भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण...
05-06/12/2023
5 दिसंबर को सुबह 4:00 बजे एकता तीर्थ यात्रा नैमिषारण्य तीर्थ के लिए रवाना हो गयी। हरिद्वार से नैमिषारण्य लगभग एक पूरे दिन का सफर है।
सफर लंबा और थका देने वाला था लेकिन इस बीच हमारा काफिला दोपहर के भोजन के लिए रुक गया। बहुत सारे श्रद्धालु भजन कीर्तन में जुट गए। दोपहर का भोजन करने के उपरांत एक बार पुनः यात्रा शुरू हुई और सांझ की बेला में अंततः हम नैमिषारण्य पहुंच गए। सफर की थकान बहुत थी इसलिए शाम का भोजन करने के उपरांत सभी लोग विश्राम के लिए चले गए।
अगले दिन नैमिषारण्य तीर्थ को घूमना था और यहां की मनमोहक आबोहवा को महसूस करना था।
नैमिषारण्य लखनऊ से 80 किमी दूर लखनऊ क्षेत्र के अर्न्तगत सीतापुर जिला में गोमती नदी के बाएँ तट पर स्थित एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ है। मार्कण्डेय पुराण में अनेक बार इसका उल्लेख 88000 ऋषियों की तपःस्थली के रूप में आया है। वायु पुराणान्तर्गत माघ माहात्म्य तथा बृहद्धर्मपुराण, पूर्व-भाग के अनुसार इसके किसी गुप्त स्थल में आज भी ऋषियों का स्वाध्यायानुष्ठान चलता है। लोमहर्षण के पुत्र सौति उग्रश्रवा ने यहीं ऋषियों को पौराणिक कथाएं सुनायी थीं।
'नैमिष' की व्युत्पत्ति 'निमिष' शब्द से बताई जाती है, क्योंकि गौरमुख ने एक निमिष में असुरों की सेना का संहार किया था (कर्निघम, आ.स.रि. भाग 1)।
एक अन्य अनुश्रुति के अनुसार इस स्थान पर अधिक मात्रा में पाए जानेवाले फल निमिष के कारण इसका नाम नैमिष पड़ा।
व्युत्पत्ति के विषय में तीसरा मत है कि असुरों के दलन के अवसर पर विष्णु के चक्र की निमि नैमिष में गिरी थी (मत्स्य २२/१२/१४, वायुपुराण १/१५, ब्रह्माण्ड पुराण १/२/८)।
प्रययुस्तस्य चक्रस्य यत्र नेमिर्व्यशीर्यत।
तद् वनं तेन विख्यातं नैमिषं मुनिपूजितम्॥
किंतु दूसरे आख्यान के अनुसार जब देवताओं का दल महादेव के नेतृत्व में ब्रह्मा के पास असुरों के आतंक से पीड़ित होकर पहुँचा, तो ब्रह्मा ने अपना चक्र छोड़ा और उन्हें वह स्थान तपस्या के लिए निर्देशित किया जहाँ चक्र गिरे। नैमिष में चक्र गिरा अत: वह स्थल आज भी चक्रतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। चक्रतीर्थ षट्कोणीय है। व्यास 120 फुट है। पवित्र जल नीचे के स्रोतों से आता है और एक नाले के द्वारा बाहर की ओर बहता रहता है, जिसे 'गोदावरी नाला' कहते हैं।
चक्र तीर्थ के अतिरिक्त व्यासगद्दी, ललिता देवी का मंदिर, भूतनाथ का मंदिर, कुशावर्त, ब्रह्मकुंड, जानकीकुंड और पंचप्रयाग आदि आकर्षक स्थल हैं।
नैमिषारण्य का प्रायः प्राचीनतम उल्लेख वाल्मीकि रामायण के युद्ध-काण्ड की पुष्पिका में प्राप्त होता है। पुष्पिका में उल्लेख है कि लव और कुश ने गोमती नदी के किनारे राम के अश्वमेध यज्ञ में सात दिनों में वाल्मीकि रचित काव्य का गायन किया।
महर्षि शौनक के मन में दीर्घकाल तक ज्ञान सत्र करने की इच्छा थी। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें एक चक्र दिया और कहा- `इसे चलाते हुए चले जाओ। जहां इस चक्र की `नेमि' (बाहरी परिधि) गिर जाय, उसी स्थल को पवित्र समझकर वहीं आश्रम बनाकर ज्ञान सत्र करो।' शौनकजी के साथ अदृसी सहस्र ऋषि थे। वे सब लोग उस चक्र को चलाते हुए भारत में घूमने लगे। गोमती नदी के किनारे एक तपोवन में चक्र की नेमि गिर गयी और वही वह चक्र भूमि में प्रवेश कर गया। चक्र की नेमि गिरने से वह तीर्थ 'नैमिष' कहा गया। जहां चक्र भूमि में प्रवेश कर गया, वह स्थान चक्रतीर्थ कहा जाता है। यह तीर्थ गोमती नदी के वाम तट पर है और 51 पितृस्थानों में से एक स्थान माना जाता है। यहां सोमवती अमावस्या को मेला लगता है।
शौनकजी को इसी तीर्थ में सूतजी ने अठारहों पुराणों की कथा सुनायी।
द्वापर में श्रीबलरामजी यहां पधारे थे। भूल से उनके द्वारा लोमहर्षण सूत की मृत्यु हो गयी। बलराम जी ने उनके पुत्र उग्रश्रवा को वरदान दिया कि वे पुराणों के वक्ता हों। और ऋषियों को सतानेवाले राक्षस बल्वल का वध किया। संपूर्ण भारत की तीर्थयात्रा करके बलराम जी फिर नैमिषारण्य आये और यहां उन्होंने यज्ञ किया।
अगली प्रातः यानी 6 दिसंबर को सबसे पहले चक्रतीर्थ पहुंचे और वहां स्नान करने के उपरांत नैमिषारण्य के प्रमुख तीर्थ स्थान व्यास गद्दी, ललिता देवी का मंदिर, भूतनाथ का मंदिर, ब्रह्मा कुंड तथा जानकी कुंड के दर्शन किए। मन हिंदू धर्म एवं इससे जुड़ी हुई अनेक कड़ियों को जानकर, महसूस कर आह्लादित था,आनंदित था।
दोपहर के भोजन के बाद हमारा दल अयोध्या के लिए रवाना हो गया। 6 दिसंबर की शाम होते-होते हम भगवान राम की नगरी अयोध्या पहुंच गए।
लायक राम शर्मा
शिमला
हिंदू तीर्थस्थल संबंधी लोमहर्षक एवं प्रगाढ़ विवरण , अत्यंत रूचिकर , साधुवाद ।
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