भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण
17 जनवरी 2024
रात्रि विश्राम के पश्चात, सुबह तड़के हम सोमनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए गए। यहाँ पर काफ़ी भीड़ रहती है और दर्शन के लिए काफ़ी समय इंतजार करना पड़ता है। आज सारा दिन हम सोमनाथ के विभिन्न दर्शनीय स्थलों पर गए। यहाँ पर सागर हर समय उफान पर रहता है।
सोमनाथ मंदिर भारतवर्ष के पश्चिमी छोर पर गुजरात में स्थित एक अत्यन्त प्राचीन और ऐतिहासिक शिव मंदिर है। यह भारतीय इतिहास तथा हिन्दुओं के अत्यंत महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है। इसे आज भी भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में माना जाता है। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में स्पष्ट रूप से किया गया है। लोककथाओं के अनुसार, यहीं श्रीकृष्ण ने देहत्याग किया था। इस कारण इस क्षेत्र का महत्त्व और भी बढ़ गया।
यह मंदिर हिन्दू धर्म के उत्थान-पतन के इतिहास का प्रतीक रहा है। अत्यन्त वैभवशाली होने के कारण, इतिहास में कई बार यह मंदिर तोड़ा और पुनर्निर्मित किया गया। वर्तमान भवन के पुनर्निर्माण का आरंभ भारत की स्वतंत्रता के पश्चात लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने करवाया और 1 दिसम्बर 1955 को भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया। सोमनाथ मंदिर विश्व प्रसिद्ध धार्मिक और पर्यटन स्थल है। मंदिर प्रांगण में रात साढ़े सात से साढ़े आठ बजे तक एक घंटे का साउंड एंड लाइट शो चलता है, जिसमें सोमनाथ मंदिर के इतिहास का बड़ा ही सुंदर सचित्र वर्णन किया जाता है।
भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिम में अरब सागर के तट पर स्थित आदि ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ महादेव मंदिर की छटा ही निराली है। यह तीर्थस्थान देश के प्राचीनतम तीर्थस्थानों में से एक है और इसका उल्लेख स्कंद पुराण, श्रीमद्भागवत गीता, शिवपुराण आदि प्राचीन ग्रंथों में भी है। वहीं ऋग्वेद में भी सोमेश्वर महादेव की महिमा का उल्लेख है।यह लिंग शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है।
यह मंदिर गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप तीन प्रमुख भागों में विभाजित है। इसका 150 फुट ऊंचा शिखर है। इसके शिखर पर स्थित कलश का भार दस टन है और इसकी ध्वजा 27 फुट ऊंची है। इसके अबाधित समुद्री मार्ग- त्रिष्टांभ के विषय में ऐसा माना जाता है कि यह समुद्री मार्ग परोक्ष रूप से दक्षिणी ध्रुव में समाप्त होता है। यह हमारे प्राचीन ज्ञान व सूझबूझ का अद्भुत साक्ष्य माना जाता है। इस मंदिर का पुनर्निर्माण महारानी अहिल्याबाई ने करवाया था।
सोमनाथजी के मंदिर की व्यवस्था और संचालन का कार्य सोमनाथ ट्रस्ट के अधीन है। सरकार ने ट्रस्ट को ज़मीन और बाग-बग़ीचों से आय का प्रबंध किया है। यह तीर्थ पितृगणों के श्राद्ध, नारायण बलि आदि कर्मों के लिए भी प्रसिद्ध है। चैत्र, भाद्रपद, और कार्तिक माह में यहाँ श्राद्ध करने का विशेष महत्त्व बताया गया है। इन तीन महीनों में यहाँ श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ लगती है। इसके अलावा, यहाँ तीन नदियाँ—हिरण, कपिला, और सरस्वती का महासंगम होता है। इस त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्त्व है।
