भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 31-12-2023 & 01-01-2024

 भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 

31-12-2023 & 01-01-2024


कांचीपुरम से प्रातः शुरू हुई यात्रा दोपहर बाद लगभग चार बजे के आस पास प्रमुख धार्मिक नगरी रामेश्वरम पहुँच गई। महात्मा गांधी सेतु से आगे निकलते ही सागर के नज़दीक आने का एहसास हुआ । यात्रा के दौरान अगले दो दिन दूसरे महत्वपूर्ण धाम यानी भगवान विष्णु के निवास स्थान तथा 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक रामेश्वरम या रामनाथ स्वामी जी की नगरी में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । मन प्रफुल्लित था कि इस लंबी यात्रा के दौरान जगन्नाथ पुरी के बाद भगवान विष्णु के दूसरे धाम रामनाथ स्वामी के दर्शन हो गए थे।

रामेश्वरम हिंदुओं का एक पवित्र तीर्थ है। यह तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित है। यह तीर्थ हिन्दुओं के चार धामों में से एक है। इसके अलावा यहां स्थापित शिवलिंग बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है।भारत के उत्तर में काशी की जो मान्यता हैवही दक्षिण में रामेश्वरम की है।रामेश्वरम चेन्नई से लगभग सवा चार सौ मील दक्षिण-पूर्व में है। यह हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुंदर शंख आकार का द्वीप है। बहुत पहले यह द्वीप भारत की मुख्य भूमि के साथ जुड़ा हुआ थापरन्तु बाद में सागर की लहरों ने इसे मिलाने वाली कड़ी को काट डालाजिससे वह चारों ओर पानी से घिरकर टापू बन गया। यहां भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व पत्थरों के सेतु का निर्माण करवाया थाजिस पर चढ़कर वानर सेना लंका पहुंची  वहां विजय पाई। बाद में  भगवान राम ने विभीषण के अनुरोध पर धनुषकोटि नामक स्थान पर यह सेतु तोड़ दिया था। आज भी इस 48 कि.मीलंबे आदि-सेतु के अवशेष सागर में दिखाई देते हैं। यहां के मंदिर के तीसरे प्राकार का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा है।

रामेश्वरम का मंदिर भारतीय निर्माण-कला और शिल्पकला का एक सुंदर नमूना है। इसका प्रवेश-द्वार चालीस फीट ऊंचा है। प्राकार में और मंदिर के अंदर सैकड़ों विशाल खंभें हैं जो देखने में एक जैसे लगते है ; परंतु पास जाकर जरा बारीकी से देखा जाये तो मालूम होगा कि हर खंभे पर बेल-बूटे की अलग-अलग कारीगरी है।

रामनाथ की मूर्ति के चारों ओर परिक्रमा करने के लिए तीन प्राकार बने हुए है। इनमें तीसरा प्राकार सौ साल पहले पूरा हुआ। इस प्राकार की लंबाई चार सौ फुट से अधिक है। दोनों ओर पांच फुट ऊंचा और करीब आठ फुट चौड़ा चबूतरा बना हुआ है। चबूतरों के एक ओर पत्थर के बड़े-बड़े खंभो की लम्बी क़तारें खड़ी है। प्राकार के एक सिरे पर खडे होकर देखने पर ऐसा लगता है मानो सैकड़ों तोरण-द्वार स्वागत करने के लिए बनाए गये हों। इन खंभों की अद्भुत कारीगरी देखकर विदेशी भी दंग रह जाते है। यहां का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा है।

रामनाथ के मंदिर के चारों ओर दूर तक कोई पहाड़ नहीं हैजहां से पत्थर आसानी से लाये जा सकें।गंधमादन पर्वत तो नाममात्र का है। यह वास्तव में एक टीला है और उसमें से एक विशाल मंदिर के लिए जरूरी पत्थर नहीं निकल सकते। रामेश्वरम् के मंदिर में जो कई लाख टन के पत्थर लगे हैवे सब बहुत दूर-दूर से नावों में लादकर लाये गये है। रामनाथ जी के मंदिर के भीतरी भाग में एक तरह का चिकना काला पत्थर लगा है। कहते हैये सब पत्थर लंका से लाये गये थे।

