भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 13–15 जनवरी 2024

 भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण

13–15 जनवरी 2024

हमारी यात्रा का अगला पड़ाव था भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका पुरी। 13 जनवरी को सुबह हमारी यात्रा शुरू हुई और शाम को हम गुजरात के डाकोर पहुँच गए। यहाँ हमने प्रसिद्ध रणछोड़ राय मंदिर के दर्शन किए। हमारा रात्रि ठहराव डाकोर में था। अगली सुबह हमारा सफर फिर शुरू हुआ और शाम को हम द्वारका पुरी पहुँच गए।

द्वारका में हम दो दिन ठहरे।

द्वारका भारत के गुजरात राज्य के देवभूमि द्वारका ज़िले में स्थित एक प्राचीन नगर और नगरपालिका है। यह गोमती नदी और अरब सागर के किनारे ओखामंडल प्रायद्वीप के पश्चिमी तट पर बसा हुआ है। यह हिन्दुओं के चारधाम और सप्तपुरी (सबसे पवित्र प्राचीन नगरों) में से एक है। गुजरात के द्वारका शहर का एक इतिहास है जो सदियों पुराना है और इसका उल्लेख महाभारत महाकाव्य में द्वारका साम्राज्य के रूप में मिलता है। गोमती नदी के तट पर स्थित इस शहर को भगवान कृष्ण की राजधानी के रूप में वर्णित किया गया है।

श्री कृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए पर राज उन्होंने द्वारका में किया। यहीं बैठकर उन्होंने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांडवों को सहारा दिया, धर्म की जीत कराई और शिशुपाल तथा दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया। द्वारका उस जमाने में राजधानी बन गई थी। बड़े-बड़े राजा यहां आते थे और बहुत से मामलों में भगवान श्री कृष्ण की सलाह लेते थे। इस जगह का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि श्री कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं।

काफी समय से जाने-माने शोधकर्ताओं ने पुराणों में वर्णित द्वारिका के रहस्य का पता लगाने का प्रयास किया, लेकिन वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित कोई भी अध्ययन कार्य अभी तक पूरा नहीं किया गया है। 2005 में द्वारिका के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए अभियान शुरू किया गया था। इस अभियान में भारतीय नौसेना ने भी मदद की। अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छटे पत्थर मिले और यहां से लगभग 200 अन्य नमूने भी एकत्र किए गए, लेकिन आज तक यह तय नहीं हो पाया कि यह वही नगरी है अथवा नहीं जिसे भगवान श्री कृष्ण ने बसाया था। आज भी यहां वैज्ञानिक स्कूबा डायविंग के जरिए समंदर की गहराइयों में कैद इस रहस्य को सुलझाने में लगे हैं।

द्वारकाधीश मंदिर भगवान श्री विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। मंदिर भारत के गुजरात के द्वारका में स्थित है। यह 72 स्तंभों द्वारा समर्थित और 5 मंजिला इमारत का मुख्य मंदिर जगत मंदिर या निज मंदिर के रूप में जाना जाता है। मंदिर का शिखर 78.3 मीटर ऊंचा है। पुरातात्विक निष्कर्ष यह बताते हैं कि यह 2200-2500 साल पुराना है। 15वीं-16वीं शताब्दी में मंदिर का विस्तार किया गया। द्वारकाधीश मंदिर एक पुष्टिमार्ग मंदिर है, इसलिए यह वल्लभाचार्य और विठ्लेसनाथ द्वारा बनाए गए दिशानिर्देशों और अनुष्ठानों का पालन करता है।

परंपरा के अनुसार, मूल मंदिर का निर्माण कृष्ण के पड़पोते वज्रनाभ ने हरि-गृह (भगवान कृष्ण के आवासीय स्थान) पर किया था। मंदिर भारत में हिंदुओं द्वारा पवित्र माने जाने वाले चार धाम तीर्थ का हिस्सा बन गया। 8वीं शताब्दी के हिंदू धर्मशास्त्री और दार्शनिक आदि शंकराचार्य ने मंदिर का दौरा किया। अन्य तीन धामों में रामेश्वरम, बद्रीनाथ और पुरी शामिल हैं। आज भी मंदिर के भीतर एक स्मारक उनकी यात्रा को समर्पित है। द्वारकाधीश उपमहाद्वीप में विष्णु के 98वें दिव्य देशम हैं, जो दिव्य प्रभा पवित्र ग्रंथों में महिमा मंडित करते हैं।

