भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण…..
25-28/12/2023….
25 दिसंबर को सुबह-सबेरे ही हमारा यात्री दल आगे बढ़ गया।आज का लगभग सारा दिन एक बार फिर से यात्रा में ही निकल गया। रात्रि विश्राम के लिए रास्ते में रुके और दूसरी सुबह फिर से सफर शुरू हुआ। हमारी यात्रा का अगला पड़ाव था श्रीशैलम मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग। आंध्र प्रदेश के तटवर्ती इलाके से गुजरते हुए यहां की प्राकृतिक छटा का आनंद लिया। 26 तारीख की शाम को हमारा दल आंध्र प्रदेश के डोरनाला नामक स्थान पर पहुंच गया। दो दिन के लंबे सफर के बाद सभी यात्री थकान महसूस कर रहे थे, इसलिए 27 दिसंबर को आंध्र प्रदेश के इस सुदूर क्षेत्र में हमने डेरा डाला और थकान मिटाने के लिए एक दिन का विश्राम किया।
यहां भगवान कार्तिकेय का भव्य मंदिर है। इस मंदिर का श्रीशैलम मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के साथ गहरा संबंध है।यह मंदिर एक वीरान जगह पर बसा है लेकिन धीरे-धीरे एक कस्बे का आकार ले रहा है।अगली प्रातः हम श्री शैलम मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के दर्शनों के लिए सुबह तड़के ही निकल पड़े। घने जंगलों के मध्य हमारी यात्रा शुरू हुई और तलहटी से धीरे धीरे चढ़ाई करते हुए पहाड़ की तरफ़ बढ़े। 3 घंटे की यात्रा के बाद हम अपने गंतव्य स्थान श्रीशैलम मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग पहुंच चुके थे। यहाँ अनुभूति हुई कि हम हिमाचल के किसी पहाड़ी क्षेत्र में पहुँच चुके हैं। घने जंगलों के बीच श्रीशैलम के रूप में है भगवान शंकर के दर्शन वास्तव में शब्दों की परिधि से परे है।
श्री शैलम अथवा श्री भ्रामराम्बिका मल्लिकार्जुन नामक ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश के पश्चिमी भाग में कुर्नूल जिले के नल्लामल्ला जंगलों के मध्य श्री शैलम पहाडी पर स्थित है।यहाँ शिव की आराधना मल्लिकार्जुन नाम से की जाती है।
स्कंद पुराण में श्री शैल काण्ड नाम का अध्याय है। इसमें उपरोक्त मंदिर का वर्णन है। इससे इस मंदिर की प्राचीनता का पता चलता है। तमिल संतों ने भी प्राचीन काल से ही इसकी स्तुति गायी है। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने जब इस मंदिर की यात्रा की, तब उन्होंने शिवानंद लहरी की रचना की थी। श्री शैलम का सन्दर्भ प्राचीन हिन्दू पुराणों और महाभारत में भी आता है।
यह शैव और शक्ति दोनों हिंदू संप्रदायों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस मंदिर को शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों और हिंदू देवी के 52 शक्तिपीठों में से एक के रूप में जाना जाता है। शिव की पूजा मल्लिकार्जुन के रूप में की जाती है और उन्हें लिंगम द्वारा दर्शाया जाता है। उनकी पत्नी पार्वती को भ्रमराम्बा के रूप में दर्शाया गया है।
दंत कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव के दोनों पुत्र गणेश जी और कार्तिकेय जी विवाह के लिए आपस में झगड़ने लगे। वह इस बात पर बहस कर रहे थे कि सबसे पहले विवाह कौन करेगा। तब भगवान शिव ने निष्कर्ष निकालने के लिए उन दोनों को एक कार्य सौंपा। उन्होंने कहा कि जो सबसे पहले पृथ्वी का चक्कर लगाकर वापस आ जाएगा, उसी का विवाह सबसे पहले किया जाएगा।
