भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण …..14-12-2023

 भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण.....

14-12-2023


गया प्रवास का आज हमारा अंतिम दिन था इसलिए शेष बची वेदियों पर पिंडदान की प्रक्रिया के लिए हम सुबह ही निकल पड़े। सर्वप्रथम हम भीमगया पहुंचे। यह वैतरणी के पश्चिम-उत्तर एक घेरे के भीतर विशालकाय शिला है। घेरे के भीतर एक बरामदे में भीमसेन की मूर्ति है। दक्षिण बरामदे में भीमसेन के अंगूठे का तीन हाथ गहरा चिन्ह है। यहां पर विधिपूर्वक पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण की गई और इसके पश्चात हम गदालोल के लिए चल पड़े।

अक्षयवट के दक्षिण गदालोल नामक एक कच्चा सरोवर है। सरोवर में एक स्तंभ के रूप में गदा है। कहते हैं कि असुर को मारकर भगवान ने यहां गदा धोयी थी।

हमारा अगला पड़ाव भस्मकूट अर्थात गोप्रचार था । यह भीमगया से दक्षिण पश्चिम एक छोटी पहाड़ी है। इसके ऊपर भगवान जनार्दन का मंदिर है। इस मंदिर से थोड़ी दूरी पर मंगला देवी का मंदिर है जिसमें मंगलेश्वर शिवलिंग तथा मंगला देवी की मूर्ति है। यही गो प्रचार तीर्थ है। एक शिला पर गायों के खुरों के चिन्ह हैं। कहते हैं कि ब्रह्मा जी ने यहां पर गोदान किया था। यहां पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण करने के पश्चात हम अक्षयवट के लिए चल पड़े।

 ब्रह्मसरोवर के पास ही अक्षय वट है। यह चार दीवारी से घिरा विस्तृत पक्का आंगन है, जिसके मध्य वट वृक्ष है। इसके उत्तर बटेश्वर महादेव का मंदिर है। संपूर्ण वेदियों पर पिंडदान करने के पश्चात यह वो स्थान है जहां गयापाल पंडों के द्वारा सुफल विदाई दी जाती है।


   गया में पिंडदान की संपूर्ण प्रक्रिया के दौरान सबसे महत्वपूर्ण तथा अंतिम पड़ाव है गोदान तर्पण क्रिया। इसके लिए हम वैतरणी की तरफ चल पड़े। गया के दक्षिण फाटक के दक्षिण मंगला गौरी के पास ही यह सरोवर है। यहां पहुंचकर पितरों की आत्मिक शांति एवं तृप्ति के लिए पिंडदान के पश्चात गोदान तर्पण करना अति आवश्यक माना जाता है। वैतरणी में गोदान तर्पण करने के उपरांत हमारी तीन दिवसीय पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण हुई। इस दौरान हमने 45 वेदियों पर पिंडदान किया तथा चार अलग-अलग वेदियों पर तर्पण की प्रक्रिया पूर्ण की। इन संपूर्ण 45 वेदियों का विवरण निम्न प्रकार से है:

1 पुनपुन

 2 फल्गु

 3 सिर गया

 4 कूप गया

5 कार्तिकपद

6 दक्षिणाग्निपद

7  गार्हपत्याग्निपद

8 आवहनीयाग्निपद

9 संध्याग्निपद

10 आवसंध्याग्निपद

11 सूर्यपद

12 चंद्रपद

13 गणेशपद

14 उदीचीपद

15 कण्वपद

16 मातंगपद

17 कौचपद

18 इंद्रपद

19 अगास्त्यपद 

20 काश्यपद

 21 रूद्रपद

22 ब्रह्मपद

23 विष्णुपद 

24 उत्तर मानस

25  दक्षिण मानस

26 जीव्हालोल

27 उदीची

28 कनखल

29 प्रेतशिला

30 ब्रह्मकुंड

31 रामशिला

32 रामकुंड

33 काकबली

34 मातंगवापी

35 धर्मारण्य

36 सरस्वती

37 रहटकूप

38 बोधगया

39 रामगया

40 सीताकुंड

41 भीमगया

42 गदालोल

43 गोप्रचार

44 अक्षय वट

45 वैतरणी

कर्मफल सिद्धांत के अनुसार कुल 84 लाख योनियों में मनुष्य योनि ही सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। मनुष्य योनि पाने के बाद आत्मा का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति ही है।

