन्होंने इस प्रकार सुप्रिय को दर्शन देकर उसे अपना पाशुपत-अस्त्र भी प्रदान किया। इस अस्त्र से राक्षस दारुक तथा उसके सहायक का वध करके सुप्रिय शिवधाम को चला गया। भगवान शिव के आदेशानुसार ही इस ज्योतिर्लिंग का नाम नागेश्वर पड़ा।

बाद में इस स्थान पर एक बड़े आमर्दक सरोवर का निर्माण हुआ और ज्योतिर्लिंग उस सरोवर में समाहित हो गया।

युग बीते और आया द्वापर युग, श्री कृष्ण का जन्म युग।

जब द्युत के खेल में कौरवों द्वारा पांचों पांडवों को पराजित किया गया था, तो द्यूत की शर्तों के अनुसार पांडवों को 12 वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास की सजा सुनाई गई थी। इस बीच, पांडवों ने पूरे भारत में भ्रमण किया। घूमते-घूमते वे इस दारुकवन में आ गए और इस स्थान पर उनके साथ एक गाय भी थी, वह गाय प्रतिदिन सरोवर में उतरकर दूध देती थी। एक बार भीम ने यह देखा और अगले दिन वह गाय का पीछा करते हुए सरोवर में उतर गया और उसने भगवान महादेव को देखा तो उसने देखा कि गाय हर दिन शिवलिंग को दूध छोड़ रही थी। तब पांचों पांडवों ने उस सरोवर को नष्ट करने का निश्चय किया। वीर भीम ने अपनी गदा से उस सरोवर के चारों ओर प्रहार किया और सभी ने महादेव के इस शिवलिंग के दर्शन किए। श्री कृष्ण ने उन्हें उस शिवलिंग के बारे में बताया और कहा कि यह शिवलिंग कोई साधारण नहीं है, यह नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है। तब पांचों पांडवों ने उस स्थान पर भव्य पत्थर का मंदिर बनवाया।

समय के साथ वर्तमान मंदिर हेमाडपंथी शैली में सेउना (यादव) वंश द्वारा बनाया गया था। कहा जाता है कि यह 13वीं शताब्दी का है, जो सात मंजिला पत्थर की इमारत का बनाया था।

16वीं शताब्दी में छत्रपति संभाजी महाराज के शासनकाल में औरंगजेब ने इस मंदिर की इमारतों को नष्ट कर दिया। मंदिर के वर्तमान खड़े शिखर का पुनर्निर्माण अहिल्याबाई होल्कर द्वारा किया गया था और हम इसे आज भी देखते हैं।

हर साल इस मंदिर में लाखों की संख्या में लोग आते हैं। महाशिवरात्रि के उत्सव पर यहाँ का सबसे बड़ा मेला लगता है और रथोत्सव मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के ठीक 5 दिन बाद रथोत्सव मनाया जाता है।

शिव महापुराण से पता चलता है कि यह स्थान पश्चिमी (अरब) सागर पर था। कोटिरुद्र संहिता के अध्याय 29 में निम्नलिखित श्लोक में कहा गया है:

पश्चिमे सागरे तस्य वनं सर्वसमृद्धिमत्।

नियोजनं षोडशभिर्विस्तृतं सर्वतो दिशम्॥

दारुकवन के पौराणिक जंगल के वास्तविक स्थान पर अभी भी बहस चल रही है। ज्योतिर्लिंग के स्थान के बारे में कोई अन्य महत्वपूर्ण सुराग नहीं है। पश्चिमी समुद्र पर स्थित ‘दारुकवन’ ही एकमात्र सुराग है।

दारुकावन नाम, रानी दारुका के नाम पर रखा गया, संभवतः दारुवन (देवदार के पेड़ों का जंगल, या बस, लकड़ी का जंगल) से लिया गया है, ऐसा माना जाता है कि यह अल्मोड़ा में मौजूद है। देवदार (दारू वृक्ष) केवल पश्चिमी हिमालय में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, प्रायद्वीपीय भारत में नहीं। प्राचीन हिंदू ग्रंथों में देवदार के पेड़ों को भगवान शिव से जोड़ा गया है। हिंदू ऋषि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए देवदार के जंगलों में निवास करते थे और ध्यान करते थे। इसके अलावा, प्राचीन ग्रंथ प्रसादमंडनम के अनुसार,

