शाली माता मंदिर शिमला

शाली माता मंदिर शिमला...
शाली माता मंदिर गाँव दलाना, पंचायत खटनोल, तहसील सुन्नी, जिला शिमला, हिमाचल प्रदेश में शाली टिब्बा पर स्थित है। शाली टिब्बा की समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 9420 फीट है। यह अकेली चोटी वृहद् हिमालय के मनोरम 360 डिग्री दृश्य के लिए एक शानदार एवं सुविधाजनक स्थान प्रदान करती है। शाली मंदिर पहुँचने के लिए खटनोल से 3 घंटे और मशोबरा से 7 घंटे का पैदल मार्ग है।माता शाली देवी को माँ भीमा काली का स्वरूप कहा जाता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए देवदार, मौरू एवं बान के पेड़ों से घिरा रास्ता श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। माता के दर्शन करने के लिए देश विदेश से लोग यहां आते हैं व माता से मन्नत मांगते हैं।
 मां शाली देवी के मंदिर में मांगी गई मन्नत जल्द ही पूरी हो जाती है। मां शाली को समस्त रोगों की हर्ता माना जाता है व लोगों की इस स्थान के प्रति बड़ी आस्था है। 
ऐसी मान्यता है कि वर्षो पहले दलाणा गांव के प्रसिद्ध विद्वान बदरा पंडित सराहन से देवी को यहां लाए थे तथा माता की मूर्ति दलाणा में स्थापित की गई थी। इसके बाद देवी के आदेश से स्थानीय लोगों ने 9420 फुट ऊंचाई वाली शाली नामक चोटी पर मंदिर बनाया। पहले इस स्थान पर देवी माता का एक छोटा सा मंदिर हुआ करता था, लेकिन अब माँ भीमाकाली मंदिर विकास समिति दलाणा के प्रयासों से परिसर का विकास किया जा रहा है। अब यहां पर 200 से 250 श्रद्धालुओं के ठहरने की सुविधा उपलब्ध है। वर्तमान समय में मंदिर परिसर में यात्रियों की सुविधा हेतु दो सराय भवन और कैंटीन की सुविधा उपलब्ध है। मंदिर में एक पुजारी और चौकीदार स्थायी रूप से कार्यरत है।
माता शाली देवी मंदिर शिमला से करीब 50 किलोमीटर दूर है। यहां पहुंचने के लिए शिमला से खटनोल ग्राम तक सड़क सुविधा उपलब्ध है। खटनोल पहुंचने के बाद मंदिर जाने के लिए तीन घंटे का पैदल रास्ता है। हालाँकि यह रास्ता कठिन है, लेकिन देवदार बान और मौरू के पेड़ों के बीच का यह सफ़र अपने आप में मनमोहक प्रतीत होता है। जैसे-जैसे आप ऊँचाई पर चढ़ते जाते हैं ,चारों ओर का दृश्य आपकी थकान को कम कर देता। आप भी जरूर इस दिव्य धाम का दर्शन कर पुण्य के भागीदार बनें एवं माता शाली का आशीर्वाद प्राप्त करें!

जय मां शाली !!!
जय मां भीमाकाली !!!

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण……12-12-2023

 भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण….12-12-2023

एकता तीर्थ यात्रा संगम सुंदर नगर के बैनर तले इस भारत दर्शन यात्रा का आज दसवां दिन था। हम बिहार राज्य के सबसे पवित्र स्थल गया पहुंच चुके थे। यह यात्रा का ऐसा पड़ाव था, जहां अपने कुल के पितरों (पूर्वजों) के उद्धार हेतु हमें अगले तीन दिन तक पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण की प्रक्रिया पूर्ण करनी थी। हिंदू धर्म मान्यताओं के अनुसार ऐसा माना जाता है कि प्रत्येक हिंदू को जीवन में कम से कम एक बार अपने पितरों के उद्धार हेतु गया में पिंडदान श्राद्ध एवं तर्पण करना चाहिए।

 गया भारत के बिहार राज्य में स्थित एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यह गया ज़िले का मुख्यालय और बिहार राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। इस क्षेत्र के लोग मगही भाषा बोलते हैं। यह भारत के अतंरराष्ट्रीय पर्यटक स्थलों में से एक है। इस नगर का हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्मों में अत्यंत महत्व है। शहर का उल्लेख रामायण और महाभारत में भी मिलता है। गया तीन ओर से छोटी व पथरीली पहाड़ियों से घिरा है, जिनके नाम मंगला-गौरी, श्रृंग स्थान, रामशिला अथवा ब्रह्मयोनि हैं। नगर के पूर्व में फल्गू नदी बहती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए भारत में 55 स्थानों को महत्वपूर्ण माना गया है, लेकिन फल्गु नदी के तट पर स्थित गया शहर का अपना विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि सर्वपितृ अमावस्या के दिन गया में पिंडदान करने से 108 कुल और 7 पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है। पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए इस स्थान को मोक्ष स्थली कहा जाता है। पुराणों में बताया गया है कि प्राचीन शहर गया में भगवान विष्णु स्वयं पितृदेव के रूप में निवास करते हैं।

गया में श्राद्ध कर्म, तर्पण विधि और पिंडदान करने के बाद कुछ भी शेष नहीं रह जाता है और यहां से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त हो जाता है। गया का महत्व इसी से पता चलता है कि फल्गु नदी के तट पर भगवान राम और माता सीता ने राजा दशरथ की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए यहीं पर श्राद्ध कर्म और पिंडदान किया था। महाभारत काल में पांडवों ने भी इसी स्थान पर श्राद्ध कर्म किया था।

 वायु पुराण, गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण में भी गया शहर का महत्व बताया गया है। गया शहर में हर साल पितृपक्ष के दौरान एक बार मेला लगता है, जिसे पितृपक्ष का मेला भी कहा जाता है। गया शहर हिंदुओं के साथ साथ बौद्ध धर्म के लिए भी पवित्र स्थल है। बोधगया को भगवान बुद्ध की भूमि भी कहा जाता है। यहां पर बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने अपनी शैली में कई मंदिरों का निर्माण करवाया है।

गया शहर के संबंध में एक पौराणिक कथा प्रचलित है। इसके अनुसार गयासुर नामक एक असुर ने कड़ी तपस्या की थी और ब्रह्माजी से वरदान मांगा कि उसका शरीर पवित्र हो जाए और लोग उसके दर्शन कर पाप मुक्त हो जाएं। इस वरदान के बाद लोगों में भय खत्म हो गया और वो पाप करने लगे। पाप करने के बाद वह गयासुर के दर्शन करते और पाप मुक्त हो जाते थे। ऐसा होने से स्वर्ग और नरक का संतुलन बिगड़ने लगा। बड़े-बड़े पापी भी स्वर्ग पहुंचने लगे। इन सबसे बचने के लिए देवतागण गयासुर के पास पहुंचे और यज्ञ के लिए पवित्र स्थान की मांग की। गयासुर ने अपना शरीर ही देवताओं को यज्ञ के लिए दे दिया और कहा कि आप मेरे ऊपर ही यज्ञ करें। जब गयासुर लेटा तो उसका शरीर पांच कोस में फैल गया और यही पांच कोस आगे चलकर गया बन गया। एक कोस क्षेत्र गया-सिर माना जाता है। ढाई कोस तक गया है और पांच कोस तक गया-क्षेत्र है। इसी के मध्य में सब तीर्थ आ जाते हैं।