सनातन धर्मानुयायी लोगों  की यह प्रबल इच्छा रहती है कि उनकी संतान उनकी मृत्यु के बाद उनका श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करे। वस्तुत: अत्यंत श्रद्धा एवं सद्भाव के साथ किए जाने के कारण ही इस कार्य का नाम श्राद्ध पड़ा है। धर्म ग्रंथो में देवता की उपासना के समान ही पितृ कार्य भी सनातन वैदिक जाति का एक अति आवश्यक नित्य कर्म है। विष्णु पुराण के अनुसार श्राद्ध काल में भक्ति और विनम्र चित्त से उत्तम ब्राह्मण को यथाशक्ति भोजन कराना अनिवार्य माना गया है।

गया श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान की महत्वपूर्ण स्थली रही है, जिसमें फल्गु नदी के अविस्मरणीय योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। किसी भी देश के इतिहास विनिर्माण में प्रकृति प्रदत्त उपहार के अंतर्गत प्रथम स्थान पर आसीन नदी का अमूल्य योगदान माना जाता है।

 ऐसी मान्यता है कि इस पुण्य क्षेत्र में पिता का श्राद्ध करके पुत्र अपने पितृ ऋण से हमेशा हमेशा के लिए उऋण हो जाता है। उसके द्वारा किए गए इस पवित्र कार्य से उसके पूर्वजों की भटकती आत्मा को शांति मिलती है तथा वह प्रेत योनि से मुक्त हो जाते हैं। साथ ही पितरों की प्रसन्नता से श्राद्ध कर्ता को भविष्य में धन-धान्य, सुख समृद्धि व संपत्ति की प्राप्ति होती है।

गया में 3 दिन के प्रवास के दौरान आज दोपहर तक श्राद्ध कर्म से निवृत होने के पश्चात हमें गया शहर को घूमने का अवसर मिला। मन को बेहद सुकून और शांति मिली। पिछले तीन दिनों के अति व्यस्ततम कार्यक्रम के पश्चात फुर्सत में टहलने का आनंद लिया।

लायक राम शर्मा

शिमला

भारत दर्शन यात्रा : एक संस्मरण ……13-12-2023

 भारत दर्शन यात्रा : एक संस्मरण…13-12-2023

अगले दिन सुबह फल्गु नदी में स्नान के उपरांत पिंडदान की प्रक्रिया आरंभ हुई। सर्वप्रथम हम ब्रह्मकुंड गए। यह स्थान राम शिला से लगभग 4 मील पश्चिम स्थित है। इसका प्राचीन नाम प्रेत पर्वत है।गया नगर से यह स्थान सात मील दूर है। यहाँ पर्वत के नीचे एक पक्का सरोवर है और एक धर्मशाला है। इसे ब्रह्म कुंड कहते हैं।यहाँ तक रामशिला होकर आने के लिए पक्की सड़क है। ब्रह्म कुंड के पास एक-दो मंदिर हैं । ब्रह्म कुंड से लगभग चार सौ सीढ़ी चढ़कर प्रेतशिला पहुँचते हैं। ऊपर एक छोटा मंदिर है जिसमें आंगन और बरामदे हैं।ऐसा माना जाता है कि इस चोटी पर ब्रह्मा जी के चरण विराजमान हैं तथा जो जीवात्मा भटक कर प्रेत या पिशाच योनी में चली जाती है,यहाँ पिंडदान करने से उस आत्मा को मुक्ति मिल जाती है।इस प्रकार ब्रह्म कुंड पहुंचकर हमने ब्रह्म कुंड और प्रेतशिला दोनों वेदियों पर पिंड दान की प्रक्रिया पूर्ण की। 

