भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण …..14-12-2023

 भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण.....

14-12-2023


गया प्रवास का आज हमारा अंतिम दिन था इसलिए शेष बची वेदियों पर पिंडदान की प्रक्रिया के लिए हम सुबह ही निकल पड़े। सर्वप्रथम हम भीमगया पहुंचे। यह वैतरणी के पश्चिम-उत्तर एक घेरे के भीतर विशालकाय शिला है। घेरे के भीतर एक बरामदे में भीमसेन की मूर्ति है। दक्षिण बरामदे में भीमसेन के अंगूठे का तीन हाथ गहरा चिन्ह है। यहां पर विधिपूर्वक पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण की गई और इसके पश्चात हम गदालोल के लिए चल पड़े।

अक्षयवट के दक्षिण गदालोल नामक एक कच्चा सरोवर है। सरोवर में एक स्तंभ के रूप में गदा है। कहते हैं कि असुर को मारकर भगवान ने यहां गदा धोयी थी।

हमारा अगला पड़ाव भस्मकूट अर्थात गोप्रचार था । यह भीमगया से दक्षिण पश्चिम एक छोटी पहाड़ी है। इसके ऊपर भगवान जनार्दन का मंदिर है। इस मंदिर से थोड़ी दूरी पर मंगला देवी का मंदिर है जिसमें मंगलेश्वर शिवलिंग तथा मंगला देवी की मूर्ति है। यही गो प्रचार तीर्थ है। एक शिला पर गायों के खुरों के चिन्ह हैं। कहते हैं कि ब्रह्मा जी ने यहां पर गोदान किया था। यहां पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण करने के पश्चात हम अक्षयवट के लिए चल पड़े।

 ब्रह्मसरोवर के पास ही अक्षय वट है। यह चार दीवारी से घिरा विस्तृत पक्का आंगन है, जिसके मध्य वट वृक्ष है। इसके उत्तर बटेश्वर महादेव का मंदिर है। संपूर्ण वेदियों पर पिंडदान करने के पश्चात यह वो स्थान है जहां गयापाल पंडों के द्वारा सुफल विदाई दी जाती है।


   गया में पिंडदान की संपूर्ण प्रक्रिया के दौरान सबसे महत्वपूर्ण तथा अंतिम पड़ाव है गोदान तर्पण क्रिया। इसके लिए हम वैतरणी की तरफ चल पड़े। गया के दक्षिण फाटक के दक्षिण मंगला गौरी के पास ही यह सरोवर है। यहां पहुंचकर पितरों की आत्मिक शांति एवं तृप्ति के लिए पिंडदान के पश्चात गोदान तर्पण करना अति आवश्यक माना जाता है। वैतरणी में गोदान तर्पण करने के उपरांत हमारी तीन दिवसीय पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण हुई। इस दौरान हमने 45 वेदियों पर पिंडदान किया तथा चार अलग-अलग वेदियों पर तर्पण की प्रक्रिया पूर्ण की। इन संपूर्ण 45 वेदियों का विवरण निम्न प्रकार से है:

1 पुनपुन

 2 फल्गु

 3 सिर गया

 4 कूप गया

5 कार्तिकपद

6 दक्षिणाग्निपद

7  गार्हपत्याग्निपद

8 आवहनीयाग्निपद

9 संध्याग्निपद

10 आवसंध्याग्निपद

11 सूर्यपद

12 चंद्रपद

13 गणेशपद

14 उदीचीपद

15 कण्वपद

16 मातंगपद

17 कौचपद

18 इंद्रपद

19 अगास्त्यपद 

20 काश्यपद

 21 रूद्रपद

22 ब्रह्मपद

23 विष्णुपद 

24 उत्तर मानस

25  दक्षिण मानस

26 जीव्हालोल

27 उदीची

28 कनखल

29 प्रेतशिला

30 ब्रह्मकुंड

31 रामशिला

32 रामकुंड

33 काकबली

34 मातंगवापी

35 धर्मारण्य

36 सरस्वती

37 रहटकूप

38 बोधगया

39 रामगया

40 सीताकुंड

41 भीमगया

42 गदालोल

43 गोप्रचार

44 अक्षय वट

45 वैतरणी

कर्मफल सिद्धांत के अनुसार कुल 84 लाख योनियों में मनुष्य योनि ही सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। मनुष्य योनि पाने के बाद आत्मा का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति ही है।

