भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण.....15/16-12-2023
एकता तीर्थ यात्रा संगम सुंदरनगर के बैनर तले तथा इसके संचालक आदरणीय श्री सुरजीत राम शर्मा जी के सान्निध्य में भारत दर्शन यात्रा के गया प्रवास में पितरों के निमित्त श्राद्ध एवं पिंडदान प्रक्रिया पूर्ण करने के पश्चात आज सुबह सवेरे ही हमारी यात्रा का अगला पड़ाव शुरू हुआ। हमारा दल नेपाल के काठमांडू के लिए रवाना हो गया। हमारी यात्रा के दौरान भगवान शिव के द्वितीय ज्योतिर्लिंग श्री पशुपतिनाथ के दर्शनों की अभिलाषा लिए गया से सुबह-सवेरे शुरू हुई यात्रा दोपहर बाद लगभग 3:00 बजे चंपारण जिले के रक्सौल बॉर्डर में पहुंच गई। चंपारण बहुत भीड़भाड़ वाला क्षेत्र है तथा नेपाल बॉर्डर में नेपाल प्रवेश संबंधी औपचारिकताएं पूर्ण करने में बहुत समय लग गया इसलिए हमने रात्रि भोजन नेपाल में प्रवेश करते ही कर लिया। आज का लगभग सारा दिन और सारी रात यात्रा में ही गुजर गयी। बस का सफर काफी थकान वाला था फिर भी नेपाल की हसीन वादियों को निहारने से थकान कुछ कम हो गई। सुबह भोर की प्रथम किरण के साथ हम नेपाल के काठमांडू पहुंच गए। नेपाल के काठमांडू का वर्णन शब्दों में कर पाना संभव नहीं है। यह सचमुच तिब्बत के पठार का एक अनुपम एवं अद्वितीय उदाहरण है। यहां की अलौकिक सुंदरता मनमोहक है। यहां पहुंचते ही सर्वप्रथम हम अपने होटल में विश्राम करने चले गए। होटल में कुछ समय विश्राम करने के पश्चात तथा सुबह का भोजन करने के उपरांत समय था काठमांडू भ्रमण का।
काठमांडू में हम सर्वप्रथम भगवान शिव के द्वितीय ज्योतिर्लिंग श्री पशुपतिनाथ जी के दर्शनों के लिए निकल पड़े। पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडू से तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में बागमती नदी के किनारे देवपाटन गांव में स्थित एक हिंदू मंदिर है। नेपाल के एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनने से पहले यह मंदिर राष्ट्रीय देवता, भगवान पशुपतिनाथ का मुख्य निवास माना जाता था। यह मंदिर यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में सूचीबद्ध है।
पशुपतिनाथ मंदिर में केवल मात्र हिंदुओं को मंदिर परिसर में प्रवेश करने की अनुमति है। गैर हिंदू आगंतुकों को इसे बाहर से बागमती नदी के दूसरे किनारे से देखने की अनुमति है। यह मंदिर नेपाल में शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है। 15 वीं शताब्दी के राजा प्रताप मल्ल से शुरु हुई परंपरा है कि मंदिर में चार पुजारी (भट्ट) और एक मुख्य पुजारी (मूल-भट्ट) दक्षिण भारत के ब्राह्मणों में से रखे जाते हैं। पशुपतिनाथ में शिवरात्रि का पर्व विशेष महत्व के साथ मनाया जाता है। यूनेस्को ने इसे सन 1979 में विश्व धरोहर में शामिल किया था और यह मंदिर पैगोडा शैली में बना है।
नेपाल महात्म्य और हिमवत खंड पर आधारित स्थानीय किंवदंती के अनुसार भगवान शिव एक बार वाराणसी के अन्य देवताओं को छोड़कर बागमती नदी के किनारे स्थित मृगस्थली चले गए, जो बागमती नदी के दूसरे किनारे पर जंगल में है। भगवान शिव वहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले गए। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में प्रकट हुए।
भारत के उत्तराखण्ड राज्य में स्थित प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर की किंवदंती के अनुसार पाण्डवों को स्वर्गप्रयाण के समय भैंसे के स्वरूप में शिव के दर्शन हुए थे जो बाद में धरती में समा गए लेकिन भीम ने उनकी पूँछ पकड़ ली थी। ऐसे में उस स्थान पर स्थापित उनका स्वरूप केदारनाथ कहलाया, तथा जहाँ पर धरती से बाहर उनका मुख प्रकट हुआ, वह पशुपतिनाथ कहलाया।
हिंदू धर्म मानता के अनुसार भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में केदारनाथ और पशुपतिनाथ को मिलाकर एक ज्योतिर्लिंग माना जाता है। हमारे पूरे दल ने भगवान पशुपतिनाथ जी के दर्शन किए, पूजा अर्चना की तथा इसके पश्चात हम काठमांडू शहर को घूमने निकल पड़े। सांयकालीन सत्र में हमने मां गुदेश्वरी शक्तिपीठ के दर्शन किए।
इसके पश्चात हम काठमांडू नगर के पश्चिम में एक पहाड़ी पर स्थित स्वयंभू नाथ स्तूप के दर्शनों के लिए निकल पड़े। बौद्ध धर्म के अनुयायी नेवरी लोगों के दैनिक जीवन में स्वयंभूनाथ का केंद्रीय स्थान है। विश्व धरोहर में सम्मिलित स्वयंभूनाथ विश्व के सबसे भव्य बौद्ध स्थलों में से एक हैं। इसका संबंध काठमांडू घाटी के निर्माण से जोड़ा जाता है। काठमांडू से 3 किलोमीटर पश्चिम में घाटी से 70 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है स्वयंभूनाथ। इसके चारों ओर बनी आंखों के बाल में माना जाता है कि यह गौतम बुद्ध की हैं, जो चारों दिशाओं में देख रहे हैं।
इसके अतिरिक्त काठमांडू में भगवान विष्णु का प्रसिद्ध बुदानीकंथा मंदिर है। यह मंदिर काठमांडू से 8 किलोमीटर दूर शिवपुरी पहाड़ी की तलहटी में स्थित है। बुदानीकंथा मंदिर भगवान विष्णु का मंदिर है और इस मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार यहां आकर भगवान विष्णु के दर्शन करने से सारी मनोकामना पूर्ण हो जाती है। बुदानीकंथा मंदिर में भगवान विष्णु सोई हुई मुद्रा में विराजमान हैं। इस मंदिर में पानी का कुंड है और उस पर विष्णु भगवान की विशाल काले रंग की मूर्ति है।
काठमांडू में हमारा आज का दिन काफी व्यस्त रहा और हमने कम समय में ज्यादा से ज्यादा दर्शनीय स्थलों को घूमने का प्रयास किया। शाम के सत्र में छुटपुट खरीददारी करने के पश्चात हम एक बार पुनः अपने होटल में वापस पहुंचे।
लायक राम शर्मा
शिमला