 गयासुर के पुण्य प्रभाव से वह स्थान तीर्थ के रूप में जाना गया। गया में पहले विविध नामों से 360 वेदियां थी लेकिन अब केवल 54 ही शेष बची हैं। गया में भगवान विष्णु गदाधर के रूप में विराजमान हैं। गयासुर के विशुद्ध शरीर में ब्रह्मा, जनार्दन, शिव तथा प्रपितामह निवास करते हैं। इसलिए पिंडदान व श्राद्ध कर्म के लिए इस स्थान को उत्तम माना गया है।

हिंदू धर्म मान्यता के अनुसार पितर कामना करते हैं कि उनके वंश में कोई ऐसा पुत्र उत्पन्न हो, जो गया जाकर वहां उनका श्राद्ध करे। लोगों में यह भ्रांति घर कर गई है कि गया में पिंडदान करने के पश्चात फिर पितरों का वार्षिक श्राद्ध नहीं करना चाहिए। सच बात तो यह है कि गया में पिंडदान से पितरों की अक्षय तृप्ति होती है। इसलिए यदि उसके पश्चात वार्षिक श्राद्ध ना किया जाए तो श्राद्ध न करने का पाप नहीं होता, किंतु यदि वार्षिक श्राद्ध किया जाए तो वह उत्तम माना जाता है। इससे पितर प्रसन्न ही होते हैं।

अन्य हिंदू तीर्थ स्थलों की भांति गया में भी अलग-अलग क्षेत्र के तीर्थ पुरोहित हैं। इसलिए हम सर्वप्रथम अपने तीर्थ पुरोहित के पास गए और उनका आशीर्वाद लिया। तत्पश्चात पिंडदान की प्रक्रिया के लिए फल्गु के तट की तरफ रवाना हो गए। पूजा-पाठ की प्रक्रिया एवं हमारा मार्गदर्शन करने के लिए पंडित धीरेंद्र मिश्रा जी अगले तीन दिन तक हमारे साथ रहने वाले थे।

 फल्गु में स्नान करने के पश्चात पिंडदान की प्रक्रिया शुरू हुई। यहाँ फल्गु के तट पर पुनपुन और फल्गु दो वेदियां लगती है। पिंड को फल्गु नदी में प्रवाहित किया जाता है तथा इसके बाद तर्पण किया जाता है।

फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने के पश्चात हम 'गयासिर' नामक स्थान पर पहुंच गए। यह स्थान विष्णु पद मंदिर से दक्षिण में स्थित है। इस स्थान पर दो वेदियां लगती हैं।

 प्रथम वेदी गया सिर और द्वितीय गयाकूप। इसी बरामदे में एक छोटा कुंड है और गया सिर वेदि का पिंड इस कुंड में पड़ता है तथा यहां से पश्चिम एक घेरे में गया कूप है। गया कूप पिंड मुंडपृष्ठा नामक स्थान पर पड़ता है।

आज के दिन का हमारा अगला पड़ाव था गया का सबसे प्रसिद्ध  विष्णुपद मंदिर। महारानी अहिल्याबाई द्वारा बनाया गया यह काले पत्थर का अति सुंदर और आकर्षक मंदिर है। मंदिर के अंदर गयासुर की प्रार्थना के अनुसार भगवान विष्णु का चरण चिन्ह है। मंदिर का ऊपरी भाग गुम्बजाकार है, जो देखने में बहुत सुंदर मालूम होता है। मंदिर के ऊपर शिखर पर बाल गोविंद सेन नामक एक गयापाल की चढ़ाई हुई सोने की ध्वजा फहराती है। मंदिर के भीतरी भाग में चांदी से आच्छादित  एक अष्टकोण कुंड में विष्णु का चरण चिन्ह है। मंदिर के सामने के भाग में एक सभा मंडप है। चरण के ऊपर एक चांदी का छात्र सुशोभित है। मंदिर के सभा मंडप में और उसके बाहर दो बड़े घंटे लटक रहे हैं। यहां पर एक विचित्र बात का उल्लेख आवश्यक प्रतीत होता है और वह यह है कि सभा मंडप की छत से पानी की बूंद टपका करती है। जन श्रुति के अनुसार जिस तीर्थ का नाम हृदय में रखकर आप हाथ पसारिए आपके हाथ में एक-दो बूंद पानी की अवश्य गिरेगी।

विष्णु पद मंदिर के 16 वेदी नामक मंडप में 14 स्थान पर और पास के मंडप में दो स्थान पर पिंडदान होता है। वेदियों के नाम इस प्रकार से हैं।

कार्तिकपद, दक्षिणाग्निपद, गार्हपत्याग्निपद, आवहनीयाग्निपद, संध्याग्निपद, आवसंध्याग्निपद, सूर्यपद, चंद्रपद, गणेशपद, उदीचीपद, कण्वपद, मातंगपद, कौचपद, इंद्रपद, अगास्त्यपद और काश्यपद। इसके अतिरिक्त विष्णु पद मंदिर में रूद्रपद, ब्रह्मपद और विष्णुपद तीन वेदियों पर अलग से पिंडदान होता है। कुल मिला करके विष्णु पद मंदिर में 19 वेदियो पर पिंडदान होता है। यह एक लंबी प्रक्रिया है और यहां पर पिंडदान एवं दर्शन करने में बहुत समय लग गया।

हमारा आज का अंतिम पड़ाव था सूरजकुंड। विष्णु कुंड से लगभग थोड़ी दूरी पर यह सरोवर है इस कुंड का उत्तरी भाग उदीची मध्य भाग कनखल और दक्षिण भाग दक्षिण मानस तीर्थ कहलाता है इस कुंड के पश्चिम में एक मंदिर में सूर्य नारायण की चतुर्भुज मूर्ति है जिससे दक्षिणावर के कहते हैं।

सूर्यकुंड से 80 गज दक्षिण फल्गु किनारे जिव्हालोल तीर्थ है और यहां एक पीपल का वृक्ष है। सूरजकुंड में हमने पांच अलग-अलग वेदियों का पिंडदान किया। यह पांच वेदियां इस प्रकार से हैं। उत्तर मानस, दक्षिण मानस, जीव्हालोल, उदीची और  कनखल।गया में प्रथम दिन बहुत व्यस्त रहा और आज हमने लगभग 28 वेदियों पर पिंडदान किया।