“हिमाद्रेरुत्तरे पार्श्वे देवदारूवनं परम पावन शंकरस्थानं तत्र सर्वे शिवार्चिताः।”

इस कारण उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित ‘जागेश्वर’ मंदिर को आमतौर पर नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में पहचाना जाता है।

दारुकवन का लिखित नाम ‘द्वारकावन’ के रूप में गलत पढ़ा जा सकता है, जो द्वारका में नागेश्वर मंदिर की ओर इशारा करता है। हालाँकि, द्वारका के इस हिस्से में कोई ऐसा जंगल नहीं है, जिसका उल्लेख किसी भी भारतीय महाकाव्य में मिलता हो। श्री कृष्ण की कथाओं में सोमनाथ और आस-पास के प्रभास तीर्थ का उल्लेख है, लेकिन द्वारका में नागेश्वर या दारुकवन का नहीं।

दारुकवन विंध्य पर्वत के बगल में मौजूद हो सकता है। यह विंध्य के दक्षिण-दक्षिणपश्चिम में पश्चिम में समुद्र तक फैला हुआ है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र (6) में, शंकराचार्य ने इस ज्योतिर्लिंग की प्रशंसा नागनाथ के रूप में की है:

“यमये सदंगे नगरेतिरम्ये विभूषितांगम विविधैश्च भोगै सदभक्तिमुक्तिप्रदामिषमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये”

इसका अर्थ यह लगाया जा सकता है कि यह दक्षिण में [‘यमये’] ‘सदंगा’ शहर में स्थित है, जो महाराष्ट्र में औंध का प्राचीन नाम था, उत्तराखंड में जागेश्वर मंदिर के दक्षिण में और द्वारका नागेश्वर के पश्चिम में।

भोजन उपरांत हम सोमनाथ के लिए चल पड़े। आज का रात्रि ठहराव सोमनाथ में था।


लायक राम शर्मा

शिमला

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 13–15 जनवरी 2024

 भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण

13–15 जनवरी 2024

हमारी यात्रा का अगला पड़ाव था भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका पुरी। 13 जनवरी को सुबह हमारी यात्रा शुरू हुई और शाम को हम गुजरात के डाकोर पहुँच गए। यहाँ हमने प्रसिद्ध रणछोड़ राय मंदिर के दर्शन किए। हमारा रात्रि ठहराव डाकोर में था। अगली सुबह हमारा सफर फिर शुरू हुआ और शाम को हम द्वारका पुरी पहुँच गए।

द्वारका में हम दो दिन ठहरे।

द्वारका भारत के गुजरात राज्य के देवभूमि द्वारका ज़िले में स्थित एक प्राचीन नगर और नगरपालिका है। यह गोमती नदी और अरब सागर के किनारे ओखामंडल प्रायद्वीप के पश्चिमी तट पर बसा हुआ है। यह हिन्दुओं के चारधाम और सप्तपुरी (सबसे पवित्र प्राचीन नगरों) में से एक है। गुजरात के द्वारका शहर का एक इतिहास है जो सदियों पुराना है और इसका उल्लेख महाभारत महाकाव्य में द्वारका साम्राज्य के रूप में मिलता है। गोमती नदी के तट पर स्थित इस शहर को भगवान कृष्ण की राजधानी के रूप में वर्णित किया गया है।

श्री कृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए पर राज उन्होंने द्वारका में किया। यहीं बैठकर उन्होंने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांडवों को सहारा दिया, धर्म की जीत कराई और शिशुपाल तथा दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया। द्वारका उस जमाने में राजधानी बन गई थी। बड़े-बड़े राजा यहां आते थे और बहुत से मामलों में भगवान श्री कृष्ण की सलाह लेते थे। इस जगह का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि श्री कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं।

