भारत दर्शन यात्रा : एक संस्मरण ……13-12-2023

 भारत दर्शन यात्रा : एक संस्मरण…13-12-2023

अगले दिन सुबह फल्गु नदी में स्नान के उपरांत पिंडदान की प्रक्रिया आरंभ हुई। सर्वप्रथम हम ब्रह्मकुंड गए। यह स्थान राम शिला से लगभग 4 मील पश्चिम स्थित है। इसका प्राचीन नाम प्रेत पर्वत है।गया नगर से यह स्थान सात मील दूर है। यहाँ पर्वत के नीचे एक पक्का सरोवर है और एक धर्मशाला है। इसे ब्रह्म कुंड कहते हैं।यहाँ तक रामशिला होकर आने के लिए पक्की सड़क है। ब्रह्म कुंड के पास एक-दो मंदिर हैं । ब्रह्म कुंड से लगभग चार सौ सीढ़ी चढ़कर प्रेतशिला पहुँचते हैं। ऊपर एक छोटा मंदिर है जिसमें आंगन और बरामदे हैं।ऐसा माना जाता है कि इस चोटी पर ब्रह्मा जी के चरण विराजमान हैं तथा जो जीवात्मा भटक कर प्रेत या पिशाच योनी में चली जाती है,यहाँ पिंडदान करने से उस आत्मा को मुक्ति मिल जाती है।इस प्रकार ब्रह्म कुंड पहुंचकर हमने ब्रह्म कुंड और प्रेतशिला दोनों वेदियों पर पिंड दान की प्रक्रिया पूर्ण की। 

आज के दिन का हमारा अगला पड़ाव था राम शिला। यह स्थान विष्णुपद मंदिर से लगभग तीन मील उत्तर फल्गु के किनारे राम शिला पहाड़ी पर स्थित है।पहाड़ी के नीचे रामकुंड नामक सरोवर है तथा सरोवर के दक्षिण एक शिव मंदिर है। रामशिला में 20 सीढ़ी ऊपर एक श्रीराम मंदिर है। इस मंदिर में भगवान राम के चरण चिन्ह आज भी विद्यमान् हैं। मंदिर के दक्षिण एक बरामदे में दो-तीन मूर्तियां है। श्रीराम के यहाँ आने से पूर्व इस पहाड़ी का नाम प्रेतशिला था। इस स्थान पर तीन महत्वपूर्ण वेदियों रामशिला, रामकुंड और काकबली पर पिंडदान होता है। काकबली राम शिला से दो सौ गज दक्षिण एक घेरे के भीतर वटवृक्ष है तथा इस स्थान पर काकबली, यमबली और श्वानबली वेदी है।

रामशिला पर पिंडदान करने के पश्चात हमारा दल सरस्वती नदी की तरफ निकल पड़ा। गया से तीन मील आगे जाकर पक्की सड़क छोड़कर हमें थोड़ा पैदल चलना पड़ा। एक मील कच्चे मार्ग से जाने पर सरस्वती नदी मिलती है। सरस्वती नदी के तट पर छोटा सा सरस्वती देवी का मंदिर है।वहीं एक चबूतरे पर मां सरस्वती के चरण चिन्ह तथा कई शिवलिंग हैं ।यहां पिंडदान करने के पश्चात हम मातंगवापी की तरफ बढ़ गए। सरस्वती नदी से लगभग एक मील पर मातंगवापी नामक एक छोटी सी बावड़ी है। यहां पगडंडी से आना पड़ता है। बावड़ी के उत्तर क‌‌ई मंदिर हैंजिनमें मातंगेश्वर शिव का मंदिर मुख्य है।

 मातंगवापी में पिंडदान करने के पश्चात हमारा अगला पड़ाव धर्मारण्य था। यह स्थान मातंगवापी से 2 मील दक्षिण-पूर्व में स्थित है। यहां एक कुआं है। पिंडदान करने के बाद पिंड कुएं में डाल दिया जाता है। यहां धर्मराज युधिष्ठिर का छोटा सा मंदिर है। पास में रहटकूप है। पुत्र कामना से उसके पास लोग पिंडदान करते हैं। कूप के समीप भीमसेन का छोटा मंदिर है। कहते हैं युधिष्ठिर जब भीमसेन के साथ अपने पिता का श्राद्ध करने यहां आए थे तब यहां पर कुछ दिन उन्होंने तप किया था। यहां पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण करने के पश्चात हम बोधगया की तरफ बढ़ गए। यह स्थान धर्मारण्य से एक मील पश्चिम में स्थित है तथा गया नगर से बोधगया लगभग 7 मील की दूरी पर स्थित है। यहां बुद्ध भगवान का विशाल मंदिर है। मंदिर के पीछे पत्थर का चबूतरा है जिसे बौद्ध सिंहासन कहते हैं। इसी स्थान पर बैठकर गौतम बुद्ध ने तपस्या की थी और यहीं पर बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था। बोधि वृक्ष तो अब यहां नहीं है किंतु एक नया पीपल का वृक्ष वहां लगाया गया है। बोधगया में पिंडदान करने के पश्चात हमारा आज का अंतिम पड़ाव राम गया था।

बोधगया से वापस आकर हम सीधे फल्गु नदी के तट पर स्थित सीता कुंड नामक स्थान पर पहुंचे।यह स्थान विष्णु पद मंदिर के ठीक सामने फल्गु नदी के उस पार स्थित है। यहां मंदिर में काले पत्थर का महाराज दशरथ का हाथ बना है। यहीं पर एक शिला है जो भरताश्रम की वेदी कहलाती है।इसी को राम गया कहते हैं। यहां मतंग ऋषि का चरण चिन्ह बना है तथा अनेक देव मूर्तियां हैं। सीताकुंड पर बालू का पिंड दान किया जाता है।

हालांकि गया में पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण करने में लगभग एक सप्ताह का समय लग जाता है लेकिन समय अभाव के कारण हमें इस प्रक्रिया को दिन में ही पूर्ण करना थाइसलिए आज का दिन बहुत व्यस्त रहा। सांझ की बेला तक हम पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण कर वापस अपने गंतव्य स्थान पर पहुंच चुके थे।


लायक़ राम शर्मा

शिमला।

No comments:

Post a Comment

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 23 जनवरी 2024

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 23 जनवरी 2024 अगली प्रातः हमारा यात्री दल सुबह-सबेरे ही कृष्ण जन्मभूमि मथुरा में दर्शन के लिए पहुँच गया। आज का...