भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण
23 जनवरी 2024
अगली प्रातः हमारा यात्री दल सुबह-सबेरे ही कृष्ण जन्मभूमि मथुरा में दर्शन के लिए पहुँच गया। आज का सारा दिन मथुरा और गोकुलधाम के प्रमुख तीर्थ स्थलों के दर्शन में बीत गया।
मथुरा भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा ज़िले में स्थित एक नगर है। यह भगवान कृष्ण की जन्मस्थली और भारत की प्राचीन नगरी है। हालांकि उत्खनन द्वारा प्राप्त इस नगर के साक्ष्य कुषाण काल के हैं। पुराण कथा के अनुसार शूरसेन देश की यहाँ राजधानी थी। पौराणिक साहित्य में मथुरा को अनेक नामों से संबोधित किया गया है जैसे शूरसेन नगरी, मधुपुरी, मधुनगरी, मधुरा आदि।
भारतवर्ष का वह भाग जो हिमालय और विंध्याचल के बीच में पड़ता है, प्राचीनकाल में आर्यावर्त कहलाता था। यह यमुना नदी के किनारे बसा हुआ है। वाल्मीकि रामायण में मथुरा को मधुपुर या मधु दानव का नगर कहा गया है तथा यहाँ लवणासुर की राजधानी बताई गई है। इस नगरी को मधु दैत्य द्वारा बसाई गई बताया गया है। लवणासुर, जिसे शत्रुघ्न ने युद्ध में हराकर मारा था, इसी मधु दानव का पुत्र था। इससे मधुपुरी या मथुरा के रामायण-काल में बसाए जाने का संकेत मिलता है। रामायण में इस नगरी की समृद्धि का वर्णन है। इस नगरी को लवणासुर ने भी सजाया-संवारा था।
दानव, दैत्य, राक्षस जैसे संबोधन विभिन्न कालों में अनेक अर्थों में प्रयुक्त हुए हैं—कभी जाति या क़बीले के लिए, कभी आर्य-अनार्य सन्दर्भ में, तो कभी दुष्ट प्रकृति के व्यक्तियों के लिए। प्राचीनकाल से अब तक इस नगर का अस्तित्व अखंडित रूप से चला आ रहा है।
भारतवर्ष के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गौरव की आधारशिला इसकी सात महापुरियाँ हैं। गरुड़पुराण में इनके नाम इस क्रम से वर्णित हैं। इनमें मथुरा का स्थान अयोध्या के पश्चात अन्य पुरियों के पहले रखा गया है। पद्मपुराण में मथुरा का महत्व सर्वोपरि मानते हुए कहा गया है कि यद्यपि काशी आदि सभी पुरियाँ मोक्षदायिनी हैं, तथापि मथुरापुरी धन्य है। यह पुरी देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। इसका समर्थन गर्गसंहिता में भी मिलता है, जिसमें इसे पुरियों की रानी, कृष्णापुरी, मथुरा बृजेश्वरी, तीर्थेश्वरी और मोक्ष प्रदायिनी धर्मपुरी कहा गया है।
मथुरा के कुछ प्रमुख दर्शनीय स्थल इस प्रकार से हैं:
1. कृष्ण जन्मभूमि
कृष्ण जन्मभूमि, जिसे कृष्ण जन्मस्थान मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, मल्लापुरा, मथुरा, उत्तर प्रदेश में हिंदू मंदिरों का एक समूह है। ये मंदिर उस स्थान पर स्थित हैं जहाँ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ माना जाता है। जन्मभूमि के निकट ही औरंगज़ेब द्वारा निर्मित एक इमारत भी स्थित है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व से इस स्थान का धार्मिक महत्व रहा है। मुगल शासक औरंगज़ेब ने 1670 में यहाँ के मंदिर को नष्ट कर ईदगाह मस्जिद का निर्माण करवाया। 20वीं शताब्दी में, उद्योगपतियों की आर्थिक मदद से केशवदेव मंदिर, गर्भगृह मंदिर और भागवत भवन जैसे मंदिरों का निर्माण किया गया।