लायक राम शर्मा

शिमला

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण....10/11-12-2023

भारत दर्शन यात्रा : एक संस्मरण....
10/11-12-2023
10 दिसम्बर की प्रात: हमारा दल काशी के लिए रवाना हो गया। आज का दिन सफ़र में ही बीत गया। चित्रकूट से काशी पहुंचने में लगभग आठ से दस घंटे का सफ़र तय करना पड़ता है। शाम ढलने तक हम वाराणसी पहुंच गए। सारे दिन के सफ़र की थकान के पश्चात हम सीधे अपने गंतव्य स्थान में विश्राम के लिए चले गये।
काशी नगरी वर्तमान वाराणसी शहर में स्थित पौराणिक नगरी है। इसे संसार के सबसे पुराने नगरों में माना जाता है। भारत की यह जगत प्रसिद्ध प्राचीन नगरी गंगा के उत्तरी तट पर उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी कोने में वरुणा और असी नदियों के गंगा संगम के बीच बसी हुई है। इस स्थान पर गंगा ने प्राय: चार मील का दक्षिण से उत्तर की ओर घुमाव लिया है और इसी घुमाव के ऊपर यह नगरी स्थित है। 
विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है। पुराणों के अनुसार यह आद्य वैष्णव स्थान है। पहले यह भगवान विष्णु (माधव) की पुरी थी। जहां श्रीहरि के आनंदाश्रु गिरे थे, वहां बिंदु सरोवर बन गया और प्रभु यहां बिंधुमाधव के नाम से प्रतिष्ठित हुए। 
ऐसी एक कथा है कि जब भगवान शंकर ने क्रुद्ध होकर ब्रह्माजी का पांचवां सिर काट दिया, तो वह उनके करतल से चिपक गया। बारह वर्षों तक अनेक तीर्थों में भ्रमण करने पर भी वह सिर उन से अलग नहीं हुआ। किंतु जैसे ही उन्होंने काशी की सीमा में प्रवेश किया, ब्रह्महत्या ने उनका पीछा छोड़ दिया और वह कपाल भी अलग हो गया। जहां यह घटना घटी, वह स्थान कपालमोचन-तीर्थ कहलाया। 
महादेव को काशी इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने इस पावन पुरी को विष्णुजी से अपने नित्य आवास के लिए मांग लिया। तब से काशी उनका निवास-स्थान बन गया।

एक अन्य कथा के अनुसार महाराज सुदेव के पुत्र राजा दिवोदास ने गंगा-तट पर वाराणसी नगर बसाया था। एक बार भगवान शंकर ने देखा कि पार्वती जी को अपने मायके (हिमालय-क्षेत्र) में रहने में संकोच होता है, तो उन्होंने किसी दूसरे सिद्ध क्षेत्र में रहने का विचार बनाया। उन्हें काशी अतिप्रिय लगी। वे यहां आ गए। भगवान शिव के सान्निध्य में रहने की इच्छा से देवता भी काशी में आ कर रहने लगे। राजा दिवोदास अपनी राजधानी काशी का आधिपत्य खो जाने से बड़े दु:खी हुए। उन्होंने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी से वरदान मांगा- देवता देवलोक में रहें, भूलोक मनुष्यों के लिए रहे। सृष्टिकर्ता ने "एवमस्तु" कह दिया। इसके फलस्वरूप भगवान शंकर और देवगणों को काशी छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। शिवजी मन्दराचल पर्वत पर चले तो गए परंतु काशी से उनका मोह कम नहीं हुआ। महादेव को उनकी प्रिय काशी में पुन: बसाने के उद्देश्य से चौंसठ योगिनियों, सूर्यदेव, ब्रह्माजी और नारायण ने बड़ा प्रयास किया। गणेशजी के सहयोग से अन्ततोगत्वा यह अभियान सफल हुआ। ज्ञानोपदेश पाकर राजा दिवोदास विरक्त हो गए। उन्होंने स्वयं एक शिवलिंग की स्थापना करके उस की अर्चना की और बाद में वे दिव्य विमान पर बैठकर शिवलोक चले गए। महादेव काशी वापस आ गए।

ऐसी मान्यता है कि काशी में कहीं पर भी मृत्यु के समय भगवान विश्वेश्वर (विश्वनाथजी) प्राणियों के दाहिने कान में तारक मन्त्र का उपदेश देते हैं। तारक मन्त्र सुन कर जीव भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है। यह मान्यता है कि केवल काशी ही सीधे मुक्ति देती है, जबकि अन्य तीर्थस्थान काशी की प्राप्ति कराके मोक्ष प्रदान करते हैं।
काशी की महिमा विभिन्न धर्म ग्रन्थों में गायी गयी है। काशी शब्द का अर्थ है, प्रकाश देने वाली नगरी। जिस स्थान से ज्ञान का प्रकाश चारों ओर फैलता है, उसे काशी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि काशी-क्षेत्र में देहान्त होने पर जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है । काशी-क्षेत्र की सीमा निर्धारित करने के लिए प्राचीन काल में पंचक्रोशी मार्ग का निर्माण किया गया। जिस वर्ष अधिमास लगता है, उस वर्ष इस महीने में पंचक्रोशी यात्रा की जाती है। पंचक्रोशी यात्रा करके भक्तगण भगवान शिव और उनकी नगरी काशी के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं।
 ऐसी मान्यता है कि पंचक्रोशी यात्रा से लौकिक और पारलौकिक अभीष्टि की सिद्धि होती है। अधिमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। लोक-भाषा में इसे मलमास कहा जाता है।
भगवान शिव की इस प्रिय नगरी के दर्शनों के लिए हम आतुर थे। बस सुबह का इंतज़ार बाकी था।
11 दिसंबर की सुबह हमारा यात्री दल बस से सर्वप्रथम गंगा घाट की तरफ रवाना हुआ। यहां पर मां गंगा अपने भव्य एवं दिव्य स्वरुप में विराजमान है। हम सभी ने मां गंगा में स्नान किया और स्टीमर के द्वारा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का इस्तेमाल करते हुए हम मणिकर्णिका घाट से होते हुए मंदिर परिसर में पहुंच गए। काशी विश्वनाथ की भव्यता और दिव्यता का वर्णन शब्दों में कर पाना मुश्किल है। देवाधिदेव महादेव को यहां साक्षात महसूस किया जा सकता है।
 गेट नंबर 3 से हमने मंदिर में प्रवेश किया। अभी तक हम जितने स्थानों पर गए उनमें सबसे बढ़िया व्यवस्था एवं सुरक्षा के प्रबंध यहां पर देखने को मिले। इस प्रकार अपनी यात्रा के दौरान (माया) हरिद्वार तथा अयोध्या के पश्चात हिंदुओं के तीसरे पवित्र शहर अर्थात तीसरी पुरी तथा देवाधिदेव महादेव के प्रथम ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ के दर्शन पूर्ण किए।
बाबा काशी विश्वनाथ जी के दर्शन के उपरांत हम वापस अपने होटल पहुंच गए और दिन का भोजन करने के पश्चात हमारा दल बिहार की पवित्र भूमि गया की तरफ रवाना हो गया। शाम तक हम गया पहुंच गए।
लायक राम शर्मा
शिमला