काफी समय से जाने-माने शोधकर्ताओं ने पुराणों में वर्णित द्वारिका के रहस्य का पता लगाने का प्रयास किया, लेकिन वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित कोई भी अध्ययन कार्य अभी तक पूरा नहीं किया गया है। 2005 में द्वारिका के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए अभियान शुरू किया गया था। इस अभियान में भारतीय नौसेना ने भी मदद की। अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छटे पत्थर मिले और यहां से लगभग 200 अन्य नमूने भी एकत्र किए गए, लेकिन आज तक यह तय नहीं हो पाया कि यह वही नगरी है अथवा नहीं जिसे भगवान श्री कृष्ण ने बसाया था। आज भी यहां वैज्ञानिक स्कूबा डायविंग के जरिए समंदर की गहराइयों में कैद इस रहस्य को सुलझाने में लगे हैं।

द्वारकाधीश मंदिर भगवान श्री विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। मंदिर भारत के गुजरात के द्वारका में स्थित है। यह 72 स्तंभों द्वारा समर्थित और 5 मंजिला इमारत का मुख्य मंदिर जगत मंदिर या निज मंदिर के रूप में जाना जाता है। मंदिर का शिखर 78.3 मीटर ऊंचा है। पुरातात्विक निष्कर्ष यह बताते हैं कि यह 2200-2500 साल पुराना है। 15वीं-16वीं शताब्दी में मंदिर का विस्तार किया गया। द्वारकाधीश मंदिर एक पुष्टिमार्ग मंदिर है, इसलिए यह वल्लभाचार्य और विठ्लेसनाथ द्वारा बनाए गए दिशानिर्देशों और अनुष्ठानों का पालन करता है।

परंपरा के अनुसार, मूल मंदिर का निर्माण कृष्ण के पड़पोते वज्रनाभ ने हरि-गृह (भगवान कृष्ण के आवासीय स्थान) पर किया था। मंदिर भारत में हिंदुओं द्वारा पवित्र माने जाने वाले चार धाम तीर्थ का हिस्सा बन गया। 8वीं शताब्दी के हिंदू धर्मशास्त्री और दार्शनिक आदि शंकराचार्य ने मंदिर का दौरा किया। अन्य तीन धामों में रामेश्वरम, बद्रीनाथ और पुरी शामिल हैं। आज भी मंदिर के भीतर एक स्मारक उनकी यात्रा को समर्पित है। द्वारकाधीश उपमहाद्वीप में विष्णु के 98वें दिव्य देशम हैं, जो दिव्य प्रभा पवित्र ग्रंथों में महिमा मंडित करते हैं।

मंदिर के ऊपर का ध्वज सूर्य और चंद्रमा को दर्शाता है, जो माना जाता है कि यह दर्शाता है कि कृष्ण तब तक रहेंगे जब तक सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी पर मौजूद रहेंगे। ध्वज को दिन में 5 बार बदला जाता है, लेकिन प्रतीक समान रहता है। मंदिर का निर्माण चूना पत्थर से हुआ है जो अभी भी प्राचीन स्थिति में है। मंदिर में क्षेत्र पर शासन करने वाले राजवंशों के उत्तराधिकारियों द्वारा की गई जटिल मूर्तिकला का विस्तार दिखाया गया है। इन कार्यों से संरचना का अधिक विस्तार नहीं हुआ। मंदिर में दो प्रवेश द्वार हैं। मुख्य प्रवेश द्वार (उत्तर प्रवेश द्वार) को “मोक्ष द्वार” कहा जाता है। यह प्रवेश द्वार एक को मुख्य बाजार में ले जाता है। दक्षिण प्रवेश द्वार को “स्वर्ग द्वार” कहा जाता है। इस द्वार के बाहर 56 सीढ़ियाँ हैं जो गोमती नदी की ओर जाती हैं। हिंदुओं का मानना है कि मूल मंदिर का निर्माण कृष्ण के आवासीय महल के ऊपर, कृष्ण के महान पुत्र वज्रनाभ द्वारा किया गया था।

