भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण ….. 29-12-2023

भारत दर्शन यात्राएक संस्मरण …..

29-12-2023

रात्रि सफ़र के पश्चात सुबह लगभग दस बजे  हमारा दल तिरुपति शहर पहुँचा। होटल में कुछ समय विश्राम करने के पश्चात हम तिरुमाला की सुंदर चोटियों पर बसे वेंकटेश्वर स्वामी के दर्शन के लिए चल पड़े। यह स्थान भगवान विष्णु के सबसे पवित्र एवं सुंदर स्थानों में से एक है। इसे यदि धरती पर बैकुण्ठ धाम कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति ना होगी। यहाँ के कण-कण में जगत के पालनहार श्रीहरि विष्णु का एहसास है। भगवान के इस अलौकिक धाम का वर्णन जितना किया जाए उतना कम है । भारत दर्शन यात्रा के दौरान यह सबसे पावन, सुंदर एवं रमणीय स्थल है ।

तिरुपति बालाजी मन्दिर एक हिंदू मंदिर हैजो भारत के आंध्र प्रदेश के तिरुपति जिले के पहाड़ी शहर तिरुमला में स्थित है  यह मंदिर भगवान विष्णु के एक रूप भगवान वेंकटेश्वर को समर्पित हैजिनके बारे में माना जाता है कि वे मानव जाति को कलियुग की परीक्षाओं और परेशानियों से बचाने के लिए पृथ्वी पर प्रकट हुए थे। इसलिए इस स्थान का नाम कलियुग वैकुंठ भी पड़ा है और यहां के देवता को कलियुग प्रत्यक्ष दैवम कहा जाता है। इस मंदिर को तिरुमाला मंदिरतिरुपती मंदिर और तिरूपति बालाजी मंदिर जैसे अन्य नामों से भी जाना जाता है। वेंकटेश्वर को कई अन्य नामों से जाना जाता है यथा बालाजीगोविंदा और श्रीनिवास। मंदिर तिरुमला तिरुपती देवस्थानम टीटीडी द्वारा चलाया जाता हैजो आंध्र प्रदेश सरकार के नियंत्रण में है। टीटीडी के प्रमुख की नियुक्ति आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा की जाती है। तमिल के शुरुआती साहित्य में से एक संगम साहित्य में तिरुपति को त्रिवेंगदम कहा गया है। 

 तिरुपति के इतिहास को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। लेकिन यह स्पष्ट है कि 5वीं शताब्दी तक यह एक प्रमुख धार्मिक केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका था। कहा जाता है कि चोलहोयसल और विजयनगर के राजाओं का आर्थिक रूप से इस मंदिर के निर्माण में खास योगदान था।

यहां आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की सबसे बड़ी इच्छा भगवान वैंकटेश्वर के दर्शन करने की होती है।एक लाख से भी अधिक श्रद्धालु इस मंदिर में प्रतिदिन दर्शन के लिए आते हैं। भक्तों की लंबी कतारें देखकर सहज की इस मंदिर की प्रसिद्धि का अनुमान लगाया जा सकता है। मुख्य मंदिर के अलावा यहां अन्य मंदिर भी हैं। तिरुमला और तिरुपति का भक्तिमय वातावरण मन को श्रद्धा और आस्था से भर देता है। यहाँ तीर्थयात्रियों की देखरेख पूर्णतः टीटीडी के संरक्षण में है।

 प्रभु वेंकटेश्वर या बालाजी भगवान विष्णु का अवतार ही हैं। इस मंदिर के विषय में एक अनुश्रुति इस प्रकार से है कि प्रभु विष्णु ने कुछ समय के लिए स्वामी पुष्करणी नामक सरोवर के किनारे निवास किया था। यह सरोवर तिरुमाला के पास स्थित है। तिरुमालातिरुपति के चारों ओर स्थित पहाड़ियाँशेषनाग के सात फनों के आधार पर बनीं 'सप्तगिर‍िकहलाती हैं। श्री वेंकटेश्वरैया का यह मंदिर सप्तगिरि की सातवीं पहाड़ी पर स्थित हैजो वेंकटाद्री नाम से प्रसिद्ध है।

वहीं एक दूसरी अनुश्रुति के अनुसार, 11वीं शताब्दी में संत रामानुज तिरुपति की इस सातवीं पहाड़ी पर गये थे। प्रभु श्रीनिवास (वेंकटेश्वर का दूसरा नामउनके समक्ष प्रकट हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया। ऐसा माना जाता है कि प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात वे 120 वर्ष की आयु तक जीवित रहे और जगह-जगह घूमकर वेंकटेश्वर भगवान की ख्याति फैलाई।