मंदिर के ऊपर का ध्वज सूर्य और चंद्रमा को दर्शाता है, जो माना जाता है कि यह दर्शाता है कि कृष्ण तब तक रहेंगे जब तक सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी पर मौजूद रहेंगे। ध्वज को दिन में 5 बार बदला जाता है, लेकिन प्रतीक समान रहता है। मंदिर का निर्माण चूना पत्थर से हुआ है जो अभी भी प्राचीन स्थिति में है। मंदिर में क्षेत्र पर शासन करने वाले राजवंशों के उत्तराधिकारियों द्वारा की गई जटिल मूर्तिकला का विस्तार दिखाया गया है। इन कार्यों से संरचना का अधिक विस्तार नहीं हुआ। मंदिर में दो प्रवेश द्वार हैं। मुख्य प्रवेश द्वार (उत्तर प्रवेश द्वार) को “मोक्ष द्वार” कहा जाता है। यह प्रवेश द्वार एक को मुख्य बाजार में ले जाता है। दक्षिण प्रवेश द्वार को “स्वर्ग द्वार” कहा जाता है। इस द्वार के बाहर 56 सीढ़ियाँ हैं जो गोमती नदी की ओर जाती हैं। हिंदुओं का मानना है कि मूल मंदिर का निर्माण कृष्ण के आवासीय महल के ऊपर, कृष्ण के महान पुत्र वज्रनाभ द्वारा किया गया था।

चालुक्य शैली में वर्तमान मंदिर का निर्माण 15-16वीं शताब्दी में किया गया है।

द्वारका पुरी के कुछ अन्य महत्वपूर्ण तीर्थ इस प्रकार हैं:

1 शारदा मठ

शारदा-मठ को आदि गुरु शंकराचार्य ने बनवाया था। उन्होंने पूरे देश के चार कोनों में चार मठ बनवाए थे। उनमें से एक यह शारदा-मठ है। परंपरागत रूप से आज भी शंकराचार्य मठ के अधिपति हैं। भारत में सनातन धर्म के अनुयायी शंकराचार्य का सम्मान करते हैं। रणछोड़जी के मंदिर से द्वारका शहर की परिक्रमा शुरू होती है। पहले सीधे गोमती के किनारे जाते हैं। गोमती के नौ घाटों पर बहुत से मंदिर हैं। सांवलियाजी का मंदिर, गोवर्धननाथजी का मंदिर, महाप्रभुजी की बैठक और आगे वासुदेव घाट पर हनुमानजी का मंदिर है। आखिर में संगम घाट आता है। यहां गोमती समुद्र से मिलती है। इस संगम पर संगम-नारायणजी का बहुत बड़ा मंदिर है।

2 चक्र तीर्थ

संगम घाट के उत्तर में समुद्र के ऊपर एक और घाट है। इसे चक्र तीर्थ कहते हैं। इसी के पास रत्नेश्वर महादेव का मंदिर है। इसके आगे सिद्धनाथ महादेवजी हैं, आगे एक बावली है, जिसे ‘ज्ञान-कुंड’ कहते हैं। इससे आगे जूनीराम बाड़ी है, जिसमें राम, लक्ष्मण और सीता की मूर्तियाँ हैं। इसके बाद एक और राम का मंदिर है, जो नया बना है। इसके बाद एक बावली है, जिसे सौमित्री बावली यानी लक्ष्मणजी की बावली कहते हैं। काली माता और आशापुरी माता की मूर्तियाँ इसके बाद आती हैं। इनके आगे यात्री कैलासकुंड पर पहुंचते हैं। इस कुंड का पानी गुलाबी रंग का है। कैलासकुंड के आगे सूर्यनारायण का मंदिर है। इसके आगे द्वारका शहर का पूरब की तरफ का दरवाजा पड़ता है। इस दरवाजे के बाहर जय और विजय की मूर्तियाँ हैं। जय और विजय बैकुण्ठ में भगवान के महल के चौकीदार हैं। यहां भी ये द्वारका के दरवाजे पर खड़े होकर उसकी देखभाल करते हैं। यहां से यात्री फिर निष्पाप कुंड पहुंचते हैं और इस रास्ते के मंदिरों के दर्शन करते हुए रणछोड़जी के मंदिर में पहुंच जाते हैं। यहीं परिश्रम खत्म हो जाती है। यही असली द्वारका है। इससे बीस मील आगे कच्छ की खाड़ी में एक छोटा सा टापू है। इस पर बेट-द्वारका बसी है। गोमती द्वारका का तीर्थ करने के बाद यात्री बेट-द्वारका जाते हैं। बेट-द्वारका के दर्शन बिना द्वारका का तीर्थ पूरा नहीं होता। बेट-द्वारका पानी के रास्ते जा सकते हैं।