चालुक्य शैली में वर्तमान मंदिर का निर्माण 15-16वीं शताब्दी में किया गया है।

द्वारका पुरी के कुछ अन्य महत्वपूर्ण तीर्थ इस प्रकार हैं:

1 शारदा मठ

शारदा-मठ को आदि गुरु शंकराचार्य ने बनवाया था। उन्होंने पूरे देश के चार कोनों में चार मठ बनवाए थे। उनमें से एक यह शारदा-मठ है। परंपरागत रूप से आज भी शंकराचार्य मठ के अधिपति हैं। भारत में सनातन धर्म के अनुयायी शंकराचार्य का सम्मान करते हैं। रणछोड़जी के मंदिर से द्वारका शहर की परिक्रमा शुरू होती है। पहले सीधे गोमती के किनारे जाते हैं। गोमती के नौ घाटों पर बहुत से मंदिर हैं। सांवलियाजी का मंदिर, गोवर्धननाथजी का मंदिर, महाप्रभुजी की बैठक और आगे वासुदेव घाट पर हनुमानजी का मंदिर है। आखिर में संगम घाट आता है। यहां गोमती समुद्र से मिलती है। इस संगम पर संगम-नारायणजी का बहुत बड़ा मंदिर है।

2 चक्र तीर्थ

संगम घाट के उत्तर में समुद्र के ऊपर एक और घाट है। इसे चक्र तीर्थ कहते हैं। इसी के पास रत्नेश्वर महादेव का मंदिर है। इसके आगे सिद्धनाथ महादेवजी हैं, आगे एक बावली है, जिसे ‘ज्ञान-कुंड’ कहते हैं। इससे आगे जूनीराम बाड़ी है, जिसमें राम, लक्ष्मण और सीता की मूर्तियाँ हैं। इसके बाद एक और राम का मंदिर है, जो नया बना है। इसके बाद एक बावली है, जिसे सौमित्री बावली यानी लक्ष्मणजी की बावली कहते हैं। काली माता और आशापुरी माता की मूर्तियाँ इसके बाद आती हैं। इनके आगे यात्री कैलासकुंड पर पहुंचते हैं। इस कुंड का पानी गुलाबी रंग का है। कैलासकुंड के आगे सूर्यनारायण का मंदिर है। इसके आगे द्वारका शहर का पूरब की तरफ का दरवाजा पड़ता है। इस दरवाजे के बाहर जय और विजय की मूर्तियाँ हैं। जय और विजय बैकुण्ठ में भगवान के महल के चौकीदार हैं। यहां भी ये द्वारका के दरवाजे पर खड़े होकर उसकी देखभाल करते हैं। यहां से यात्री फिर निष्पाप कुंड पहुंचते हैं और इस रास्ते के मंदिरों के दर्शन करते हुए रणछोड़जी के मंदिर में पहुंच जाते हैं। यहीं परिश्रम खत्म हो जाती है। यही असली द्वारका है। इससे बीस मील आगे कच्छ की खाड़ी में एक छोटा सा टापू है। इस पर बेट-द्वारका बसी है। गोमती द्वारका का तीर्थ करने के बाद यात्री बेट-द्वारका जाते हैं। बेट-द्वारका के दर्शन बिना द्वारका का तीर्थ पूरा नहीं होता। बेट-द्वारका पानी के रास्ते जा सकते हैं।

गोपी तालाब 

जमीन के रास्ते जाते हुए तेरह मील आगे गोपी-तालाब पड़ता है। यहां की आस-पास की जमीन पीली है। तालाब के अंदर से भी पीला रंग की ही मिट्टी निकलती है। इस मिट्टी को वे गोपीचंदन कहते हैं। यहां मोर बहुत होते हैं। गोपी तालाब से तीन मील आगे नागेश्वर नाम का शिवजी और पार्वती का छोटा सा मंदिर है। यात्री लोग इसका दर्शन भी जरूर करते हैं। कहते हैं, भगवान कृष्ण इस बेट-द्वारका नाम के टापू पर अपने घरवालों के साथ सैर करने आया करते थे। यह कुल सात मील लंबा है। यह पथरीला है। यहां कई अच्छे और बड़े मंदिर हैं। कितने ही तालाब हैं। कितने ही भंडारे हैं। धर्मशालाएँ हैं और सदावर्त्त लगते हैं। मंदिरों के सिवा समुद्र के किनारे घूमना बड़ा अच्छा लगता है।

