भारत भ्रमण यात्रा: एक संस्मरण …
02~03/01~2024
दो जनवरी को हमारा यात्री दल लगभग तीन बजे कन्याकुमारी पहुँच गया।थोड़ी देर होटल में विश्राम करने के पश्चात हम कन्याकुमारी में तीनों सागरों के संगम स्थल पर गये। मध्य हिमालय के एक सुदूर गाँव से गंगा सागर तट होकर कन्याकुमारी पहुँचना अपने आप में एक सुखद एहसास है। सागर की लहरों की निरंतरता जीवन के सापेक्ष है। कन्याकुमारी में सूर्योदय और सूर्यास्त देखना एक अनूठा अनुभव रहा।
कन्याकुमारी एक महत्वपूर्ण हिन्दू तीर्थस्थल है। यह भारत के तमिल नाडु राज्य के कन्याकुमारी ज़िले में स्थित एक नगर है। यह भारत की मुख्यभूमि का दक्षिणतम बिंदु है।
कन्याकुमारी हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का संगम स्थल है, जहां भिन्न सागर अपने विभिन्न रंगों से मनोरम छटा बिखेरते हैं। भारत के सबसे दक्षिण छोर पर बसा कन्याकुमारी वर्षो से कला, संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक रहा है। भारत के पर्यटक स्थल के रूप में भी इस स्थान का अपना ही महत्च है। दूर-दूर फैले समुद्र की विशाल लहरों के बीच यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त का नज़ारा बेहद आकर्षक लगता हैं। समुद्र के किनारे पर फैली रंग बिरंगी रेत इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देती है।
इसका समुद्र तट सुन्दर है और यहां की रेत बहुरंगी है । शानदार रंगों के विभिन्न पहलुओं पर कुछ अध्ययन किए गए हैं। शोध के अनुसार रंग उसमें मौजूद खनिज सामग्री के कारण होते हैं।इनके साथ सटा हुआ तट 71.5 किमी तक विस्तारित है। समुद्र के साथ तिरुवल्लुवर मूर्ति और विवेकानन्द स्मारक शिला खड़े हैं।
इस जगह का नाम कन्याकुमारी पड़ने के पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने असुर बाणासुर को वरदान दिया था कि कुंवारी कन्या के अलावा किसी के हाथों उसका वध नहीं होगा। प्राचीन काल में भारत पर शासन करने वाले राजा भरत के आठ पुत्री और एक पुत्र था। भरत ने अपने साम्राज्य को नौ बराबर हिस्सों में बांटकर अपनी संतानों को दे दिया।दक्षिण का हिस्सा उसकी पुत्री कुमारी को मिला। कुमारी को शक्ति देवी का अवतार माना जाता था। कुमारी ने दक्षिण भारत के इस हिस्से पर कुशलतापूर्वक शासन किया। उसकी ईच्छा थी कि वह शिव से विवाह करे। इसके लिए वह उनकी पूजा करती थी। शिव विवाह के लिए राजी भी हो गए थे और विवाह की तैयारियां होने लगीं थी। लेकिन नारद मुनि चाहते थे कि बाणासुर का कुमारी के हाथों वध हो जाए। इस कारण शिव और देवी कुमारी का विवाह नहीं हो पाया। इस बीच बानासुर को जब कुमारी की सुंदरता के बारे में पता चला तो उसने कुमारी के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा। कुमारी ने कहा कि यदि वह उसे युद्ध में हरा देगा तो वह उससे विवाह कर लेगी। दोनों के बीच युद्ध हुआ और बानासुर को मृत्यु की प्राप्ति हुई।मृत्यु से कुछ क्षण पहले बाणासुर को ज्ञात हुआ कि ये कन्या कोई और नहीं बल्कि साक्षात देवी शक्ति का रूप हैं। मृत्यु से पहले बानासुर ने अपनी गलतियों के लिए माता से क्षमा भी मांगी। माना जाता है कि इसके बाद कुमारी अपने मूलरूप में आयीं और शिव लोक को चली गईं, लेकिन कुमारी ने अम्मन मंदिर में अपनी उपस्थिति बनाए रखी। कुमारी की याद में ही दक्षिण भारत के इस स्थान को कन्याकुमारी कहा जाता है। माना जाता है कि शिव और कुमारी के विवाह की तैयारी का सामान आगे चलकर रंग बिरंगी रेत में परिवर्तित हो गया।
कन्याकुमारी में कुछ दर्शनीय स्थल इस प्रकार से हैं।
1. कन्याकुमारी अम्मन मंदिर…..
सागर के मुहाने के दाईं ओर स्थित यह एक छोटा सा मंदिर है जो माता पार्वती को समर्पित है। मंदिरतीनों समुद्रों के संगम स्थल पर बना हुआ है। यहां सागर की लहरों की आवाज स्वर्ग के संगीत कीभांति सुनाई देती है। भक्तगण मंदिर में प्रवेश करने से पहले त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाते हैं जोमंदिर के बाई ओर 500 मीटर की दूरी पर है। मंदिर के पूर्वी प्रवेश द्वार को हमेशा बंद करके रखाजाता है।
2. गांधी स्मारक अथवा गाँधी मंडपम…..
यह स्मारक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को समर्पित है। यहीं पर महात्मा गांधी की चिता की राख रखीहुई है। इस स्मारक की स्थापना 1956 में हुई थी। 1948 में यहां महात्मा गांधी की अस्थियांविसर्जित की गई थीं । स्मारक को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि महात्मा गांधी के जन्मदिवस पर सूर्य की प्रथम किरणें उस स्थान पर पड़ती हैं जहां महात्मा की राख रखी हुई है।
3. तिरुवल्लुवर मूर्ति…..
तिरुक्कुरुल की रचना करने वाले अमर तमिल कवि तिरूवल्लुवर की यह प्रतिमा पर्यटकों को बहुतलुभाती है। 38 फीट ऊंचे आधार पर बनी यह प्रतिमा 95 फीट की है। इस प्रतिमा की कुल उंचाई133 फीट है और इसका वजन 2000 टन है। इस प्रतिमा को बनाने में कुल 1283 पत्थर के टुकड़ोंका उपयोग किया गया था।
4. विवेकानन्द स्मारक शिला……
समुद्र में बने इस स्थान पर बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। इस पवित्र स्थान को विवेकानन्द स्मारकशिला समिति ने 1970 में स्वामी विवेकानन्द के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए बनवाया था। इसीस्थान पर स्वामी विवेकानंद ने गहन ध्यान लगाया था। इस स्थान को श्रीपद पराई के नाम से भीजाना जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार इस स्थान पर कन्याकुमारी ने भी तपस्या की थी।कहा जाता है कि यहां कुमारी देवी के पैरों के निशान मुद्रित हैं। यह स्मारक विश्व प्रसिद्ध है।
तीन जनवरी को भी हम लगभग सारा दिन कन्याकुमारी के इस छोटे से शहर में घूमते रहे। हमने यहाँ कुछ ख़रीदारी भी की। मानो हम सभी यहाँ की मधुर स्मृतियों को सदा सर्वदा के लिए अपने मानस पटल पर अंकित कर देना चाहते थे। भोजन उपरांत आज रात्रि सफ़र था।
लायक राम शर्मा
शिमला
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