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण.....09-12-2023

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण.....
09-12-2023
चित्रकूट की अनुपम और अलौकिक सुंदरता का वर्णन करना शब्दों में संभव नहीं है। चित्रकूट मंदाकिनी नदी के किनारे पर बसा भारत के सबसे प्राचीन तीर्थस्थलों में से एक है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में 38.2 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला शांत और सुन्दर चित्रकूट प्रकृति और ईश्वर की अनुपम देन है। चारों ओर से विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं और वनों से घिरे चित्रकूट को अनेक आश्चर्यो की पहाड़ी कहा जाता है। मंदाकिनी नदी के किनार बने अनेक घाट विशेष कर रामघाट और कामतानाथ मंदिर में पूरे साल श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। अमावस्या के दिन का यहाँ विशेष महत्व माना जाता है। माना जाता है कि भगवान राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ अपने वनवास के चौदह वर्षो में ग्यारह वर्ष चित्रकूट में ही बिताए थे। इसी स्थान पर ऋषि अत्रि और सती अनसुइया ने ध्यान लगाया था। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने चित्रकूट में ही सती अनसुइया के घर जन्म लिया था। यहाँ इसी जिले से सटा हुआ एक स्थान राजापुर है जहाँ कुछ लोग तुलसीदासजी का जन्म स्थान बताते हैं। यहीं रामचरितमानस की मूल प्रति भी रखी हुई है।
 यहां सर्वप्रथम हम सती अनसूया के आश्रम पहुंचे। स्फटिक शिला से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर घने वनों से घिरा यह एकान्त आश्रम स्थित है। इस आश्रम में अत्रि मुनी, अनुसुइया, दत्तात्रेय और दुर्वासा मुनि की प्रतिमा स्थापित हैं। इस आश्रम के ठीक सामने गर्म पानी का एक बहुत विशालकाय कुंड है जिसमें हम सभी ने स्नान किया और मंदिर पहुंचकर माता अनुसूया के दर्शन किए।
 इसके पश्चात हमारा यात्री दल गुप्त गोदावरी के दर्शन के लिए रवाना हो गया। नगर से 18 किलोमीटर की दूरी पर गुप्त गोदावरी स्थित हैं। यहाँ दो गुफाएँ हैं। एक गुफा चौड़ी और ऊँची है। प्रवेश द्वार संकरा होने के कारण इसमें आसानी से नहीं घुसा जा सकता। गुफा के अंत में एक छोटा तालाब है जिसे गोदावरी नदी कहा जाता है। दूसरी गुफा लंबी और संकरी है, जिससे हमेशा पानी बहता रहता है। कहा जाता है कि इस गुफा के अंत में राम और लक्ष्मण ने दरबार लगाया था।
      गुप्त गोदावरी के दर्शन के पश्चात हम मंदाकिनी नदी के दर्शन के लिए चल पड़े। इस नदी पर अनेक घाट बने हुए हैं। यहां का सबसे प्रसिद्ध घाट रामघाट है।
राम घाट वह घाट है जहाँ प्रभु राम नित्य स्नान किया करते थे l इसी घाट पर राम भरत मिलाप मंदिर है। इसी घाट पर गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रतिमा भी है l मंदाकिनी नदी के तट पर बने रामघाट में अनेक धार्मिक क्रियाकलाप चलते रहते हैं। घाट में गेरूआ वस्त्र धारण किए साधु-सन्तों को भजन और कीर्तन करते देख बहुत अच्छा महसूस होता है। शाम को होने वाली यहां की आरती मन को काफी सुकून पहुँचाती है।
हमने भरत मंदिर पहुंचकर महात्मा भरत के दर्शन किए।
चित्रकूट भगवान राम की कर्म भूमि रही है और अपने वनवास के लगभग 11 वर्ष उन्होंने इसी स्थान पर बिताये थे। सचमुच सदियों पुरानी भगवान राम की यादों को आप आज भी उस मिट्टी में महसूस करते हैं। हमारा आज का रात्रि विश्राम भी चित्रकूट में ही होना था। इसलिए इस स्थान को निहारने का, इसको समझने का हमें और अधिक समय मिल गया।
आज का दिन सचमुच में काफी व्यस्त रहा क्योंकि चित्रकूट काफी व्यापक और फैला हुआ क्षेत्र है और यहां पर उपरोक्त वर्णित स्थानों के अतिरिक्त भी बहुत सारे धार्मिक महत्व के स्थल हैं। दिनभर हम अलग-अलग धार्मिक महत्व के स्थानों को घूमते रहे। शाम के भोजन से पहले जैसे ही सभी यात्री संध्याकालीन आरती एवं भजन के लिए एकत्रित हुए तो एकता तीर्थ यात्रा संगम के संचालक आदरणीय सुरजीत राम शर्मा जी ने अपने वक्तव्य में एक दुखद जानकारी साझा की। आज के दिन हमारे दल के एक साथी हम सभी को छोड़कर विष्णु लोक चले गए थे। यह समाचार सुनते ही हम सभी में शोक की लहर दौड़ गई। कुछ समझ नहीं आ रहा था। हालांकि भगवान राम की उस कर्मस्थली पर किसी का विष्णु धाम चले जाना अपने आप में सौभाग्य है, लेकिन हम सभी के लिए व्यथित कर देने वाला था।
 

लायक राम शर्मा
 शिमला

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण.....08-12-2023

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण....
 08-12-2023
     8 दिसंबर की प्रातः हमारा यात्री दल "एकता तीर्थ यात्रा संगम सुंदर नगर" के बैनर तले अयोध्या से प्रयागराज (इलाहाबाद) के लिए रवाना हुआ। अयोध्या से यह सफर लगभग 3 घंटे का है। भोर की प्रथम किरण के साथ हम प्रयागराज पहुंच गए। प्रयागराज, जिसका भूतपूर्व नाम इलाहाबाद था, उत्तर प्रदेश का प्रमुख नगर है। यह प्रयागराज ज़िले का मुख्यालय है और हिन्दुओं का एक मुख्य तीर्थस्थल है। हिन्दू धर्मग्रन्थों में वर्णित प्रयाग स्थल पवित्रतम नदी गंगा और यमुना के संगम पर स्थित है। यहीं सरस्वती नदी गुप्त रूप से संगम में मिलती है, अतः यह त्रिवेणी संगम कहलाता है, जहां प्रत्येक बारह वर्ष में कुंभ मेला लगता है। यहाँ हर छह वर्षों में अर्द्धकुम्भ और हर बारह वर्षों पर कुम्भ मेले का आयोजन होता है जिसमें विश्व के विभिन्न कोनों से करोड़ों श्रद्धालु पतितपावनी गंगा, यमुना और सरस्वती के पवित्र त्रिवेणी संगम में आस्था की डुबकी लगाने आते हैं।
   अतः इस नगर को संगमनगरी, कुंभनगरी, तंबूनगरी आदि नामों से भी जाना जाता है। प्रयागराज के पास मुगल बादशाह अकबर ने एक किला बनवाया और बस्ती बसायी जिसका नाम इलाहबाद रखा। बाद मे प्रयाग राज और इलाहबाद एक ही नाम से जाने जाने लगे। अक्टूबर 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसका नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया। 
हिन्दू मान्यता अनुसार, यहां सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने सृष्टि कार्य पूर्ण होने के बाद प्रथम यज्ञ किया था। शाब्दिक अर्थ के अनुसार 'प्र'अर्थात् प्रथम और 'याग' अर्थात् यज्ञ से मिलकर प्रयाग बना। उस स्थान का नाम प्रयाग पड़ा जहाँ भगवान श्री ब्रह्मा जी ने सृष्टि का सबसे पहला यज्ञ सम्पन्न किया था। इस पावन नगरी के अधिष्ठाता भगवान श्री विष्णु स्वयं हैं और वे यहाँ वेणीमाधव रूप में विराजमान हैं। भगवान के यहाँ बारह स्वरूप विद्यमान हैं जिन्हें 'द्वादश माधव' कहा जाता है। यह पावन नगरी सबसे बड़े हिन्दू सम्मेलन महाकुंभ की चार स्थलियों में से एक है, शेष तीन हरिद्वार, उज्जैन एवं नासिक हैं।
सर्वप्रथम हम सभी ने त्रिवेणी संगम में आस्था की डुबकी लगाई। तत्पश्चात संगम के नजदीक मुगलों द्वारा बनाए गए किले के अंदर अक्षयवट के दर्शन किए।
 यहां के सबसे प्रसिद्ध हैं - बड़े हनुमान जी। संगम के निकट स्थित यह एक अद्भुत एवं अपने प्रकार का अनोखा मन्दिर है। इस मन्दिर में हनुमान जी की लेटी हुई प्रतिमा है और उनके दर्शनार्थ लोगों को सीढियों से उतर कर नीचे जाना पड़ता है। यह प्रतिमा अत्यन्त विशाल एवं भव्य है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि अंग्रेज़ी शासन ने इस मंदिर को यहाँ से हटवाने के आदेश दिये, किन्तु जैसे-जैसे मूर्ति को हटाने के लिये खुदाई की जाने लगी; वैसे वैसे मूर्ति बाहर आने के बजाय अन्दर धंसती गयी। यही कारण हैं कि यह मंदिर गड्ढे में है। इस मंदिर में बजरंगबली जी के बहुत विशालकाय एवं अलौकिक विग्रह हैं।
भक्ति रस से सराबोर पूरा यात्री दल दोपहर के भोजन के पश्चात् चित्रकूट की तरफ रवाना हो गया। आज का रात्रि ठहराव चित्रकूट में होना था तथा सायं की बेला तक हम चित्रकूट में अपने गंतव्य पर पहुंच चुके थे।
लायक राम शर्मा
 शिमला।