रामेश्वरम् के विशाल मंदिर को बनवाने और उसकी रक्षा करने में रामनाथपुरम् नामक छोटी रियासत के राजाओं का बड़ा योगदान रहा। अब यह रियासत तमिल नाडु राज्य में मिल गई हैं।रामनाथपुरम् के राजभवन में एक पुराना काला पत्थर रखा हुआ है। कहा जाता हैयह पत्थर राम ने केवटराज को राजतिलक के समय उसके चिह्न के रूप में दिया था। रामेश्वरम् की यात्रा करने वाले लोग इस काले पत्थर को देखने के लिए रामनाथपुरम् जाते है। रामनाथपुरम् रामेश्वरम् से लगभग तैंतीस मील दूर है।

रामेश्वरम् के विख्यात मंदिर की स्थापना के बारें में कई रोचक कथाएं कही जाती है। सीताजी को छुड़ाने के लिए राम ने लंका पर चढ़ाई की थी। उन्होने युद्ध के बिना सीताजी को छुड़वाने का बहुत प्रयत्न कियापर रावण के  मानने पर विवश होकर उन्होने युद्ध किया। इस युद्ध हेतु राम को वानर सेना सहित सागर पार करना थाजो अत्यंत कठिन कार्य था। तब श्री राम नेयुद्ध कार्य में सफलता ओर विजय के पश्र्चात कृतज्ञता हेतु उनके आराध्य भगवान शिव की आराधना के लिए समुद्र किनारे की रेत से शिवलिंग का अपने हाथों से निर्माण कियातभी भगवान शिव सत्य ज्योति स्वरुप प्रकट हुए ओर उन्होंने इस लिंग को श्री रामेश्वरम की उपमा दी। इस युद्ध में रावण के साथउसका पूरा राक्षस वंश समाप्त हो गया और अन्ततः सीताजी को मुक्त कराकर श्रीराम वापस लौटे। 

रावण भी साधारण राक्षस नहीं था। वह महर्षि पुलस्त्य का वंशजवेदों का परम ज्ञानी और शिवजी का बड़ा भक्त था श्रीराम को उसे मारने के बाद बड़ा खेद हुआ। ब्रह्म हत्या के पाप प्रायश्चित के लिए श्री राम ने युद्ध विजय बाद भी रामेश्वरम् आकर पूजन किया।

शिवलिंग की स्थापना करने के पश्र्चातइस लिंग को काशी विश्वनाथ के समान मान्यता देने हेतुउन्होंने हनुमान जी को काशी से एक शिवलिंग लाने को कहा।हनुमान पवन-सुत थे। बड़े वेग से आकाश मार्ग से चल पड़े और  शिवलिंग ले आए। यह देखकर राम बहुत प्रसन्न हुए और रामेश्वर ज्योतिर्लिंग के साथ काशी के लिंग की भी स्थापना कर दी। छोटे आकार का यही शिवलिंग रामनाथ स्वामी भी कहलाता है। ये दोनों शिवलिंग इस तीर्थ के मुख्य मंदिर में आज भी पूजित हैं।यही मुख्य शिवलिंग ज्योतिर्लिंग है।

रामेश्वर के मंदिर में जिस प्रकार शिवजी की दो मूर्तियां हैउसी प्रकार देवी पार्वती की भी मूर्तियां अलग-अलग स्थापित की गई हैं । देवी की एक मूर्ति पर्वतवर्द्धिनी कहलाती है और दूसरी विशालाक्षी। मंदिर के पूर्व द्वार के बाहर हनुमान की एक विशाल मूर्ति अलग मंदिर में स्थापित है।

    रामेश्वरम् का मंदिर है तो शिवजी कापरन्तु उसके अंदर कई अन्य मंदिर भी हैं । सेतु माधव कहलाने वाले भगवान विष्णु का मंदिर इनमें प्रमुख है।