प्राचीन हिन्दू ग्रंथों के अनुसार, सोम अर्थात् चन्द्र ने दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं से विवाह किया था। लेकिन उनमें से रोहिणी नामक अपनी पत्नी को अधिक प्यार और सम्मान दिया करता था। इस अन्याय को होते देख क्रोध में आकर दक्ष ने चन्द्रदेव को शाप दे दिया कि अब से हर दिन तुम्हारा तेज (कान्ति, चमक) क्षीण होता रहेगा। फलस्वरूप, हर दूसरे दिन चन्द्र का तेज घटने लगा। शाप से विचलित और दुःखी सोम ने भगवान शिव की आराधना शुरू कर दी। अन्ततः शिव प्रसन्न हुए और सोम-चन्द्र के शाप का निवारण किया। सोम के कष्ट को दूर करने वाले प्रभु शिव का प्रतिष्ठान यहाँ करवाया गया, और उनका नामकरण “सोमनाथ” हुआ।
ऐसी मान्यता है कि श्रीकृष्ण भालुका तीर्थ पर विश्राम कर रहे थे, तब शिकारी ने उनके पैर के तलुए में पदचिह्न को हिरण की आँख समझकर अनजाने में तीर मारा था। तत्काल ही श्रीकृष्ण ने देह त्याग कर यहीं से वैकुण्ठ गमन किया। इस स्थान पर एक सुंदर कृष्ण मंदिर बना हुआ है।
सोमनाथ महादेव का शिवलिंग प्राचीन समय से अपने दिव्य चमत्कारी प्रभाव के लिए जाना जाता है। भगवान महादेव का यह अत्यन्त सिद्ध स्थान है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्र नीच का है या चंद्र के कारण दोष बना हुआ है, तो इनके दर्शन और पूजा से उसे इस पीड़ा से मुक्ति मिलती है। सोमनाथ महादेव के दर्शन से साधक के जीवन के समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं।
सर्वप्रथम यह मंदिर ईसा के पूर्व अस्तित्व में था, जिस स्थान पर द्वितीय बार मंदिर का पुनर्निर्माण सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया। आठवीं सदी में सिंध के अरबी गवर्नर जुनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी। गुर्जर प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका तीसरी बार पुनर्निर्माण किया। इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी। अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतांत में इसका विवरण लिखा, जिससे प्रभावित हो महमूद ग़ज़नवी ने सन 1025 में लगभग 5,000 साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। 50,000 लोग मंदिर के अंदर हाथ जोड़कर पूजा अर्चना कर रहे थे, प्रायः सभी कत्ल कर दिए गए।
इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। सन 1297 में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर कब्जा किया, तो इसे पाँचवीं बार गिराया गया। मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 में गिरा दिया। इस समय जो मंदिर खड़ा है, उसे भारत के गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया और 1 दिसम्बर 1955 को भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।
मंदिर प्रांगण में हनुमानजी का मंदिर, पर्दी विनायक, नवदुर्गा, खोडीयार, महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा स्थापित सोमनाथ ज्योतिर्लिंग, अहिल्येश्वर, अन्नपूर्णा, गणपति और काशी विश्वनाथ के मंदिर हैं। अघोरेश्वर मंदिर के समीप भैरवेश्वर मंदिर, महाकाली मंदिर, दुखहरण जी की जल समाधि स्थित है। पंचमुखी महादेव मंदिर कुमारवाड़ा में, विलेश्वर मंदिर नंबर 12 के नजदीक और नंबर 15 के समीप राम मंदिर स्थित है। नागरों के इष्टदेव हाटकेश्वर मंदिर, देवी हिंगलाज का मंदिर, कालिका मंदिर, बालाजी मंदिर, नरसिंह मंदिर, नागनाथ मंदिर सहित कुल 42 मंदिर नगर के लगभग दस किलोमीटर क्षेत्र में स्थापित हैं।
सोमनाथ ट्रस्ट द्वारा बहुत भव्य सराय बनाई गई है, तथा यहाँ ठहरने की बहुत अच्छी व्यवस्था है। आज रात हम सोमनाथ में ही ठहरे।
लायक राम शर्मा
शिमला
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