सनातन धर्मानुयायी लोगों  की यह प्रबल इच्छा रहती है कि उनकी संतान उनकी मृत्यु के बाद उनका श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करे। वस्तुत: अत्यंत श्रद्धा एवं सद्भाव के साथ किए जाने के कारण ही इस कार्य का नाम श्राद्ध पड़ा है। धर्म ग्रंथो में देवता की उपासना के समान ही पितृ कार्य भी सनातन वैदिक जाति का एक अति आवश्यक नित्य कर्म है। विष्णु पुराण के अनुसार श्राद्ध काल में भक्ति और विनम्र चित्त से उत्तम ब्राह्मण को यथाशक्ति भोजन कराना अनिवार्य माना गया है।

गया श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान की महत्वपूर्ण स्थली रही है, जिसमें फल्गु नदी के अविस्मरणीय योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। किसी भी देश के इतिहास विनिर्माण में प्रकृति प्रदत्त उपहार के अंतर्गत प्रथम स्थान पर आसीन नदी का अमूल्य योगदान माना जाता है।

 ऐसी मान्यता है कि इस पुण्य क्षेत्र में पिता का श्राद्ध करके पुत्र अपने पितृ ऋण से हमेशा हमेशा के लिए उऋण हो जाता है। उसके द्वारा किए गए इस पवित्र कार्य से उसके पूर्वजों की भटकती आत्मा को शांति मिलती है तथा वह प्रेत योनि से मुक्त हो जाते हैं। साथ ही पितरों की प्रसन्नता से श्राद्ध कर्ता को भविष्य में धन-धान्य, सुख समृद्धि व संपत्ति की प्राप्ति होती है।

गया में 3 दिन के प्रवास के दौरान आज दोपहर तक श्राद्ध कर्म से निवृत होने के पश्चात हमें गया शहर को घूमने का अवसर मिला। मन को बेहद सुकून और शांति मिली। पिछले तीन दिनों के अति व्यस्ततम कार्यक्रम के पश्चात फुर्सत में टहलने का आनंद लिया।

लायक राम शर्मा

शिमला

भारत दर्शन यात्रा : एक संस्मरण ……13-12-2023

 भारत दर्शन यात्रा : एक संस्मरण…13-12-2023

अगले दिन सुबह फल्गु नदी में स्नान के उपरांत पिंडदान की प्रक्रिया आरंभ हुई। सर्वप्रथम हम ब्रह्मकुंड गए। यह स्थान राम शिला से लगभग 4 मील पश्चिम स्थित है। इसका प्राचीन नाम प्रेत पर्वत है।गया नगर से यह स्थान सात मील दूर है। यहाँ पर्वत के नीचे एक पक्का सरोवर है और एक धर्मशाला है। इसे ब्रह्म कुंड कहते हैं।यहाँ तक रामशिला होकर आने के लिए पक्की सड़क है। ब्रह्म कुंड के पास एक-दो मंदिर हैं । ब्रह्म कुंड से लगभग चार सौ सीढ़ी चढ़कर प्रेतशिला पहुँचते हैं। ऊपर एक छोटा मंदिर है जिसमें आंगन और बरामदे हैं।ऐसा माना जाता है कि इस चोटी पर ब्रह्मा जी के चरण विराजमान हैं तथा जो जीवात्मा भटक कर प्रेत या पिशाच योनी में चली जाती है,यहाँ पिंडदान करने से उस आत्मा को मुक्ति मिल जाती है।इस प्रकार ब्रह्म कुंड पहुंचकर हमने ब्रह्म कुंड और प्रेतशिला दोनों वेदियों पर पिंड दान की प्रक्रिया पूर्ण की। 

आज के दिन का हमारा अगला पड़ाव था राम शिला। यह स्थान विष्णुपद मंदिर से लगभग तीन मील उत्तर फल्गु के किनारे राम शिला पहाड़ी पर स्थित है।पहाड़ी के नीचे रामकुंड नामक सरोवर है तथा सरोवर के दक्षिण एक शिव मंदिर है। रामशिला में 20 सीढ़ी ऊपर एक श्रीराम मंदिर है। इस मंदिर में भगवान राम के चरण चिन्ह आज भी विद्यमान् हैं। मंदिर के दक्षिण एक बरामदे में दो-तीन मूर्तियां है। श्रीराम के यहाँ आने से पूर्व इस पहाड़ी का नाम प्रेतशिला था। इस स्थान पर तीन महत्वपूर्ण वेदियों रामशिला, रामकुंड और काकबली पर पिंडदान होता है। काकबली राम शिला से दो सौ गज दक्षिण एक घेरे के भीतर वटवृक्ष है तथा इस स्थान पर काकबली, यमबली और श्वानबली वेदी है।