 रामनाथ के मंदिर के अंदर और परिसर में अनेक पवित्र तीर्थ हैं । ‘कोटि तीर्थ’ जैसे एक दो तालाब भी है। रामनाथ स्वामी मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां स्थित अग्नि तीर्थम में जो भी श्रद्धालु स्नान करते है उनके सारे पाप धुल जाते हैं। इस तीर्थम से निकलने वाले पानी को चमत्कारिक गुणों से युक्त माना जाता है। यह 274 पादल पत्र स्थलम् में से एक हैजहाँ तीनों श्रद्धेय नारायण अप्परसुन्दरर और तिरुग्नना सम्बंदर ने अपने गीतों से मंदिर को जागृत किया था। यह शैववैष्णव और समर्थ लोगों के लिए एक पवित्र तीर्थस्थल माना जाता है। भारत के तमिलनाडु राज्य के रामेश्वरम द्वीप पर और इसके आस-पास कुल मिलाकर 64 तीर्थ है। स्कंद पुराण के अनुसारइनमें से 24 ही महत्वपूर्ण तीर्थ है। इनमे से 22 तीर्थ तो केवल रामानाथस्वामी मंदिर के भीतर ही है। 22 संख्या को भगवान के 22 तीर तरकशों के समान माना गया है। मंदिर के पहले और सबसे मुख्य तीर्थ को अग्नितीर्थं नाम दिया गया है। इन तीर्थो में स्नान करना बड़ा फलदायक और पाप-निवारक समझा जाता है, जिसमें श्रद्धालु पूजा से पहले स्नान करते हैं। हालांकि ऐसा करना अनिवार्य नहीं है।

रामेश्वरम के इन तीर्थो में नहाना काफी शुभ माना जाता है और इन तीर्थो को भी प्राचीन समय से काफी प्रसिद्ध माना गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन तीर्थो में अलग-अलग धातुएं मिली हुई हैं । इस कारण उनमें नहाने से शरीर के रोग दूर हो जाते है और नई ताकत  जाती है।

रामेश्वरम् शहर से करीब डेढ़ मील उत्तर-पूर्व में गंधमादन पर्वत नाम की एक छोटी-सी पहाड़ी है।हनुमानजी ने इसी पर्वत से समुद्र को लांघने के लिए छलांग मारी थी। बाद में राम ने लंका पर चढ़ाई करने के लिए यहीं पर विशाल सेना संगठित की थी। इस पर्वत पर एक सुंदर मंदिर बना हुआ हैजहां श्रीराम के चरण-चिन्हों की पूजा की जाती है। इसे पादुका मंदिर कहते हैं।

  रामेश्वरम् की यात्रा करने वालों को हर जगह राम-कहानी की गूंज सुनाई देती है। रामेश्वरम् के विशाल टापू का चप्पा-चप्पा भगवान राम की कहानी से जुड़ा हुआ है। किसी जगह पर राम ने सीताजी की प्यास बुझाने के लिए धनुष की नोंक से कुआं खोदा थातो कहीं पर उन्होनें सेनानायकों से सलाह की थी। कहीं पर सीताजी ने अग्नि-प्रवेश किया था तो किसी अन्य स्थान पर श्रीराम ने जटाओं से मुक्ति पायी थी। ऐसी सैकड़ों कहानियां प्रचलित है। यहां राम-सेतु के निर्माण में लगे ऐसे पत्थर भी मिलते हैंजो पानी पर तैरते हैं। मान्यता अनुसार नल-नील नामक दो वानरों ने उनको मिले वरदान के कारण जिस पाषाण शिला को छूआवो पानी पर तैरने लगी और सेतु के काम आयी।एक अन्य मतानुसार ये दोनों सेतु-विद्या जानते थे।

  रामेश्वरम् शहर और रामनाथजी का प्रसिद्ध मंदिर इस टापू के उत्तर के छोर पर है। टापू के दक्षिणीकोने में धनुषकोटि नामक तीर्थ हैजहां हिंद महासागर से बंगाल की खाड़ी मिलती है। इसी स्थानको सेतुबंध कहते है। लोगों का विश्वास है कि श्रीराम ने लंका पर चढाई करने के लिए समुद्र पर जोसेतु बांधा थावह इसी स्थान से आरंभ हुआ। इस कारण धनुष-कोटि का धार्मिक महत्व बहुत है।यहीं से कोलम्बो को जहाज जाते थे।