बेट-द्वारका 

बेट-द्वारका ही वह जगह है, जहां भगवान कृष्ण ने अपने प्यारे भक्त नरसी की हुंडी भरी थी। बेट-द्वारका के टापू का पूरब की तरफ का जो कोना है, उस पर हनुमानजी का बहुत बड़ा मंदिर है। इसीलिए इस ऊंचे टीले को हनुमानजी का टीला कहते हैं। आगे बढ़ने पर गोमती-द्वारका की तरह ही एक बहुत बड़ी चहारदीवारी यहां भी है। इस घेरे के भीतर पांच बड़े-बड़े महल हैं। ये दुमंजिले और तिमंजले हैं। पहला और सबसे बड़ा महल श्रीकृष्ण का महल है। इसके दक्षिण में सत्यभामा और जाम्बवती के महल हैं। उत्तर में रुक्मिणी और राधा के महल हैं। इन पांचों महलों की सजावट ऐसी है कि आँखें चकाचौंध हो जाती हैं। इन मंदिरों के किवाड़ों और चौखटों पर चांदी के पतरे चढ़े हैं। भगवान कृष्ण और उनकी मूर्ति चारों रानियों के सिंहासनों पर भी चांदी मढ़ी है। मूर्तियों का श्रृंगार बड़ा ही कीमती है। हीरे, मोती और सोने के गहने उनको पहनाए गए हैं। सच्ची जरी के कपड़ों से उनको सजाया गया है।

5 चौरासी धुना

बेट-द्वारका टापू में भगवान द्वारकाधीश के मंदिर से 7 किमी की दूरी पर चौरासी धुना नामक एक प्राचीन और ऐतिहासिक तीर्थ स्थल है। उदासीन संप्रदाय के सुप्रसिद्ध संत और प्रख्यात इतिहास लेखक, निर्वाण थड़ा तीर्थ, श्री पंचयाती अखाड़ा बड़ा उदासीन के पीठाधीश्वर श्री महंत रघुमुनी जी के अनुसार ब्रह्माजी के चारों मानसिक पुत्रों सनक, सनंदन, सनतकुमार और सनातन ने ब्रह्माजी की सृष्टि-संरचना की आज्ञा को न मानकर उदासीन संप्रदाय की स्थापना की और मृत्यु-लोक में विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करते हुए भेंट-द्वारका में भी आए। उनके साथ उनके अनुयायियों के रूप में अस्सी (80) अन्य संत भी थे। इस प्रकार चार सनतकुमार और 80 अनुयायी उदासीन संतों को जोड़कर 84 की संख्या पूर्ण होती है। इन्हीं 84 आदि दिव्य उदासीन संतों ने यहाँ पर चौरासी धुने स्थापित कर साधना और तपस्वी की और ब्रह्माजी को एक-एक धुने की एक लाख महिमा को बताया, तथा चौरासी धुनों के प्रति स्वरूप चौरासी लाख योनियाँ निर्मित करने का सांकेतिक उपदेश दिया। इस कारण से यह स्थान चौरासी धुना के नाम से जग में ख्यात हुआ।