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण.....07-12-2023

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण.....
07-12-2023

7 दिसंबर का दिन भगवान विष्णु के रामावतार की नगरी अयोध्या के दर्शन के लिए समर्पित था। अयोध्या सप्तपुरियों अर्थात् भारत के सात सबसे पवित्र एवं धार्मिक शहरों में से एक माना जाता है। अतः हिंदू धर्म एवं आस्था की प्रतीक इस नगरी को देखने के लिए हम लालायित थे।
अयोध्या भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में सरयू नदी के तट पर स्थित एक शहर है। यह अयोध्या ज़िले के साथ-साथ भारत के उत्तर प्रदेश के अयोध्या मंडल का प्रशासनिक मुख्यालय है।
अयोध्या को ऐतिहासिक रूप से साकेत के नाम से जाना जाता है । प्रारंभिक बौद्ध और जैन विहित ग्रंथों में उल्लेख है कि गौतम बुद्ध और भगवान महावीर इस शहर में आए और रहे । जैन ग्रंथों में इसे पांच तीर्थंकरों ऋषभनाथ, अजितनाथ, अभिनंदननाथ, सुमतिनाथ और अनंतनाथ की जन्मस्थली के रूप में भी वर्णित किया गया है।
 पौराणिक कथाओं में इसे चक्रवर्ती सम्राट भरत के साथ भी जोड़ा गया है।
 गुप्त काल के बाद से, कई स्रोतों में अयोध्या और साकेत का एक ही शहर के नाम के रूप में उल्लेख किया गया है।
पौराणिक शहर अयोध्या का उल्लेख रामायण में भी हुआ है। यह भगवान विष्णु के रामावतार की जन्मस्थली है। यही विश्वास अयोध्या को हिंदुओं के लिए अत्यंत पवित्र शहर के रूप में प्रतिष्ठित होने का मुख्य कारण है। राम के जन्मस्थान के रूप में मान्यता के कारण, अयोध्या को हिंदुओं के सात सबसे महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थलों अर्थात् सप्तपुरियों में से पहला माना गया है। 
ऐसा माना जाता है कि राम के कथित जन्म - स्थान पर एक मंदिर था, जिसे मुगल सम्राट बाबर या औरंगज़ेब के आदेश से ध्वस्त कर दिया गया था और उसके स्थान पर एक मस्जिद बनाई गई थी।
 1992 में, उस स्थान पर विवाद के कारण हिंदू भीड़ द्वारा मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया, जिसका उद्देश्य उस स्थान पर राम के एक भव्य मंदिर का पुनर्निर्माण करना था। सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ ने अगस्त से अक्तूबर, 2019 तक स्वामित्व मामलों की सुनवाई की और फैसला सुनाया कि कर रिकॉर्ड के अनुसार भूमि सरकार की थी, और इसे हिंदू मंदिर बनाने के लिए एक ट्रस्ट को सौंपने का आदेश दिया। इसने सरकार को वैकल्पिक 5 एकड़ देने का भी आदेश दिया। ध्वस्त बाबरी मस्जिद के बदले में अयोध्या में मस्जिद बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को ज़मीन दी जाएगी। राम मंदिर का निर्माण अगस्त 2020 में शुरू हुआ और निर्माण कार्य पूर्ण करके 22 जनवरी , 2024 में श्री राम लला की प्राण - प्रतिष्ठा भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व में पूर्ण हुई। इसके साथ ही पिछली पांच सदियों का विवाद खत्म हुआ। आज देश में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व में श्री राम जन्मभूमि अयोध्या में प्राण - प्रतिष्ठा का कार्य पूरा होने पर घर-घर दीप जला कर खुशियां मनाई गईं। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कलियुग में त्रेता युग का आगमन हो गया हो।
   7 दिसंबर को सुबह सर्वप्रथम भगवान राम के प्रति अपार श्रद्धा एवं भक्ति मन में लिए हमारा यात्री दल पवित्र सरयू नदी के तट पर गया और वहां पर सभी ने स्नान किया। मां सरयू का अलौकिक दर्शन कर सभी हर्षित थे। ऐसा माना जाता है कि सरयू के तट पर गऊदान का बहुत महत्त्व है। इसलिए हम में से बहुत सारे लोगों ने गऊदान किया।
तत्पश्चात अयोध्या के प्रसिद्ध मंदिर कनक - भवन तथा मां सीता की पावन रसोई को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मां सीता की रसोई में भगवान राम के चरित्र से संबंधित महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करने के पश्चात् हम एक बार वापस दोपहर के भोजन के लिए चले गए।
भोजन के उपरांत अब बारी थी निर्माणाधीन भव्य राम मंदिर के दर्शन की। हमारा काफिला पश्चिमी द्वार से राम मंदिर के दर्शन के लिए चल पड़ा। मन में उल्लास था। भगवान राम की जन्मस्थली को देखने के लिए हम आतुर थे। आखिरकार जीवन का वह पल आ गया जब हमें राम जन्मभूमि के साक्षात दर्शन का अलौकिक सौभाग्य मिला।
 पिछली लगभग पांच सदियों से विवादास्पद भूखंड पर हिंदुओं की आन बान और शान मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का भव्य मंदिर लगभग बन करके तैयार था। हालांकि हम मंदिर के अंदर नहीं जा सके और जिस स्थान पर रामलला की मूर्ति विराजमान थी हमने वहीं पर भगवान के दर्शन किए और हम दूसरी तरफ से बाहर निकल आए। भगवान राम के दर्शन के पश्चात् हम हनुमानगढ़ी गए जहां पर भगवान राम के प्रिय हिंदुओं के बजरंगबली विराजमान हैं। हनुमानगढ़ी एक छोटे से टीले पर विराजमान है जहां से हनुमान जी भगवान राम की नगरी अयोध्या पर आज भी नज़र रखते हैं। इसके पश्चात् अयोध्या के बाकी पावन स्थलों को निहारने के पश्चात् एक बार पुनः हम रात्रि विश्राम के लिए अपने गंतव्य स्थान की तरफ रवाना हो गए।
लायक राम शर्मा
 शिमला

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण.....05-06/12/2023

 भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण...