गोपी तालाब 

जमीन के रास्ते जाते हुए तेरह मील आगे गोपी-तालाब पड़ता है। यहां की आस-पास की जमीन पीली है। तालाब के अंदर से भी पीला रंग की ही मिट्टी निकलती है। इस मिट्टी को वे गोपीचंदन कहते हैं। यहां मोर बहुत होते हैं। गोपी तालाब से तीन मील आगे नागेश्वर नाम का शिवजी और पार्वती का छोटा सा मंदिर है। यात्री लोग इसका दर्शन भी जरूर करते हैं। कहते हैं, भगवान कृष्ण इस बेट-द्वारका नाम के टापू पर अपने घरवालों के साथ सैर करने आया करते थे। यह कुल सात मील लंबा है। यह पथरीला है। यहां कई अच्छे और बड़े मंदिर हैं। कितने ही तालाब हैं। कितने ही भंडारे हैं। धर्मशालाएँ हैं और सदावर्त्त लगते हैं। मंदिरों के सिवा समुद्र के किनारे घूमना बड़ा अच्छा लगता है।

बेट-द्वारका 

बेट-द्वारका ही वह जगह है, जहां भगवान कृष्ण ने अपने प्यारे भक्त नरसी की हुंडी भरी थी। बेट-द्वारका के टापू का पूरब की तरफ का जो कोना है, उस पर हनुमानजी का बहुत बड़ा मंदिर है। इसीलिए इस ऊंचे टीले को हनुमानजी का टीला कहते हैं। आगे बढ़ने पर गोमती-द्वारका की तरह ही एक बहुत बड़ी चहारदीवारी यहां भी है। इस घेरे के भीतर पांच बड़े-बड़े महल हैं। ये दुमंजिले और तिमंजले हैं। पहला और सबसे बड़ा महल श्रीकृष्ण का महल है। इसके दक्षिण में सत्यभामा और जाम्बवती के महल हैं। उत्तर में रुक्मिणी और राधा के महल हैं। इन पांचों महलों की सजावट ऐसी है कि आँखें चकाचौंध हो जाती हैं। इन मंदिरों के किवाड़ों और चौखटों पर चांदी के पतरे चढ़े हैं। भगवान कृष्ण और उनकी मूर्ति चारों रानियों के सिंहासनों पर भी चांदी मढ़ी है। मूर्तियों का श्रृंगार बड़ा ही कीमती है। हीरे, मोती और सोने के गहने उनको पहनाए गए हैं। सच्ची जरी के कपड़ों से उनको सजाया गया है।

5 चौरासी धुना

बेट-द्वारका टापू में भगवान द्वारकाधीश के मंदिर से 7 किमी की दूरी पर चौरासी धुना नामक एक प्राचीन और ऐतिहासिक तीर्थ स्थल है। उदासीन संप्रदाय के सुप्रसिद्ध संत और प्रख्यात इतिहास लेखक, निर्वाण थड़ा तीर्थ, श्री पंचयाती अखाड़ा बड़ा उदासीन के पीठाधीश्वर श्री महंत रघुमुनी जी के अनुसार ब्रह्माजी के चारों मानसिक पुत्रों सनक, सनंदन, सनतकुमार और सनातन ने ब्रह्माजी की सृष्टि-संरचना की आज्ञा को न मानकर उदासीन संप्रदाय की स्थापना की और मृत्यु-लोक में विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करते हुए भेंट-द्वारका में भी आए। उनके साथ उनके अनुयायियों के रूप में अस्सी (80) अन्य संत भी थे। इस प्रकार चार सनतकुमार और 80 अनुयायी उदासीन संतों को जोड़कर 84 की संख्या पूर्ण होती है। इन्हीं 84 आदि दिव्य उदासीन संतों ने यहाँ पर चौरासी धुने स्थापित कर साधना और तपस्वी की और ब्रह्माजी को एक-एक धुने की एक लाख महिमा को बताया, तथा चौरासी धुनों के प्रति स्वरूप चौरासी लाख योनियाँ निर्मित करने का सांकेतिक उपदेश दिया। इस कारण से यह स्थान चौरासी धुना के नाम से जग में ख्यात हुआ।