कालांतर में उदासीन संप्रदाय के अंतिम आचार्य जगतगुरु उदासीनाचार्य श्री चंद्र भगवान इस स्थान पर आए और पुनः सनकादिक ऋषियों द्वारा स्थापित चौरासी धुने को जागृत कर पुनः प्रज्वलित किया और उदासीन संप्रदाय के एक तीर्थ के रूप में इसे महिमामंडित किया। यह स्थान आज भी उदासीन संप्रदाय के अधीन है और वहाँ पर उदासी संत निवास करते हैं। आने वाले यात्रियों, भक्तों और संतों की निवास, भोजन आदि की व्यवस्था भी निःशुल्क रूप से चौरासी धुना उदासीन आश्रम द्वारा की जाती है। जो यात्री भेंट-द्वारका दर्शन हेतु जाते हैं, वे चौरासी धुना तीर्थ के दर्शन हेतु अवश्य जाते हैं। ऐसी अवधारणा है कि चौरासी धुनों के दर्शन करने से मनुष्य की लाख चौरासी कट जाती हैं, अर्थात उसे चौरासी लाख योनियों में भटकना नहीं पड़ता और वह मुक्त हो जाता है।

रणछोड़ जी मंदिर

रणछोड़ जी के मंदिर की ऊपरी मंजिलें देखने योग्य हैं। यहां भगवान की सेज है। झूलने के लिए झूला है। खेलने के लिए चौपड़ है। दीवारों में बड़े-बड़े शीशे लगे हैं। इन पांचों मंदिरों के अपने अलग भंडारे हैं। मंदिरों के दरवाजे सुबह ही खुलते हैं। बारह बजे बंद हो जाते हैं। फिर चार बजे खुल जाते हैं और रात के नौ बजे तक खुले रहते हैं। इन पांच विशेष मंदिरों के सिवा और भी बहुत से मंदिर इस चहारदीवारी के अंदर हैं। ये प्रद्युम्नजी, टीकमजी, पुरुषोत्तमजी, देवकी माता, माधवजी, अम्बाजी और गरूड़ के मंदिर हैं। इनके सिवा साक्षी-गोपाल, लक्ष्मीनारायण और गोवर्धननाथजी के मंदिर हैं। ये सब मंदिर भी खूब सजे-सजाए हैं। इनमें भी सोने-चांदी का काम बहुत है। बेट-द्वारका में कई तालाब हैं—रणछोड़ तालाब, रत्न-तालाब, कचौरी-तालाब और शंख-तालाब। इनमें रणछोड़ तालाब सबसे बड़ा है। इसकी सीढ़ियाँ पत्थर की हैं। जगह-जगह नहाने के लिए घाट बने हैं। इन तालाबों के आस-पास बहुत से मंदिर हैं। इनमें मुरली मनोहर, नीलकण्ठ महादेव, रामचंद्रजी और शंख-नारायण के मंदिर खास हैं। लोग इन तालाबों में नहाते हैं और मंदिर में फूल चढ़ाते हैं।

शंख तालाब

रणछोड़ के मंदिर से डेढ़ मील चलकर शंख-तालाब आता है। इस जगह भगवान कृष्ण ने शंख नामक राक्षस को मारा था। इसके किनारे पर शंख नारायण का मंदिर है। शंख-तालाब में नहाकर शंख नारायण के दर्शन करने से बड़ा पुण्य होता है। बेट-द्वारका से समुद्र के रास्ते जाकर बिरावल बंदरगाह पर उतरना पड़ता है। ढाई-तीन मील दक्षिण-पूर्व की तरफ चलने पर एक कस्बा मिलता है, इसी का नाम सोमनाथ पट्टल है। यहां एक बड़ी धर्मशाला है और बहुत से मंदिर हैं। कस्बे से करीब पौने तीन मील पर हिरण्य, सरस्वती और कपिला इन तीन नदियों का संगम है। इस संगम के पास ही भगवान कृष्ण के शरीर का अंतिम संस्कार किया गया था। 

दो दिन तक हमारा यात्री दल भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका पुरी में कृष्णमय हो गया। यहाँ के कण-कण में भगवान कृष्ण का निवास है। यहाँ के सभी प्रमुख तीर्थों का दर्शन करने के उपरांत हमारी यात्रा का मुख्य उद्देश्य अर्थात तीन धाम दर्शन पूर्ण हो गया था।


लायक राम शर्मा

शिमला


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