शाली माता मंदिर शिमला
भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण……12-12-2023
भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण….12-12-2023
एकता तीर्थ यात्रा संगम सुंदर नगर के बैनर तले इस भारत दर्शन यात्रा का आज दसवां दिन था। हम बिहार राज्य के सबसे पवित्र स्थल गया पहुंच चुके थे। यह यात्रा का ऐसा पड़ाव था, जहां अपने कुल के पितरों (पूर्वजों) के उद्धार हेतु हमें अगले तीन दिन तक पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण की प्रक्रिया पूर्ण करनी थी। हिंदू धर्म मान्यताओं के अनुसार ऐसा माना जाता है कि प्रत्येक हिंदू को जीवन में कम से कम एक बार अपने पितरों के उद्धार हेतु गया में पिंडदान श्राद्ध एवं तर्पण करना चाहिए।
गया भारत के बिहार राज्य में स्थित एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यह गया ज़िले का मुख्यालय और बिहार राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। इस क्षेत्र के लोग मगही भाषा बोलते हैं। यह भारत के अतंरराष्ट्रीय पर्यटक स्थलों में से एक है। इस नगर का हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्मों में अत्यंत महत्व है। शहर का उल्लेख रामायण और महाभारत में भी मिलता है। गया तीन ओर से छोटी व पथरीली पहाड़ियों से घिरा है, जिनके नाम मंगला-गौरी, श्रृंग स्थान, रामशिला अथवा ब्रह्मयोनि हैं। नगर के पूर्व में फल्गू नदी बहती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए भारत में 55 स्थानों को महत्वपूर्ण माना गया है, लेकिन फल्गु नदी के तट पर स्थित गया शहर का अपना विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि सर्वपितृ अमावस्या के दिन गया में पिंडदान करने से 108 कुल और 7 पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है। पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए इस स्थान को मोक्ष स्थली कहा जाता है। पुराणों में बताया गया है कि प्राचीन शहर गया में भगवान विष्णु स्वयं पितृदेव के रूप में निवास करते हैं।
गया में श्राद्ध कर्म, तर्पण विधि और पिंडदान करने के बाद कुछ भी शेष नहीं रह जाता है और यहां से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त हो जाता है। गया का महत्व इसी से पता चलता है कि फल्गु नदी के तट पर भगवान राम और माता सीता ने राजा दशरथ की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए यहीं पर श्राद्ध कर्म और पिंडदान किया था। महाभारत काल में पांडवों ने भी इसी स्थान पर श्राद्ध कर्म किया था।
वायु पुराण, गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण में भी गया शहर का महत्व बताया गया है। गया शहर में हर साल पितृपक्ष के दौरान एक बार मेला लगता है, जिसे पितृपक्ष का मेला भी कहा जाता है। गया शहर हिंदुओं के साथ साथ बौद्ध धर्म के लिए भी पवित्र स्थल है। बोधगया को भगवान बुद्ध की भूमि भी कहा जाता है। यहां पर बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने अपनी शैली में कई मंदिरों का निर्माण करवाया है।