केशवदेव मंदिर
केशवदेव मंदिर का निर्माण रामकृष्ण डालमिया ने अपनी मां जड़ियादेवी डालमिया की स्मृति में करवाया था। मंदिर का निर्माण 29 जून 1957 को शुरू हुआ और 6 सितंबर 1958 को हनुमान प्रसाद पोद्दार द्वारा इसका उद्घाटन किया गया। यह मंदिर शाही ईदगाह के दक्षिण में स्थित है।
गर्भगृह तीर्थ
ऐसा माना जाता है कि शाही ईदगाह का निर्माण मूल मंदिर के सभामंडप पर किया गया था और गर्भगृह को छोड़ दिया गया था। इसे उस जेल की कोठरी का स्थान माना जाता है, जहाँ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ। यहाँ एक संगमरमर का मंडप और भूमिगत जेल प्रकोष्ठ बनाया गया है। इसके निकट योगमाया देवी का मंदिर भी स्थित है।
भागवत भवन
श्रीमद्भागवत पुराण को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 11 फरवरी 1965 को शुरू हुआ और देवताओं की स्थापना का समारोह 12 फरवरी 1982 को आयोजित किया गया। इसमें पाँच मंदिर हैं:
• मुख्य मंदिर में राधा-कृष्ण की मूर्तियाँ।• दाहिनी ओर बलराम, सुभद्रा और जगन्नाथ का मंदिर।
• बाईं ओर राम, लक्ष्मण और सीता का मंदिर।
• दुर्गा और शिवलिंग का मंदिर।भवन की दीवारों और स्तंभों पर कृष्ण और उनके भक्तों के जीवन से जुड़ी घटनाओं के भित्ति चित्र अंकित हैं।
पोतरा कुंड
जन्मस्थान मंदिर के दक्षिण-पूर्व में स्थित पोतरा कुंड, बाल कृष्ण के जन्म के बाद उनके पहले स्नान के लिए प्रयुक्त माना जाता है। इसका निर्माण 1782 में महादजी सिंधिया ने करवाया था और 1850 में उनके वंशजों द्वारा इसे बहाल किया गया।
2. द्वारिकाधीश मंदिर मथुरा
मथुरा का द्वारिकाधीश मंदिर नगर के राजाधिराज बाज़ार में स्थित है। यह मंदिर अपने सांस्कृतिक वैभव, कला और सौंदर्य के लिए अनुपम है। श्रावण के महीने में प्रतिवर्ष यहाँ लाखों श्रद्धालु सोने-चाँदी के हिंडोले देखने आते हैं। मथुरा के विश्राम घाट के निकट असिकुंडा घाट के पास यह मंदिर स्थित है। ग्वालियर राज्य के कोषाध्यक्ष सेठ गोकुल दास पारीख ने इसका निर्माण 1814-15 में प्रारंभ कराया। उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी संपत्ति के उत्तराधिकारी सेठ लक्ष्मीचंद्र ने मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण कराया। वर्ष 1930 में यह मंदिर सेवा-पूजन के लिए पुष्टिमार्ग के आचार्य गिरधरलाल जी कांकरौली वालों को भेंट किया गया। तब से यहाँ पुष्टिमार्गीय पद्धति के अनुसार सेवा-पूजा होती है।
3. मथुरा संग्रहालय
राजकीय संग्रहालय, मथुरा (जिसे आमतौर पर मथुरा संग्रहालय के रूप में जाना जाता है) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा शहर में स्थित एक पुरातात्त्विक संग्रहालय है। इसकी स्थापना 1874 में मथुरा जिले के तत्कालीन कलेक्टर सर एफ.एस. ग्रोसे ने की थी। शुरुआत में इसे “कर्जन पुरातत्व संग्रहालय” और बाद में “पुरातत्व संग्रहालय, मथुरा” के नाम से जाना जाता था। अंत में इसका नाम बदलकर “राजकीय संग्रहालय, मथुरा” कर दिया गया।