आज के दिन का हमारा अगला पड़ाव था राम शिला। यह स्थान विष्णुपद मंदिर से लगभग तीन मील उत्तर फल्गु के किनारे राम शिला पहाड़ी पर स्थित है।पहाड़ी के नीचे रामकुंड नामक सरोवर है तथा सरोवर के दक्षिण एक शिव मंदिर है। रामशिला में 20 सीढ़ी ऊपर एक श्रीराम मंदिर है। इस मंदिर में भगवान राम के चरण चिन्ह आज भी विद्यमान् हैं। मंदिर के दक्षिण एक बरामदे में दो-तीन मूर्तियां है। श्रीराम के यहाँ आने से पूर्व इस पहाड़ी का नाम प्रेतशिला था। इस स्थान पर तीन महत्वपूर्ण वेदियों रामशिला, रामकुंड और काकबली पर पिंडदान होता है। काकबली राम शिला से दो सौ गज दक्षिण एक घेरे के भीतर वटवृक्ष है तथा इस स्थान पर काकबली, यमबली और श्वानबली वेदी है।

रामशिला पर पिंडदान करने के पश्चात हमारा दल सरस्वती नदी की तरफ निकल पड़ा। गया से तीन मील आगे जाकर पक्की सड़क छोड़कर हमें थोड़ा पैदल चलना पड़ा। एक मील कच्चे मार्ग से जाने पर सरस्वती नदी मिलती है। सरस्वती नदी के तट पर छोटा सा सरस्वती देवी का मंदिर है।वहीं एक चबूतरे पर मां सरस्वती के चरण चिन्ह तथा कई शिवलिंग हैं ।यहां पिंडदान करने के पश्चात हम मातंगवापी की तरफ बढ़ गए। सरस्वती नदी से लगभग एक मील पर मातंगवापी नामक एक छोटी सी बावड़ी है। यहां पगडंडी से आना पड़ता है। बावड़ी के उत्तर क‌‌ई मंदिर हैंजिनमें मातंगेश्वर शिव का मंदिर मुख्य है।

 मातंगवापी में पिंडदान करने के पश्चात हमारा अगला पड़ाव धर्मारण्य था। यह स्थान मातंगवापी से 2 मील दक्षिण-पूर्व में स्थित है। यहां एक कुआं है। पिंडदान करने के बाद पिंड कुएं में डाल दिया जाता है। यहां धर्मराज युधिष्ठिर का छोटा सा मंदिर है। पास में रहटकूप है। पुत्र कामना से उसके पास लोग पिंडदान करते हैं। कूप के समीप भीमसेन का छोटा मंदिर है। कहते हैं युधिष्ठिर जब भीमसेन के साथ अपने पिता का श्राद्ध करने यहां आए थे तब यहां पर कुछ दिन उन्होंने तप किया था। यहां पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण करने के पश्चात हम बोधगया की तरफ बढ़ गए। यह स्थान धर्मारण्य से एक मील पश्चिम में स्थित है तथा गया नगर से बोधगया लगभग 7 मील की दूरी पर स्थित है। यहां बुद्ध भगवान का विशाल मंदिर है। मंदिर के पीछे पत्थर का चबूतरा है जिसे बौद्ध सिंहासन कहते हैं। इसी स्थान पर बैठकर गौतम बुद्ध ने तपस्या की थी और यहीं पर बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था। बोधि वृक्ष तो अब यहां नहीं है किंतु एक नया पीपल का वृक्ष वहां लगाया गया है। बोधगया में पिंडदान करने के पश्चात हमारा आज का अंतिम पड़ाव राम गया था।

बोधगया से वापस आकर हम सीधे फल्गु नदी के तट पर स्थित सीता कुंड नामक स्थान पर पहुंचे।यह स्थान विष्णु पद मंदिर के ठीक सामने फल्गु नदी के उस पार स्थित है। यहां मंदिर में काले पत्थर का महाराज दशरथ का हाथ बना है। यहीं पर एक शिला है जो भरताश्रम की वेदी कहलाती है।इसी को राम गया कहते हैं। यहां मतंग ऋषि का चरण चिन्ह बना है तथा अनेक देव मूर्तियां हैं। सीताकुंड पर बालू का पिंड दान किया जाता है।

हालांकि गया में पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण करने में लगभग एक सप्ताह का समय लग जाता है लेकिन समय अभाव के कारण हमें इस प्रक्रिया को दिन में ही पूर्ण करना थाइसलिए आज का दिन बहुत व्यस्त रहा। सांझ की बेला तक हम पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण कर वापस अपने गंतव्य स्थान पर पहुंच चुके थे।


लायक़ राम शर्मा

शिमला।

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