गया शहर के संबंध में एक पौराणिक कथा प्रचलित है। इसके अनुसार गयासुर नामक एक असुर ने कड़ी तपस्या की थी और ब्रह्माजी से वरदान मांगा कि उसका शरीर पवित्र हो जाए और लोग उसके दर्शन कर पाप मुक्त हो जाएं। इस वरदान के बाद लोगों में भय खत्म हो गया और वो पाप करने लगे। पाप करने के बाद वह गयासुर के दर्शन करते और पाप मुक्त हो जाते थे। ऐसा होने से स्वर्ग और नरक का संतुलन बिगड़ने लगा। बड़े-बड़े पापी भी स्वर्ग पहुंचने लगे। इन सबसे बचने के लिए देवतागण गयासुर के पास पहुंचे और यज्ञ के लिए पवित्र स्थान की मांग की। गयासुर ने अपना शरीर ही देवताओं को यज्ञ के लिए दे दिया और कहा कि आप मेरे ऊपर ही यज्ञ करें। जब गयासुर लेटा तो उसका शरीर पांच कोस में फैल गया और यही पांच कोस आगे चलकर गया बन गया। एक कोस क्षेत्र गया-सिर माना जाता है। ढाई कोस तक गया है और पांच कोस तक गया-क्षेत्र है। इसी के मध्य में सब तीर्थ आ जाते हैं।
गयासुर के पुण्य प्रभाव से वह स्थान तीर्थ के रूप में जाना गया। गया में पहले विविध नामों से 360 वेदियां थी लेकिन अब केवल 54 ही शेष बची हैं। गया में भगवान विष्णु गदाधर के रूप में विराजमान हैं। गयासुर के विशुद्ध शरीर में ब्रह्मा, जनार्दन, शिव तथा प्रपितामह निवास करते हैं। इसलिए पिंडदान व श्राद्ध कर्म के लिए इस स्थान को उत्तम माना गया है।
हिंदू धर्म मान्यता के अनुसार पितर कामना करते हैं कि उनके वंश में कोई ऐसा पुत्र उत्पन्न हो, जो गया जाकर वहां उनका श्राद्ध करे। लोगों में यह भ्रांति घर कर गई है कि गया में पिंडदान करने के पश्चात फिर पितरों का वार्षिक श्राद्ध नहीं करना चाहिए। सच बात तो यह है कि गया में पिंडदान से पितरों की अक्षय तृप्ति होती है। इसलिए यदि उसके पश्चात वार्षिक श्राद्ध ना किया जाए तो श्राद्ध न करने का पाप नहीं होता, किंतु यदि वार्षिक श्राद्ध किया जाए तो वह उत्तम माना जाता है। इससे पितर प्रसन्न ही होते हैं।
अन्य हिंदू तीर्थ स्थलों की भांति गया में भी अलग-अलग क्षेत्र के तीर्थ पुरोहित हैं। इसलिए हम सर्वप्रथम अपने तीर्थ पुरोहित के पास गए और उनका आशीर्वाद लिया। तत्पश्चात पिंडदान की प्रक्रिया के लिए फल्गु के तट की तरफ रवाना हो गए। पूजा-पाठ की प्रक्रिया एवं हमारा मार्गदर्शन करने के लिए पंडित धीरेंद्र मिश्रा जी अगले तीन दिन तक हमारे साथ रहने वाले थे।
फल्गु में स्नान करने के पश्चात पिंडदान की प्रक्रिया शुरू हुई। यहाँ फल्गु के तट पर पुनपुन और फल्गु दो वेदियां लगती है। पिंड को फल्गु नदी में प्रवाहित किया जाता है तथा इसके बाद तर्पण किया जाता है।
फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने के पश्चात हम 'गयासिर' नामक स्थान पर पहुंच गए। यह स्थान विष्णु पद मंदिर से दक्षिण में स्थित है। इस स्थान पर दो वेदियां लगती हैं।
प्रथम वेदी गया सिर और द्वितीय गयाकूप। इसी बरामदे में एक छोटा कुंड है और गया सिर वेदि का पिंड इस कुंड में पड़ता है तथा यहां से पश्चिम एक घेरे में गया कूप है। गया कूप पिंड मुंडपृष्ठा नामक स्थान पर पड़ता है।
आज के दिन का हमारा अगला पड़ाव था गया का सबसे प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर। महारानी अहिल्याबाई द्वारा बनाया गया यह काले पत्थर का अति सुंदर और आकर्षक मंदिर है। मंदिर के अंदर गयासुर की प्रार्थना के अनुसार भगवान विष्णु का चरण चिन्ह है। मंदिर का ऊपरी भाग गुम्बजाकार है, जो देखने में बहुत सुंदर मालूम होता है। मंदिर के ऊपर शिखर पर बाल गोविंद सेन नामक एक गयापाल की चढ़ाई हुई सोने की ध्वजा फहराती है। मंदिर