05-06/12/2023

5 दिसंबर को सुबह 4:00 बजे एकता तीर्थ यात्रा नैमिषारण्य तीर्थ के लिए रवाना हो गयी। हरिद्वार से नैमिषारण्य लगभग एक पूरे दिन का सफर है।

सफर लंबा और थका देने वाला था लेकिन इस बीच हमारा काफिला दोपहर के भोजन के लिए रुक गया। बहुत सारे श्रद्धालु भजन कीर्तन में जुट गए। दोपहर का भोजन करने के उपरांत एक बार पुनः यात्रा शुरू हुई और सांझ की बेला में अंततः हम नैमिषारण्य पहुंच गए। सफर की थकान बहुत थी इसलिए शाम का भोजन करने के उपरांत सभी लोग विश्राम के लिए चले गए।

  अगले दिन नैमिषारण्य तीर्थ को घूमना था और यहां की मनमोहक आबोहवा को महसूस करना था।

नैमिषारण्य लखनऊ से 80 किमी दूर लखनऊ क्षेत्र के अर्न्तगत सीतापुर जिला में गोमती नदी के बाएँ तट पर स्थित एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ है। मार्कण्डेय पुराण में अनेक बार इसका उल्लेख 88000 ऋषियों की तपःस्थली के रूप में आया है। वायु पुराणान्तर्गत माघ माहात्म्य तथा बृहद्धर्मपुराण, पूर्व-भाग के अनुसार इसके किसी गुप्त स्थल में आज भी ऋषियों का स्वाध्यायानुष्ठान चलता है। लोमहर्षण के पुत्र सौति उग्रश्रवा ने यहीं ऋषियों को पौराणिक कथाएं सुनायी थीं।

    'नैमिष' की व्युत्पत्ति 'निमिष' शब्द से बताई जाती है, क्योंकि गौरमुख ने एक निमिष में असुरों की सेना का संहार किया था (कर्निघम, आ.स.रि. भाग 1)।

 एक अन्य अनुश्रुति के अनुसार इस स्थान पर अधिक मात्रा में पाए जानेवाले फल निमिष के कारण इसका नाम नैमिष पड़ा। 

   व्युत्पत्ति के विषय में तीसरा मत है कि असुरों के दलन के अवसर पर विष्णु के चक्र की निमि नैमिष में गिरी थी (मत्स्य २२/१२/१४, वायुपुराण १/१५, ब्रह्माण्ड पुराण १/२/८)।

   प्रययुस्तस्य चक्रस्य यत्र नेमिर्व्यशीर्यत।

तद् वनं तेन विख्यातं नैमिषं मुनिपूजितम्॥


 किंतु दूसरे आख्यान के अनुसार जब देवताओं का दल महादेव के नेतृत्व में ब्रह्मा के पास असुरों के आतंक से पीड़ित होकर पहुँचा, तो ब्रह्मा ने अपना चक्र छोड़ा और उन्हें वह स्थान तपस्या के लिए निर्देशित किया जहाँ चक्र गिरे। नैमिष में चक्र गिरा अत: वह स्थल आज भी चक्रतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। चक्रतीर्थ षट्कोणीय है। व्यास 120 फुट है। पवित्र जल नीचे के स्रोतों से आता है और एक नाले के द्वारा बाहर की ओर बहता रहता है, जिसे 'गोदावरी नाला' कहते हैं। 

चक्र तीर्थ के अतिरिक्त व्यासगद्दी, ललिता देवी का मंदिर, भूतनाथ का मंदिर, कुशावर्त, ब्रह्मकुंड, जानकीकुंड और पंचप्रयाग आदि आकर्षक स्थल हैं।

नैमिषारण्य का प्रायः प्राचीनतम उल्लेख वाल्मीकि रामायण के युद्ध-काण्ड की पुष्पिका में प्राप्त होता है। पुष्पिका में उल्लेख है कि लव और कुश ने गोमती नदी के किनारे राम के अश्वमेध यज्ञ में सात दिनों में वाल्मीकि रचित काव्य का गायन किया।


महर्षि शौनक के मन में दीर्घकाल तक ज्ञान सत्र करने की इच्छा थी। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें एक चक्र दिया और कहा- `इसे चलाते हुए चले जाओ। जहां इस चक्र की `नेमि' (बाहरी परिधि) गिर जाय, उसी स्थल को पवित्र समझकर वहीं आश्रम बनाकर ज्ञान सत्र करो।' शौनकजी के साथ अदृसी सहस्र ऋषि थे। वे सब लोग उस चक्र को चलाते हुए भारत में घूमने लगे। गोमती नदी के किनारे एक तपोवन में चक्र की नेमि गिर गयी और वही वह चक्र भूमि में प्रवेश कर गया। चक्र की नेमि गिरने से वह तीर्थ 'नैमिष' कहा गया। जहां चक्र भूमि में प्रवेश कर गया, वह स्थान चक्रतीर्थ कहा जाता है। यह तीर्थ गोमती नदी के वाम तट पर है और 51 पितृस्थानों में से एक स्थान माना जाता है। यहां सोमवती अमावस्या को मेला लगता है।

शौनकजी को इसी तीर्थ में सूतजी ने अठारहों पुराणों की कथा सुनायी। 

   द्वापर में श्रीबलरामजी यहां पधारे थे। भूल से उनके द्वारा लोमहर्षण सूत की मृत्यु हो गयी। बलराम जी ने उनके पुत्र उग्रश्रवा को वरदान दिया कि वे पुराणों के वक्ता हों। और ऋषियों को सतानेवाले राक्षस बल्वल का वध किया। संपूर्ण भारत की तीर्थयात्रा करके बलराम जी फिर नैमिषारण्य आये और यहां उन्होंने यज्ञ किया।

अगली प्रातः यानी 6 दिसंबर को सबसे पहले चक्रतीर्थ पहुंचे और वहां स्नान करने के उपरांत नैमिषारण्य के प्रमुख तीर्थ स्थान व्यास गद्दी, ललिता देवी का मंदिर, भूतनाथ का मंदिर, ब्रह्मा कुंड तथा जानकी कुंड के दर्शन किए। मन हिंदू धर्म एवं इससे जुड़ी हुई अनेक कड़ियों को जानकर, महसूस कर आह्लादित था,आनंदित था।