संग्रहालय में मुख्य रूप से मथुरा और उसके आसपास की कलाकृतियाँ, मिट्टी के बर्तन, मूर्तियाँ, पेंटिंग और सिक्के संग्रहित हैं। इनमें से कई प्रसिद्ध औपनिवेशिक पुरातत्त्वविदों (जैसे अलेक्जेंडर कनिंघम, एफ.एस. ग्रोसे और फ्यूहरर) द्वारा खोजी गई थीं। यह संग्रहालय तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से 12वीं शताब्दी ईस्वी तक की मथुरा स्कूल की मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध है। आज यह उत्तर प्रदेश के प्रमुख संग्रहालयों में से एक है।
गोकुलधाम तीर्थ
आज से लगभग 5,129 वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के मथुरा में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। गोकुल, मथुरा से 15 किलोमीटर दूर है। यमुना के इस पार मथुरा और उस पार गोकुल स्थित है। मथुरा के बाद गोकुल की यात्रा अवश्य करनी चाहिए।
दुनिया के सबसे नटखट बालक, भगवान कृष्ण ने यहाँ 11 साल, 1 माह और 22 दिन बिताए थे। महावन और गोकुल एक ही स्थान हैं। वर्तमान में 8,000 की आबादी वाला यह गाँव उस समय कैसा रहा होगा, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। शोध के अनुसार, उस काल में इसका नाम गोकुल नहीं था। गो, गोप और गोपियों के समूह के कारण महावन को गोकुल कहा जाने लगा। वर्तमान गोकुल को औरंगजेब के समय श्रीवल्लभाचार्य के पुत्र श्रीविट्ठलनाथ ने बसाया था।
गोकुल से 2 किमी आगे महावन स्थित है। इसे पुरानी गोकुल भी कहा जाता है। यहाँ चौरासी खंभों का मंदिर, नंदेश्वर महादेव, मथुरानाथ और द्वारिकानाथ जैसे मंदिर स्थित हैं। मथुरा में कृष्ण के जन्म के बाद कंस के सभी सैनिकों को नींद आ गई थी और वासुदेव की बेड़ियाँ किसी चमत्कार से खुल गई थीं। तब वासुदेव भगवान कृष्ण को नंदराय के घर गोकुल में छोड़ आए थे। कृष्ण और बलराम का पालन-पोषण यहीं हुआ।
बलराम और कृष्ण अपनी लीलाओं से सभी का मन मोह लेते थे। गोपियाँ नटखट बाल गोपाल को छाछ और माखन का लालच देकर नचाती थीं। कृष्ण ने गोकुल में रहते हुए पूतना, शकटासुर और तृणावर्त जैसे असुरों का वध किया।
गोकुल, भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं का स्थान है। गोकुल में प्रवेश करते ही वह पेड़ दिखाई देता है जहाँ बाल गोपाल बंसी बजाते थे। पास के कुंड में माँ यशोदा और अन्य गोपियाँ कपड़े धोती थीं।
बंसीवट के पास से नंद भवन जाने का रास्ता है। नंद भवन के संगमरमर के फर्श पर उन भक्तों के नाम अंकित हैं जिन्होंने भगवान कृष्ण को अर्पण के लिए दान दिया था। भवन में एक स्थान ऐसा है जहाँ माता यशोदा भगवान कृष्ण को झूले में झुलाती थीं। भवन के तलघर में वह स्थान भी है जहाँ भगवान कृष्ण ने पूतना का वध किया था।
गोकुल में कई अन्य मनोरम स्थल भी हैं, जैसे - गोविंद घाट, गोकुलनाथजी का बाग, बाजनटीला, सिंहपौड़ी, यशोदा घाट और रमणरेती।
तीन धामों की यात्रा के इस अंतिम पड़ाव में, गोकुलधाम में एक भव्य विदाई समारोह आयोजित किया गया। एकता तीर्थ यात्रा संगम सुंदर नगर के संचालक आदरणीय श्री सुरजीत राम शर्मा जी और उनकी टीम का यात्रा दल ने हार्दिक धन्यवाद व्यक्त किया।
लायक राम शर्मा
शिमला
No comments:
Post a Comment