के भीतरी भाग में चांदी से आच्छादित एक अष्टकोण कुंड में विष्णु का चरण चिन्ह है। मंदिर के सामने के भाग में एक सभा मंडप है। चरण के ऊपर एक चांदी का छात्र सुशोभित है। मंदिर के सभा मंडप में और उसके बाहर दो बड़े घंटे लटक रहे हैं। यहां पर एक विचित्र बात का उल्लेख आवश्यक प्रतीत होता है और वह यह है कि सभा मंडप की छत से पानी की बूंद टपका करती है। जन श्रुति के अनुसार जिस तीर्थ का नाम हृदय में रखकर आप हाथ पसारिए आपके हाथ में एक-दो बूंद पानी की अवश्य गिरेगी।
विष्णु पद मंदिर के 16 वेदी नामक मंडप में 14 स्थान पर और पास के मंडप में दो स्थान पर पिंडदान होता है। वेदियों के नाम इस प्रकार से हैं।
कार्तिकपद, दक्षिणाग्निपद, गार्हपत्याग्निपद, आवहनीयाग्निपद, संध्याग्निपद, आवसंध्याग्निपद, सूर्यपद, चंद्रपद, गणेशपद, उदीचीपद, कण्वपद, मातंगपद, कौचपद, इंद्रपद, अगास्त्यपद और काश्यपद। इसके अतिरिक्त विष्णु पद मंदिर में रूद्रपद, ब्रह्मपद और विष्णुपद तीन वेदियों पर अलग से पिंडदान होता है। कुल मिला करके विष्णु पद मंदिर में 19 वेदियो पर पिंडदान होता है। यह एक लंबी प्रक्रिया है और यहां पर पिंडदान एवं दर्शन करने में बहुत समय लग गया।
हमारा आज का अंतिम पड़ाव था सूरजकुंड। विष्णु कुंड से लगभग थोड़ी दूरी पर यह सरोवर है इस कुंड का उत्तरी भाग उदीची मध्य भाग कनखल और दक्षिण भाग दक्षिण मानस तीर्थ कहलाता है इस कुंड के पश्चिम में एक मंदिर में सूर्य नारायण की चतुर्भुज मूर्ति है जिससे दक्षिणावर के कहते हैं।
सूर्यकुंड से 80 गज दक्षिण फल्गु किनारे जिव्हालोल तीर्थ है और यहां एक पीपल का वृक्ष है। सूरजकुंड में हमने पांच अलग-अलग वेदियों का पिंडदान किया। यह पांच वेदियां इस प्रकार से हैं। उत्तर मानस, दक्षिण मानस, जीव्हालोल, उदीची और कनखल।गया में प्रथम दिन बहुत व्यस्त रहा और आज हमने लगभग 28 वेदियों पर पिंडदान किया।
लायक राम शर्मा
शिमला
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5 दिसंबर को सुबह 4:00 बजे एकता तीर्थ यात्रा नैमिषारण्य तीर्थ के लिए रवाना हो गयी। हरिद्वार से नैमिषारण्य लगभग एक पूरे दिन का सफर है।
सफर लंबा और थका देने वाला था लेकिन इस बीच हमारा काफिला दोपहर के भोजन के लिए रुक गया। बहुत सारे श्रद्धालु भजन कीर्तन में जुट गए। दोपहर का भोजन करने के उपरांत एक बार पुनः यात्रा शुरू हुई और सांझ की बेला में अंततः हम नैमिषारण्य पहुंच गए। सफर की थकान बहुत थी इसलिए शाम का भोजन करने के उपरांत सभी लोग विश्राम के लिए चले गए।
अगले दिन नैमिषारण्य तीर्थ को घूमना था और यहां की मनमोहक आबोहवा को महसूस करना था।
नैमिषारण्य लखनऊ से 80 किमी दूर लखनऊ क्षेत्र के अर्न्तगत सीतापुर जिला में गोमती नदी के बाएँ तट पर स्थित एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ है। मार्कण्डेय पुराण में अनेक बार इसका उल्लेख 88000 ऋषियों की तपःस्थली के रूप में आया है। वायु पुराणान्तर्गत माघ माहात्म्य तथा बृहद्धर्मपुराण, पूर्व-भाग के अनुसार इसके किसी गुप्त स्थल में आज भी ऋषियों का स्वाध्यायानुष्ठान चलता है। लोमहर्षण के पुत्र सौति उग्रश्रवा ने यहीं ऋषियों को पौराणिक कथाएं सुनायी थीं।
'नैमिष' की व्युत्पत्ति 'निमिष' शब्द से बताई जाती है, क्योंकि गौरमुख ने एक निमिष में असुरों की सेना का संहार किया था (कर्निघम, आ.स.रि. भाग 1)।