 दोपहर के भोजन के बाद हमारा दल अयोध्या के लिए रवाना हो गया। 6 दिसंबर की शाम होते-होते हम भगवान राम की नगरी अयोध्या पहुंच गए।

लायक राम शर्मा 

शिमला 

भारत दर्शन यात्रा : एक संस्मरण..... 04-12-2023

भारत दर्शन यात्रा : एक संस्मरण.....
 04-12-2023
भारत दर्शन यात्रा के दूसरे दिन हमें हिंदुओं के अत्यंत पावन और महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थान कुरुक्षेत्र एवं पिहोवा का भ्रमण करना था। अतः सबसे पहले सुबह बस द्वारा हम पिहोवा की पावन धरा पर पहुंचे। 
पिहोवा (जिसका प्राचीन नाम पृथुदक तीर्थ है), कुरुक्षेत्र की 48 कोस परिक्रमा के अंतर्गत श्री कृष्ण और महाभारत से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण हिंदू तीर्थ स्थल है।
पिहोवा को उच्च महत्त्व का धार्मिक स्थान माना जाता है और इसके बारे में यह मान्यता है कि यह कई शताब्दियों पहले अर्थात् महाभारत युद्ध से पहले का शहर था। यह उन दिनों सूख चुकी सरस्वती नदी के तट पर विकसित हुआ था। इसके बावजूद यह अभी भी एक बहुत पवित्र स्थान था, जहाँ लोग अपने पूर्वजों को "पिंडदान" देते थे। इसे अभी भी "पितृधापक तीर्थ" कहा जाता है।
   किंवदंती है कि यह प्रयाग या गया से बहुत पहले किए जाने वाले पितृ तर्पणों के लिए सबसे पवित्र स्थान था। ऐसा माना जाता है कि युद्ध शुरू होने से पहले भगवान श्रीकृष्ण पांडवों को इस स्थान पर ले गए थे और उन्हें सरस्वती माता और उनके पूर्वजों का आशीर्वाद दिलाया था। महाभारत के दौरान कुरुक्षेत्र के युद्ध में अपने प्राणों की आहूति देने वाले सैनिकों का पिहोवा में अंतिम संस्कार किया गया था।
इस शहर में सरस्वती सरोवर स्थित है, जहाँ लोग पूजा और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। सरस्वती मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगे स्तंभ कई सदियों पुराने हैं।
 पिहोवा सभी हिंदुओं के साथ-साथ सिखों के लिए भी एक पवित्र तीर्थ स्थल माना जाता है। सरस्वती नदी के तट पर पृथुदक/पिहोवा तीर्थ में हिंदू वंशावली रजिस्टर रखे गए हैं जिनसे प्रत्येक हिंदू अपने वंश से संबंधित जानकारी प्राप्त कर सकता है। अतः पिहोवा का पिंडदान एवं तर्पण हेतु अत्यंत महत्त्व माना जाता है। 
हमारी यात्रा में उपस्थित लगभग सभी श्रद्धालुओं ने पिहोवा में पवित्र कुंड में स्नान करने के उपरांत पिंडदान एवं तर्पण की प्रक्रिया पूर्ण की। तत्पश्चात हम वापस कुरुक्षेत्र पहुंच गए।

कुरुक्षेत्र का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता के पहले श्लोक में 'धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र'  के रूप में किया गया है। कुरुक्षेत्र एक महान ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व का स्थान है जिसे वेदों और वैदिक संस्कृति के साथ जुड़े होने के कारण सभी देशों में श्रद्धा के साथ देखा जाता है। यह वह भूमि है जिस पर महाभारत की लड़ाई लड़ी गई थी और भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ज्योतिसर में कर्म के दर्शन का ज्ञान दिया था। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, कुरुक्षेत्र 48 कोस में फैला एक विशाल क्षेत्र है, जिसमें कई तीर्थ स्थान, मंदिर और पवित्र सरोवर शामिल हैं, जिनके साथ पांडवों और कौरवों तथा महाभारत युद्ध से जुड़ी कई घटनाओं / अनुष्ठानों का संबंध रहा है। कुरुक्षेत्र का आर्य सभ्यता और पवित्र सरस्वती के उद्गम के साथ, इसके विकास से गहरा संबंध है। यह वह भूमि है जहाँ मनुस्मृति ऋषि मनु द्वारा लिखी गई थी और ऋग्वेद का संकलन, सामवेद ज्ञानी ऋषियों द्वारा किया गया था। कुरुक्षेत्र का नाम राजा कुरु के नाम पर रखा गया है जिसने इस भूमि और इसके लोगों की समृद्धि के लिए महान बलिदान दिए।
कुरुक्षेत्र भारत के इतिहास जितना पुराना है। डॉ० आर.सी. मजूमदार के अनुसार, “यह भारत में आर्यों के आव्रजन से पहले भी एक धार्मिक केंद्र था।”

कुरुक्षेत्र पहुंचने पर हमने यहां के अत्यंत महत्त्वपूर्ण ब्रह्म सरोवर एवं ज्योतिसार के दर्शन किये। इसके पश्चात हमारा यात्री - दल दोपहर के भोजन के पश्चात हरिद्वार की तरफ बढ़ गया।
 शाम को हरिद्वार में हम सभी ने गंगा स्नान किया तथा गंगा आरती में भाग लिया। इसके उपरांत हम रात्रि विश्राम के लिए अपने गंतव्य स्थान की तरफ रवाना हो गए।