  पूरे भारतदक्षिण पूर्व एशिया और पूर्व एशिया के कई देशों में हर साल दशहरे पर और राम केजीवन पर आधारित सभी तरह के नृत्य-नाटकों में सेतु बंधन का वर्णन किया जाता है। राम के बनाएइस पुल का वर्णन रामायण में तो है हीमहाभारत में भी श्री राम के नल सेतु का जिक्र आया है।कालीदास की रघुवंश में सेतु का वर्णन है। अनेक पुराणों में भी श्रीरामसेतु का विवरण आता है। नासा और भारतीय सेटेलाइट से लिए गए चित्रों में धनुषकोडि से जाफना तक जो एक पतली सीद्वीपों की रेखा दिखती हैउसे ही आज रामसेतु के नाम से जाना जाता है। इसी पुल को बाद मेंएडम्स ब्रिज का नाम मिला।यह सेतु तब पांच दिनों में ही बन गया था। इसकी लंबाई 100 योजन चौड़ाई 10 योजन थी। इसे बनाने में उच्च तकनीक का प्रयोग किया गया था।

   रामेश्वरम् के मंदिर के बाहर भी दूर-दूर तक कई तीर्थ है। प्रत्येक तीर्थ के बारें में अलग-अलगकथाएं है। यहां से करीब तीन मील पूर्व में एक गांव हैजिसका नाम तंगचिमडम है। यह गांव रेलमार्ग के किनारे हो बसा है। वहां स्टेशन के पास समुद्र में एक तीर्थकुंड हैजो विल्लूरणि तीर्थकहलाता है। समुद्र के खारे पानी बीच में से मीठा जल निकलता हैयह बड़े ही अचंभे की बात है।कहा जाता है कि एक बार सीताजी को बड़ी प्यास लगी। पास में समुद्र को छोड़कर और कहीं पानी थाइसलिए राम ने अपने  धनुष की नोक से यह कुंड खोदा था।

सागर तट पर स्नान करते श्रद्धालु

तंगचिडम स्टेशन के पास एक जीर्ण मंदिर है। उसे ‘एकांत’ राम का मंदिर कहते है। इस मंदिर केअब जीर्ण-शीर्ण अवशेष ही बाकी हैं। रामनवमी के पर्व पर यहां कुछ रौनक रहती है। बाकी दिनों मेंबिलकुल सूना रहता है। मंदिर के अंदर श्रीरामलक्ष्मणहनुमान और सीता की बहुत ही सुंदरमूर्तिया है। धुर्नधारी राम की एक मूर्ति ऐसी बनाई गई हैमानो वह हाथ मिलाते हुए कोई गंभीर बातकर रहे हो। दूसरी मूर्ति में राम सीताजी की ओर देखकर मंद मुस्कान के साथ कुछ कह रहे है। येदोनों मूर्तियां बड़ी मनोरम है। यहां सागर में लहरें बिल्कुल नहीं आतींइसलिए एकदम शांत रहताहै। शायद इसीलिए इस स्थान का नाम एकांत राम है।


रामेश्वरम् को घेरे हुए समुद्र में भी कई विशेष स्थान ऐसे बताये जाते हैजहां स्नान करनापाप-मोचक माना जाता है। रामनाथजी के मंदिर के पूर्वी द्वार के सामने बना हुआ सीताकुंड इनमेंमुख्य है। कहा जाता है कि यही वह स्थान हैजहां सीताजी ने अपना सतीत्व सिद्व करने के लिएआग में प्रवेश किया था। सीताजी के ऐसा करते ही आग बुझ गई और अग्नि-कुंड से जल उमड़आया। वही स्थान अब ‘सीताकुंड’ कहलाता है। यहां पर समुद्र का किनारा आधा गोलाकार है।सागर एकदम शांत है। उसमें लहरें बहुत कम उठती है। इस कारण देखने में वह एक तालाब-सालगता है। यहां पर बिना किसी खतरें के स्नान किया जा सकता है। यहीं हनुमान कुंड में तैरते हुएपत्थर भी दिखाई देते हैं।

  लगभग दो दिनों तक रामेश्वरम शहर में महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों का दर्शन करने के उपरांत हमारा अगला पड़ाव था कन्याकुमारी।


लायक राम शर्मा

शिमला

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