श्री वेंकटेश्वर का यह पवित्र  प्राचीन मंदिर पर्वत की वेंकटाद्रि नामक सातवीं चोटी पर स्थित हैजो श्री स्वामी पुष्करणी नामक तालाब के किनारे स्थित है। इसी कारण यहाँ पर बालाजी को भगवान वेंकटेश्वर के नाम से जाना जाता है। यह भारत के उन चुनिंदा मंदिरों में से एक हैजिसके पट सभी धर्मानुयायियों के लिए खुले हैं। पुराण  अल्वर के लेख जैसे प्राचीन साहित्य स्रोतों के अनुसार कल‍ियुग में भगवान वेंकटेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात ही मुक्ति संभव है।

मंदिर के गर्भगृह में भगवान वैंकटेश्वर साक्षात विराजमान है। यह मुख्य मंदिर के प्रांगण में है। मंदिरपरिसर में अति सुंदरता से बनाए गए अनेक द्वारमंडपम और छोटे मंदिर हैं। 

मंदिर परिसर में मुख्य दर्शनीय स्थल हैंपडी कवली महाद्वारसंपंग प्रदक्षिणमकृष्ण देवर्या मंडपमरंग मंडपमतिरुमला राय मंडपमआईना महलध्वजस्तंभ मंडपमनदिमी पडी कविलीविमानप्रदक्षिणमश्री वरदराजस्वामी श्राइन पोटु आदि।

कहा जाता है कि इस मंदिर की उत्पत्ति वैष्णव संप्रदाय से हुई है। यह संप्रदाय समानता और प्रेम के सिद्धांत को मानता है। इस मंदिर की महिमा का वर्णन विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। माना जाता है कि भगवान वैंकटेश्‍वर का दर्शन करने वाले हरेक व्यक्ति को उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। हालांकि दर्शन करने वाले भक्‍तों के लिए यहां विभिन्‍न जगहों तथा बैंकों से एक विशेष पर्ची कटती है। इसी पर्ची के माध्‍यम से आप यहां भगवान वैंकटेश्‍वर के दर्शन कर सकते है।

देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में तिरुपति बालाजी मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है। देश-विदेश के कई बड़े उद्योगपतिफिल्म सितारे और राजनेता यहां अपनी उपस्थिति देते हैं.

 इस मंदिर के कुछ आश्चर्यजनक तथ्य जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे….

1. मुख्यद्वार के दाएं बालरूप में बालाजी को ठोड़ी से रक्त आया थाउसी समय से बालाजी की ठोड़ी पर चंदन लगाने की प्रथा शुरू हुई।

2. भगवान बालाजी के सिर पर रेशमी केश हैंउनमें कभी गुत्थिया नहीं आती और वह हमेशा ताजा रहते हैं ।

3. मंदिर से 23 किलोमीटर दूर एक गांव हैउस गांव में बाहरी व्यक्ति का प्रवेश निषेध है। वहां पर सभी लोग नियम से रहते हैं। वहां से लाए गए फूल भगवान को चढ़ाए जाते हैं और वहीं की ही अन्य वस्तुओं को चढ़ाया जाता है जैसेदूधघीमाखन आदि।

4. भगवान बालाजी गर्भगृह के मध्य भाग में खड़े दिखते हैं लेकिन वे  वास्तव में दाई तरफ के कोने में खड़े हैं। बाहर से देखने पर ऎसा लगता है।

5. बालाजी को प्रतिदिन नीचे धोती और उपर साड़ी से सजाया जाता है।

6. गृभगृह में चढ़ाई गई किसी वस्तु को बाहर नहीं लाया जाताबालाजी के पीछे एक जलकुंड है,  उन्हें वहीं पीछे देखे बिना उनका विसर्जन किया जाता है।

7. बालाजी की पीठ को जितनी बार भी साफ करोवहां गीलापन रहता ही हैवहां पर कान लगाने पर समुद्र घोष सुनाई देता है।

8. बालाजी के वक्षस्थल पर लक्ष्मीजी निवास करती हैं। हर गुरुवार को निजरूप दर्शन के समय भगवान बालाजी की चंदन से सजावट की जाती है। उस चंदन को निकालने पर लक्ष्मीजी की छवि उस पर उतर आती है।


9. बालाजी के जल कुंड में विसर्जित वस्तुएं तिरूपति से 20 किलोमीटर दूर वेरपेडु में बाहर आती हैं।


10. गर्भगृह में जलने वाले दीपक कभी बुझते नही हैंवे कितने ही हजार सालों से जल रहे हैं किसी को पता भी नही है।

वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर के अतिरिक्त यहां कुछ अत्यंत दुर्लभ और दर्शनीय स्थल इस प्रकार से हैं

1. श्री पद्मावती समोवर मंदिर….

 त्रिचनूर अर्थात अलमेलुमंगपुरम, तिरुपति से पांच किमीदूर है। यह मंदिर भगवान श्री वेंकटेश्वर (विष्णु)की पत्नी श्री पद्मावती (लक्ष्मी)जी को समर्पित है। कहा जाता है कि तिरुमला की यात्रा तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक इस मंदिर के दर्शन नहीं किए जाते।

2. श्री गोविंदराजस्वामी मंदिर….