हरिद्वार, उत्तराखण्ड के हरिद्वार जिले का एक पवित्र नगर तथा सनातन (हिन्दुओं) का प्रमुख तीर्थ है। यह हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों अर्थात् सप्तपुरियों में से एक है। 3139 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने स्रोत गोमुख (गंगोत्री हिमनद) से 256 किमी की यात्रा करके गंगा नदी हरिद्वार में मैदानी क्षेत्र में प्रथम प्रवेश करती है, इसलिए हरिद्वार को 'गंगाद्वार' के नाम से भी जाना जाता है। हरिद्वार का अर्थ "हरि (ईश्वर) का द्वार" होता है।
पश्चात्कालीन हिंदू धार्मिक कथाओं के अनुसार, हरिद्वार वह स्थान है जहाँ अमृत की कुछ बूँदें भूल से घड़े से गिर गयीं, जब धन्वन्तरी उस घड़े को समुद्र मंथन के बाद ले जा रहे थे। ध्यातव्य है कि कुम्भ या महाकुम्भ से सम्बद्ध कथा का उल्लेख किसी पुराण में नहीं है। प्रक्षिप्त रूप में ही इसका उल्लेख होता रहा है। अतः कथा का रूप भी भिन्न-भिन्न रहा है। 
एक मान्यता के अनुसार वह स्थान जहाँ पर अमृत की बूंदें गिरी थीं उसे हर की पौड़ी पर ब्रह्म कुण्ड माना जाता है।
 'हर की पौड़ी' हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट माना जाता है जहाँ गंगा का मंदिर भी है। हर की पौड़ी पर लाखों यात्री स्नान करते हैं और यहाँ का पवित्र गंगा जल देश के प्राय: सभी स्थानो में यात्रियों द्वारा ले जाया जाता है। प्रति वर्ष चैत्र में मेष संक्रांति के समय मेला लगता है जिसमें लाखों यात्री इकट्ठे होते हैं। प्रति बारह वर्षों पर जब सूर्य और चंद्र मेष राशि में और बृहस्पति कुंभ राशि में स्थित होते हैं, तब यहां कुंभ का मेला लगता है। उसके छठे वर्ष अर्धकुंभ का मेला भी लगता है। इनमें कई लाख यात्री इकट्ठे होते और गंगा में स्नान करते हैं। यहाँ अनेक मंदिर और देवस्थल हैं। माया देवी का मंदिर पत्थर का बना हुआ है। संभवत: यह 10वीं शताब्दी का बना होगा। इस मंदिर में माया देवी की मूर्ति स्थापित है। इस मूर्ति के तीन मस्तक और चार हाथ हैं।
 लोगों का विश्वास है कि यहाँ मरनेवाला प्राणी परमपद पाता है और स्नान से जन्म-जन्मांतर का पाप कट जाता है और परलोक में हरिपद की प्राप्ति होती है।
हरिद्वार तीर्थ के रूप में बहुत प्राचीन तीर्थ है परंतु नगर के रूप में यह बहुत प्राचीन नहीं है। हरिद्वार नाम भी उत्तर पौराणिक काल में ही प्रचलित हुआ है। महाभारत में इसे केवल 'गंगाद्वार' ही कहा गया है। पुराणों में इसे गंगाद्वार, मायाक्षेत्र, मायातीर्थ, सप्तस्रोत तथा कुब्जाम्रक के नाम से वर्णित किया गया है। प्राचीन काल में कपिलमुनि के नाम पर इसे 'कपिला' भी कहा जाता था। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ कपिल मुनि का तपोवन था। 
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगीरथ ने, जो सूर्यवंशी राजा सगर के प्रपौत्र (श्रीराम के एक पूर्वज) थे, गंगाजी को सतयुग में वर्षों की तपस्या के पश्चात् अपने 60000 पूर्वजों के उद्धार और कपिल ऋषि के शाप से मुक्त करने के लिए पृथ्वी पर लाया।
 'हरिद्वार' नाम का संभवतः प्रथम प्रयोग पद्मपुराण में हुआ है। पद्मपुराण के उत्तर खंड में गंगा-अवतरण के एक प्रसंग में हरिद्वार की अत्यधिक प्रशंसा करते हुए उसके सर्वश्रेष्ठ तीर्थ होने की बात कही गयी है।
ह्युनसांग भी सातवीं शताब्दी में हरिद्वार आया था और इसका वर्णन उसने 'मोन्यु-लॉ' नाम से किया है। मोन्यू-लॉ को आधुनिक मायापुरी गाँव समझा जाता है जो हरिद्वार के निकट में ही है। प्राचीन किलों और मंदिरों के अनेक खंडहर यहाँ आज भी विद्यमान हैं।
 प्रकृतिप्रेमियों के लिए हरिद्वार स्वर्ग जैसा सुन्दर है। हरिद्वार भारतीय संस्कृति और सभ्यता का एक बहुरूपदर्शन प्रस्तुत करता है। यह चार धाम यात्रा के लिए प्रवेश द्वार भी है (उत्तराखंड के चार धाम हैं: बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री)। इसलिए भगवान शिव के अनुयायी और भगवान विष्णु के अनुयायी इसे क्रमशः हरद्वार और हरिद्वार के नाम से पुकारते हैं -- हर अर्थात् शिव (केदारनाथ) और हरि अर्थात् विष्णु (बद्रीनाथ) तक जाने का द्वार।
हिंदुओं की ऐसी मान्यता है कि कोई भी धार्मिक यात्रा जगत के स्वामी भगवान विष्णु की नगरी हरिद्वार से शुरू होती है तथा यहीं पर आकर संपन्न होती है; इसी आशय के साथ हमारी यात्रा का औपचारिक श्री गणेश भी हरिद्वार से ही हुआ। आज का दिन बहुत व्यस्त रहा, थका देने वाला रहा इसलिए सभी यात्री भोजन के पश्चात रात्रि विश्राम के लिए चले गए।
लायक राम शर्मा
 शिमला

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण.... 03-12-2023

भारत दर्शन यात्रा : एक संस्मरण.....
03-12-2023).....
3 दिसंबर सन् 2023 को एकता तीर्थ यात्रा संगम सुंदरनगर के बैनर तले भारत दर्शन या तीन धाम यात्रा की शुरुआत शिमला से हुई।
  मैं अपनी माताजी,धर्मपत्नी, मामा-मामी तथा चाची जी के साथ मशोबरा से संकट मोचन तारा देवी के लिए रवाना हुआ। वहां से बस के माध्यम से हमें कुरुक्षेत्र जाना था। मन में एक उल्लास था और हल्का सा डर भी। यह एक ऐसी अद्भुत यात्रा की शुरुआत थी जिसमें हमें लगभग 55 दिन घर से बाहर रहना था- एक बिल्कुल अनजान माहौल ; बिल्कुल नए लोगों के साथ....पूरे भारत का भ्रमण करना था।
 संकट मोचन पहुंचते ही हमारी यात्रा की दो बसें खड़ी थीं और यात्री दल एक-एक करके बस में आ रहे थे तथा पहले से आरक्षित सीटों पर बैठकर अपने साजो़ सामान को रख रहे थे। धीरे-धीरे बस भरनी शुरू हुई और इसके साथ ही हमारी आगामी यात्रा की शुरूआत हो गई।
शोघी के पास यात्रियों का एक और दल बस में शामिल हुआ। तत्पश्चात वाकनाघाट, कंडाघाट, सोलन, सुबाठु और अंततः परवाणु से यात्रियों ने अपनी-अपनी बस में सवार होकर अपना सफर शुरू किया।
 आज का दिन हम सबके लिए खास था। नए-नए चेहरे हमारे सामने थे। बस के चालक-परिचालक भी नए थे। इस प्रकार पहले दिन हम कुरुक्षेत्र पहुंच गए और वहां पर रात्रि विश्राम हुआ। भोजन से पहले सभी यात्री इकट्ठा हुए और एकता तीर्थ यात्रा संगम के संचालक श्री सुरजीत राम शर्मा जी ने सभी यात्रियों को संबोधित किया। उन्होंने विस्तार पूर्वक इस धार्मिक यात्रा तथा इससे संबंधित आवश्यक दिशा निर्देश प्रदान किये।
मन में एक अजीबोगरीब कशमकश थी। दिमाग विचार शून्य था।
 यात्रा आगे कैसे होगी ? भविष्य के प्रति अनेकों विचार मन में उमड़ रहे थे। इसी जद्दोजहद में हम सब रात्रि विश्राम के लिए अपने-अपने बिस्तर में चले गए।
लायक राम शर्मा
शिमला।

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 23 जनवरी 2024

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 23 जनवरी 2024 अगली प्रातः हमारा यात्री दल सुबह-सबेरे ही कृष्ण जन्मभूमि मथुरा में दर्शन के लिए पहुँच गया। आज का...