एक अन्य अनुश्रुति के अनुसार इस स्थान पर अधिक मात्रा में पाए जानेवाले फल निमिष के कारण इसका नाम नैमिष पड़ा।
व्युत्पत्ति के विषय में तीसरा मत है कि असुरों के दलन के अवसर पर विष्णु के चक्र की निमि नैमिष में गिरी थी (मत्स्य २२/१२/१४, वायुपुराण १/१५, ब्रह्माण्ड पुराण १/२/८)।
प्रययुस्तस्य चक्रस्य यत्र नेमिर्व्यशीर्यत।
तद् वनं तेन विख्यातं नैमिषं मुनिपूजितम्॥
किंतु दूसरे आख्यान के अनुसार जब देवताओं का दल महादेव के नेतृत्व में ब्रह्मा के पास असुरों के आतंक से पीड़ित होकर पहुँचा, तो ब्रह्मा ने अपना चक्र छोड़ा और उन्हें वह स्थान तपस्या के लिए निर्देशित किया जहाँ चक्र गिरे। नैमिष में चक्र गिरा अत: वह स्थल आज भी चक्रतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। चक्रतीर्थ षट्कोणीय है। व्यास 120 फुट है। पवित्र जल नीचे के स्रोतों से आता है और एक नाले के द्वारा बाहर की ओर बहता रहता है, जिसे 'गोदावरी नाला' कहते हैं।
चक्र तीर्थ के अतिरिक्त व्यासगद्दी, ललिता देवी का मंदिर, भूतनाथ का मंदिर, कुशावर्त, ब्रह्मकुंड, जानकीकुंड और पंचप्रयाग आदि आकर्षक स्थल हैं।
नैमिषारण्य का प्रायः प्राचीनतम उल्लेख वाल्मीकि रामायण के युद्ध-काण्ड की पुष्पिका में प्राप्त होता है। पुष्पिका में उल्लेख है कि लव और कुश ने गोमती नदी के किनारे राम के अश्वमेध यज्ञ में सात दिनों में वाल्मीकि रचित काव्य का गायन किया।
महर्षि शौनक के मन में दीर्घकाल तक ज्ञान सत्र करने की इच्छा थी। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें एक चक्र दिया और कहा- `इसे चलाते हुए चले जाओ। जहां इस चक्र की `नेमि' (बाहरी परिधि) गिर जाय, उसी स्थल को पवित्र समझकर वहीं आश्रम बनाकर ज्ञान सत्र करो।' शौनकजी के साथ अदृसी सहस्र ऋषि थे। वे सब लोग उस चक्र को चलाते हुए भारत में घूमने लगे। गोमती नदी के किनारे एक तपोवन में चक्र की नेमि गिर गयी और वही वह चक्र भूमि में प्रवेश कर गया। चक्र की नेमि गिरने से वह तीर्थ 'नैमिष' कहा गया। जहां चक्र भूमि में प्रवेश कर गया, वह स्थान चक्रतीर्थ कहा जाता है। यह तीर्थ गोमती नदी के वाम तट पर है और 51 पितृस्थानों में से एक स्थान माना जाता है। यहां सोमवती अमावस्या को मेला लगता है।
शौनकजी को इसी तीर्थ में सूतजी ने अठारहों पुराणों की कथा सुनायी।
द्वापर में श्रीबलरामजी यहां पधारे थे। भूल से उनके द्वारा लोमहर्षण सूत की मृत्यु हो गयी। बलराम जी ने उनके पुत्र उग्रश्रवा को वरदान दिया कि वे पुराणों के वक्ता हों। और ऋषियों को सतानेवाले राक्षस बल्वल का वध किया। संपूर्ण भारत की तीर्थयात्रा करके बलराम जी फिर नैमिषारण्य आये और यहां उन्होंने यज्ञ किया।
अगली प्रातः यानी 6 दिसंबर को सबसे पहले चक्रतीर्थ पहुंचे और वहां स्नान करने के उपरांत नैमिषारण्य के प्रमुख तीर्थ स्थान व्यास गद्दी, ललिता देवी का मंदिर, भूतनाथ का मंदिर, ब्रह्मा कुंड तथा जानकी कुंड के दर्शन किए। मन हिंदू धर्म एवं इससे जुड़ी हुई अनेक कड़ियों को जानकर, महसूस कर आह्लादित था,आनंदित था।
दोपहर के भोजन के बाद हमारा दल अयोध्या के लिए रवाना हो गया। 6 दिसंबर की शाम होते-होते हम भगवान राम की नगरी अयोध्या पहुंच गए।
लायक राम शर्मा
शिमला
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