कालांतर में उदासीन संप्रदाय के अंतिम आचार्य जगतगुरु उदासीनाचार्य श्री चंद्र भगवान इस स्थान पर आए और पुनः सनकादिक ऋषियों द्वारा स्थापित चौरासी धुने को जागृत कर पुनः प्रज्वलित किया और उदासीन संप्रदाय के एक तीर्थ के रूप में इसे महिमामंडित किया। यह स्थान आज भी उदासीन संप्रदाय के अधीन है और वहाँ पर उदासी संत निवास करते हैं। आने वाले यात्रियों, भक्तों और संतों की निवास, भोजन आदि की व्यवस्था भी निःशुल्क रूप से चौरासी धुना उदासीन आश्रम द्वारा की जाती है। जो यात्री भेंट-द्वारका दर्शन हेतु जाते हैं, वे चौरासी धुना तीर्थ के दर्शन हेतु अवश्य जाते हैं। ऐसी अवधारणा है कि चौरासी धुनों के दर्शन करने से मनुष्य की लाख चौरासी कट जाती हैं, अर्थात उसे चौरासी लाख योनियों में भटकना नहीं पड़ता और वह मुक्त हो जाता है।

रणछोड़ जी मंदिर

रणछोड़ जी के मंदिर की ऊपरी मंजिलें देखने योग्य हैं। यहां भगवान की सेज है। झूलने के लिए झूला है। खेलने के लिए चौपड़ है। दीवारों में बड़े-बड़े शीशे लगे हैं। इन पांचों मंदिरों के अपने अलग भंडारे हैं। मंदिरों के दरवाजे सुबह ही खुलते हैं। बारह बजे बंद हो जाते हैं। फिर चार बजे खुल जाते हैं और रात के नौ बजे तक खुले रहते हैं। इन पांच विशेष मंदिरों के सिवा और भी बहुत से मंदिर इस चहारदीवारी के अंदर हैं। ये प्रद्युम्नजी, टीकमजी, पुरुषोत्तमजी, देवकी माता, माधवजी, अम्बाजी और गरूड़ के मंदिर हैं। इनके सिवा साक्षी-गोपाल, लक्ष्मीनारायण और गोवर्धननाथजी के मंदिर हैं। ये सब मंदिर भी खूब सजे-सजाए हैं। इनमें भी सोने-चांदी का काम बहुत है। बेट-द्वारका में कई तालाब हैं—रणछोड़ तालाब, रत्न-तालाब, कचौरी-तालाब और शंख-तालाब। इनमें रणछोड़ तालाब सबसे बड़ा है। इसकी सीढ़ियाँ पत्थर की हैं। जगह-जगह नहाने के लिए घाट बने हैं। इन तालाबों के आस-पास बहुत से मंदिर हैं। इनमें मुरली मनोहर, नीलकण्ठ महादेव, रामचंद्रजी और शंख-नारायण के मंदिर खास हैं। लोग इन तालाबों में नहाते हैं और मंदिर में फूल चढ़ाते हैं।

शंख तालाब

रणछोड़ के मंदिर से डेढ़ मील चलकर शंख-तालाब आता है। इस जगह भगवान कृष्ण ने शंख नामक राक्षस को मारा था। इसके किनारे पर शंख नारायण का मंदिर है। शंख-तालाब में नहाकर शंख नारायण के दर्शन करने से बड़ा पुण्य होता है। बेट-द्वारका से समुद्र के रास्ते जाकर बिरावल बंदरगाह पर उतरना पड़ता है। ढाई-तीन मील दक्षिण-पूर्व की तरफ चलने पर एक कस्बा मिलता है, इसी का नाम सोमनाथ पट्टल है। यहां एक बड़ी धर्मशाला है और बहुत से मंदिर हैं। कस्बे से करीब पौने तीन मील पर हिरण्य, सरस्वती और कपिला इन तीन नदियों का संगम है। इस संगम के पास ही भगवान कृष्ण के शरीर का अंतिम संस्कार किया गया था। 

दो दिन तक हमारा यात्री दल भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका पुरी में कृष्णमय हो गया। यहाँ के कण-कण में भगवान कृष्ण का निवास है। यहाँ के सभी प्रमुख तीर्थों का दर्शन करने के उपरांत हमारी यात्रा का मुख्य उद्देश्य अर्थात तीन धाम दर्शन पूर्ण हो गया था।


लायक राम शर्मा

शिमला


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