भगवान कार्तिकेय पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए चले गए लेकिन गणेश जी अपने स्थूल शरीर की वजह से विचार में पड़ गए। बुद्धि के देवता गणेश जी ने सोच-विचार करके अपनी माता पार्वती और पिता महादेव से एक आसन पर बैठने का आग्रह किया। लेकिन उन दोनों के आसन पर बैठ जाने के बाद श्रीगणेश ने उनकी सात परिक्रमा की। इस प्रकार श्रीगणेश माता-पिता की परिक्रमा करके पृथ्वी की परिक्रमा से प्राप्त होने वाले फल की प्राप्ति के अधिकारी बन गये।
उनकी चतुर बुद्धि को देख कर शिव और पार्वती दोनों बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने श्रीगणेश का विवाह करा दिया। जब कार्तिकेय पृथ्वी से वापस लौटे तो गणेश जी को विवाहित पाकर अपने माता-पिता से अत्यंत क्रोधित हो गए । क्रोधित होकर कार्तिकेय क्रोंच पर्वत पर आ गए। इसके बाद सभी देवता उनसे कैलाश पर्वत पर लौटने की विनती करने लगे लेकिन वह नहीं माने। पुत्र वियोग में माता पार्वती और भगवान शिव दुखी हो गए।
जब दोनों से रहा नहीं गया तब वह स्वयं क्रोंच पर्वत पर गए। माता-पिता के आने की खबर सुनकर कार्तिकेय वहां से और दूर चले गए। अंत में पुत्र के दर्शन के लिए भगवान शिव ने ज्योति रूप धारण किया और उसी में माता पार्वती भी विराजमान हो गईं। उसी दिन से इन्हें मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाने लगा। इसमें मल्लिका माता पार्वती का नाम है, जबकि अर्जुन भगवान शंकर को कहा जाता है। इस प्रकार सम्मिलित रूप से ‘मल्लिकार्जुन’ ज्योतिर्लिंग पूरे जगत में प्रसिद्ध है।
हिंदू किंवदंती के अनुसार, यहाँ लिंग अर्थात अर्जुन (शिव का एक प्रतिष्ठित रूप) के रूप में पीठासीन देवता की पूजा चमेली (स्थानीय रूप से तेलुगु में मल्लिका के रूप में कहा जाता है ) के साथ की जाती थी, जिससे उनका नाम मल्लिकार्जुन पड़ा।इस मंदिर में शिव को बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है । देवी ब्रम्हरमभा के मंदिर को बावन शक्तिपीठों में से एक माना जाता है । इस मंदिर को पाडल पेट्रा स्थलम में से एक माना जाता है ।
मुख्य मंदिर के रास्ते में शिखरेश्वरम मंदिर स्थित है। कहा जाता है कि इस मंदिर में दर्शन करने से पुनर्जन्म नहीं होता।
कृष्णा नदी को यहां पाताल गंगा कहा जाता है। नदी तक पहुंचने के लिए 852 सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। इसी नदी के पानी से शिवलिंग को स्नान कराया जाता है।
मंदिर का गर्भगृह बहुत छोटा है और यहाँ एक समय में अधिक लोग दर्शन नही कर सकते। इस कारण यहाँ दर्शन के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी होती है। मंदिर परिसर दो हेक्टेयर में फैला है और इसमें चार प्रवेश द्वार हैं जिन्हें गोपुरम के नाम से जाना जाता है । मंदिर परिसर में कई मंदिर हैं, जिनमें मल्लिकार्जुन और भ्रमरम्बा के मंदिर सबसे प्रमुख हैं। मंदिर परिसर में कई हॉल हैं; सबसे उल्लेखनीय विजयनगर काल के दौरान निर्मित मुख मंडप है। मंदिर पूर्व की ओर मुख करके स्थित है। केंद्र मंडप में कई स्तंभ हैं, जिनमें नादिकेश्वर की एक विशाल मूर्ति है। परिसर में कई मूर्तियां हैं जो एक दूसरे के ऊपर उठी हुई हैं। मुखमंडप, गर्भगृह की ओर जाने वाला हॉल, में जटिल रूप से गढ़े गए स्तंभ हैं। जिस मंदिर में मल्लिकार्जुन को रखा गया है उसे मंदिर में सबसे पुराना माना जाता है। माना जाता है कि यहाँ एक सहस्र लिंग हैं, जिसे भगवान राम ने बनवाया था और पाँच अन्य लिंग हैं, जिन्हें पांडवों ने बनवाया था। पहले परिसर में एक दर्पण कक्ष में नटराज की छवियाँ हैं।
लायक राम शर्मा
शिमला
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