श्री गोविंदराजस्वामी भगवान बालाजी के बड़े भाई हैं। यह मंदिर तिरुपति का मुख्‍य आकर्षण है।इसका गोपुरम बहुत ही भव्य है जो दूर से ही दिखाई देता है। इस मंदिर का निर्माण संत रामानुजाचार्य ने 1130 ईस्वी में की थी। गोविंदराजस्वामी मंदिर में होने वाले उत्सव और कार्यक्रम वैंकटेश्वर मंदिर के समान ही होते हैं। वार्षिक बह्मोत्‍सव वैसाख मास में मनाया जाता है। इस मंदिर के प्रांगण में संग्रहालय और छोटे-छोटे मंदिर हैं जिनमें पार्थसारथीगोड़ादेवी आंदल औरपुंडरिकावल्ली का मंदिर शामिल है। मंदिर की मुख्य प्रतिमा शयनमूर्ति (भगवान की निंद्रालीनअवस्थाहै।

3. श्री कोदंडरामस्वामी मंदिर….

 यह मंदिर तिरुपति के मध्य में स्थित है। यहां सीताराम और लक्ष्मण की पूजा होती है। इस मंदिर का निर्माण चोल राजा ने दसवीं शताब्दी में कराया था। इस मंदिर के ठीक सामने अंजनेयस्वामी का मंदिर है जो श्री कोदंडरामस्वामी मंदिर का ही उपमंदिर है। उगडी और श्री रामनवमी का पर्व यहां बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।

4. स्वामी पुष्करिणी……

इस पवित्र जलकुंड के पानी का प्रयोग केवल मंदिर के कामों के लिए ही किया जा सकता है। जैसे भगवान के स्नान के लिएमंदिर को साफ करने के लिएमंदिर में रहने वाले परिवारों (पंडितकर्मचारीद्वारा आदि। कुंड का जल पूरी तरह स्वच्छ और कीटाणु रहित है। यहां इसे पुन:चक्रित किए जाने की भी व्‍यवस्‍था की गई है।

माना जाता है कि वैकुंठ में विष्णु पुष्‍करिणी कुंड में ही स्‍नान करते हैइसलिए श्री गरुड़जी श्रीवैंकटेश्वर के लिए इसे धरती पर लेकर आए थे। यह जलकुंड मंदिर से सटा हुआ है। यह भी कहा जाता है कि पुष्करिणी के दर्शन करने से व्यक्ति के सारे पाप धुल जाते हैं और भक्त को सभी सुख प्राप्त होते हैं। मंदिर में प्रवेश करने से पूर्व भक्त यहां दर्शन करते हैं। ऐसा करने से शरीर  आत्मा दोनों पवित्र हो जाते हैं।

5. आकाशगंगा जलप्रपात…..

आकाशगंगा जलप्रपात तिरुमला मंदिर से तीन किमीउत्तर में स्थित है। इसकी प्रसिद्धि का मुख्यकारण यह है कि इसी जल से भगवान को स्‍नान कराया जाता है। पहाड़ी से निकलता पानी तेजी से नीचे धाटी में गिरता है। बारिश के दिनों में यहां का दृश्‍य बहुत की मनमोहक लगता है।

6. श्री वराहस्वामी मंदिर……

तिरुमला के उत्तर में स्थित श्री वराहस्वामी का प्रसिद्ध मंदिर पुष्किरिणी के किनारे स्थित है। यहमंदिर भगवान विष्णु के अवतार वराह स्वामी को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि तिरुमला मूलरूप से आदि वराह क्षेत्र था और वराह स्वामी की अनुमति के बाद ही भगवान वैंकटेश्वर ने यहांअपना निवास स्थान बनाया। ब्रह्म पुराण के अनुसार नैवेद्यम सबसे पहले श्री वराहस्वामी को चढ़ाना चाहिए और श्री वैंकटेश्वर मंदिर जाने से पहले यहां दर्शन करने चाहिए। अत्री संहिता के अनुसार वराह अवतार की तीन रूपों में पूजा की जाती हैआदि वराहप्रलय वराह और यजना वराह।तिरुमला के श्री वराहस्वामी मंदिर में इनके आदि वराह रूप में दर्शन होते हैं।

7. श्री बेदी अंजनेयस्वामी मंदिर….

स्वामी पुष्किरिणी के उत्तर पूर्व में स्थित यह मंदिर श्री वराहस्वामी मंदिर के ठीक सामने है। यह मंदिर हनुमान जी को समर्पित है। यहां स्थापित भगवान की प्रतिमा के हाथ प्रार्थना की अवस्था में हैं। इस मंदिर में अभिषेक रविवार के दिन होता है और यहां हनुमान जयंती बड़े धूमधाम से मनाई जाती है।


लायक राम शर्मा 

शिमला

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