भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण....10/11-12-2023

भारत दर्शन यात्रा : एक संस्मरण....
10/11-12-2023
10 दिसम्बर की प्रात: हमारा दल काशी के लिए रवाना हो गया। आज का दिन सफ़र में ही बीत गया। चित्रकूट से काशी पहुंचने में लगभग आठ से दस घंटे का सफ़र तय करना पड़ता है। शाम ढलने तक हम वाराणसी पहुंच गए। सारे दिन के सफ़र की थकान के पश्चात हम सीधे अपने गंतव्य स्थान में विश्राम के लिए चले गये।
काशी नगरी वर्तमान वाराणसी शहर में स्थित पौराणिक नगरी है। इसे संसार के सबसे पुराने नगरों में माना जाता है। भारत की यह जगत प्रसिद्ध प्राचीन नगरी गंगा के उत्तरी तट पर उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी कोने में वरुणा और असी नदियों के गंगा संगम के बीच बसी हुई है। इस स्थान पर गंगा ने प्राय: चार मील का दक्षिण से उत्तर की ओर घुमाव लिया है और इसी घुमाव के ऊपर यह नगरी स्थित है। 
विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है। पुराणों के अनुसार यह आद्य वैष्णव स्थान है। पहले यह भगवान विष्णु (माधव) की पुरी थी। जहां श्रीहरि के आनंदाश्रु गिरे थे, वहां बिंदु सरोवर बन गया और प्रभु यहां बिंधुमाधव के नाम से प्रतिष्ठित हुए। 
ऐसी एक कथा है कि जब भगवान शंकर ने क्रुद्ध होकर ब्रह्माजी का पांचवां सिर काट दिया, तो वह उनके करतल से चिपक गया। बारह वर्षों तक अनेक तीर्थों में भ्रमण करने पर भी वह सिर उन से अलग नहीं हुआ। किंतु जैसे ही उन्होंने काशी की सीमा में प्रवेश किया, ब्रह्महत्या ने उनका पीछा छोड़ दिया और वह कपाल भी अलग हो गया। जहां यह घटना घटी, वह स्थान कपालमोचन-तीर्थ कहलाया। 
महादेव को काशी इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने इस पावन पुरी को विष्णुजी से अपने नित्य आवास के लिए मांग लिया। तब से काशी उनका निवास-स्थान बन गया।

एक अन्य कथा के अनुसार महाराज सुदेव के पुत्र राजा दिवोदास ने गंगा-तट पर वाराणसी नगर बसाया था। एक बार भगवान शंकर ने देखा कि पार्वती जी को अपने मायके (हिमालय-क्षेत्र) में रहने में संकोच होता है, तो उन्होंने किसी दूसरे सिद्ध क्षेत्र में रहने का विचार बनाया। उन्हें काशी अतिप्रिय लगी। वे यहां आ गए। भगवान शिव के सान्निध्य में रहने की इच्छा से देवता भी काशी में आ कर रहने लगे। राजा दिवोदास अपनी राजधानी काशी का आधिपत्य खो जाने से बड़े दु:खी हुए। उन्होंने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी से वरदान मांगा- देवता देवलोक में रहें, भूलोक मनुष्यों के लिए रहे। सृष्टिकर्ता ने "एवमस्तु" कह दिया। इसके फलस्वरूप भगवान शंकर और देवगणों को काशी छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। शिवजी मन्दराचल पर्वत पर चले तो गए परंतु काशी से उनका मोह कम नहीं हुआ। महादेव को उनकी प्रिय काशी में पुन: बसाने के उद्देश्य से चौंसठ योगिनियों, सूर्यदेव, ब्रह्माजी और नारायण ने बड़ा प्रयास किया। गणेशजी के सहयोग से अन्ततोगत्वा यह अभियान सफल हुआ। ज्ञानोपदेश पाकर राजा दिवोदास विरक्त हो गए। उन्होंने स्वयं एक शिवलिंग की स्थापना करके उस की अर्चना की और बाद में वे दिव्य विमान पर बैठकर शिवलोक चले गए। महादेव काशी वापस आ गए।

ऐसी मान्यता है कि काशी में कहीं पर भी मृत्यु के समय भगवान विश्वेश्वर (विश्वनाथजी) प्राणियों के दाहिने कान में तारक मन्त्र का उपदेश देते हैं। तारक मन्त्र सुन कर जीव भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है। यह मान्यता है कि केवल काशी ही सीधे मुक्ति देती है, जबकि अन्य तीर्थस्थान काशी की प्राप्ति कराके मोक्ष प्रदान करते हैं।
काशी की महिमा विभिन्न धर्म ग्रन्थों में गायी गयी है। काशी शब्द का अर्थ है, प्रकाश देने वाली नगरी। जिस स्थान से ज्ञान का प्रकाश चारों ओर फैलता है, उसे काशी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि काशी-क्षेत्र में देहान्त होने पर जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है । काशी-क्षेत्र की सीमा निर्धारित करने के लिए प्राचीन काल में पंचक्रोशी मार्ग का निर्माण किया गया। जिस वर्ष अधिमास लगता है, उस वर्ष इस महीने में पंचक्रोशी यात्रा की जाती है। पंचक्रोशी यात्रा करके भक्तगण भगवान शिव और उनकी नगरी काशी के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं।
 ऐसी मान्यता है कि पंचक्रोशी यात्रा से लौकिक और पारलौकिक अभीष्टि की सिद्धि होती है। अधिमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। लोक-भाषा में इसे मलमास कहा जाता है।
भगवान शिव की इस प्रिय नगरी के दर्शनों के लिए हम आतुर थे। बस सुबह का इंतज़ार बाकी था।
11 दिसंबर की सुबह हमारा यात्री दल बस से सर्वप्रथम गंगा घाट की तरफ रवाना हुआ। यहां पर मां गंगा अपने भव्य एवं दिव्य स्वरुप में विराजमान है। हम सभी ने मां गंगा में स्नान किया और स्टीमर के द्वारा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का इस्तेमाल करते हुए हम मणिकर्णिका घाट से होते हुए मंदिर परिसर में पहुंच गए। काशी विश्वनाथ की भव्यता और दिव्यता का वर्णन शब्दों में कर पाना मुश्किल है। देवाधिदेव महादेव को यहां साक्षात महसूस किया जा सकता है।
 गेट नंबर 3 से हमने मंदिर में प्रवेश किया। अभी तक हम जितने स्थानों पर गए उनमें सबसे बढ़िया व्यवस्था एवं सुरक्षा के प्रबंध यहां पर देखने को मिले। इस प्रकार अपनी यात्रा के दौरान (माया) हरिद्वार तथा अयोध्या के पश्चात हिंदुओं के तीसरे पवित्र शहर अर्थात तीसरी पुरी तथा देवाधिदेव महादेव के प्रथम ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ के दर्शन पूर्ण किए।
बाबा काशी विश्वनाथ जी के दर्शन के उपरांत हम वापस अपने होटल पहुंच गए और दिन का भोजन करने के पश्चात हमारा दल बिहार की पवित्र भूमि गया की तरफ रवाना हो गया। शाम तक हम गया पहुंच गए।
लायक राम शर्मा
शिमला

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