रामशिला पर पिंडदान करने के पश्चात हमारा दल सरस्वती नदी की तरफ निकल पड़ा। गया से तीन मील आगे जाकर पक्की सड़क छोड़कर हमें थोड़ा पैदल चलना पड़ा। एक मील कच्चे मार्ग से जाने पर सरस्वती नदी मिलती है। सरस्वती नदी के तट पर छोटा सा सरस्वती देवी का मंदिर है।वहीं एक चबूतरे पर मां सरस्वती के चरण चिन्ह तथा कई शिवलिंग हैं ।यहां पिंडदान करने के पश्चात हम मातंगवापी की तरफ बढ़ गए। सरस्वती नदी से लगभग एक मील पर मातंगवापी नामक एक छोटी सी बावड़ी है। यहां पगडंडी से आना पड़ता है। बावड़ी के उत्तर क‌‌ई मंदिर हैंजिनमें मातंगेश्वर शिव का मंदिर मुख्य है।

 मातंगवापी में पिंडदान करने के पश्चात हमारा अगला पड़ाव धर्मारण्य था। यह स्थान मातंगवापी से 2 मील दक्षिण-पूर्व में स्थित है। यहां एक कुआं है। पिंडदान करने के बाद पिंड कुएं में डाल दिया जाता है। यहां धर्मराज युधिष्ठिर का छोटा सा मंदिर है। पास में रहटकूप है। पुत्र कामना से उसके पास लोग पिंडदान करते हैं। कूप के समीप भीमसेन का छोटा मंदिर है। कहते हैं युधिष्ठिर जब भीमसेन के साथ अपने पिता का श्राद्ध करने यहां आए थे तब यहां पर कुछ दिन उन्होंने तप किया था। यहां पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण करने के पश्चात हम बोधगया की तरफ बढ़ गए। यह स्थान धर्मारण्य से एक मील पश्चिम में स्थित है तथा गया नगर से बोधगया लगभग 7 मील की दूरी पर स्थित है। यहां बुद्ध भगवान का विशाल मंदिर है। मंदिर के पीछे पत्थर का चबूतरा है जिसे बौद्ध सिंहासन कहते हैं। इसी स्थान पर बैठकर गौतम बुद्ध ने तपस्या की थी और यहीं पर बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था। बोधि वृक्ष तो अब यहां नहीं है किंतु एक नया पीपल का वृक्ष वहां लगाया गया है। बोधगया में पिंडदान करने के पश्चात हमारा आज का अंतिम पड़ाव राम गया था।

बोधगया से वापस आकर हम सीधे फल्गु नदी के तट पर स्थित सीता कुंड नामक स्थान पर पहुंचे।यह स्थान विष्णु पद मंदिर के ठीक सामने फल्गु नदी के उस पार स्थित है। यहां मंदिर में काले पत्थर का महाराज दशरथ का हाथ बना है। यहीं पर एक शिला है जो भरताश्रम की वेदी कहलाती है।इसी को राम गया कहते हैं। यहां मतंग ऋषि का चरण चिन्ह बना है तथा अनेक देव मूर्तियां हैं। सीताकुंड पर बालू का पिंड दान किया जाता है।

हालांकि गया में पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण करने में लगभग एक सप्ताह का समय लग जाता है लेकिन समय अभाव के कारण हमें इस प्रक्रिया को दिन में ही पूर्ण करना थाइसलिए आज का दिन बहुत व्यस्त रहा। सांझ की बेला तक हम पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण कर वापस अपने गंतव्य स्थान पर पहुंच चुके थे।


लायक़ राम शर्मा

शिमला।

शाली माता मंदिर शिमला

शाली माता मंदिर शिमला...
शाली माता मंदिर गाँव दलाना, पंचायत खटनोल, तहसील सुन्नी, जिला शिमला, हिमाचल प्रदेश में शाली टिब्बा पर स्थित है। शाली टिब्बा की समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 9420 फीट है। यह अकेली चोटी वृहद् हिमालय के मनोरम 360 डिग्री दृश्य के लिए एक शानदार एवं सुविधाजनक स्थान प्रदान करती है। शाली मंदिर पहुँचने के लिए खटनोल से 3 घंटे और मशोबरा से 7 घंटे का पैदल मार्ग है।माता शाली देवी को माँ भीमा काली का स्वरूप कहा जाता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए देवदार, मौरू एवं बान के पेड़ों से घिरा रास्ता श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। माता के दर्शन करने के लिए देश विदेश से लोग यहां आते हैं व माता से मन्नत मांगते हैं।
 मां शाली देवी के मंदिर में मांगी गई मन्नत जल्द ही पूरी हो जाती है। मां शाली को समस्त रोगों की हर्ता माना जाता है व लोगों की इस स्थान के प्रति बड़ी आस्था है। 
ऐसी मान्यता है कि वर्षो पहले दलाणा गांव के प्रसिद्ध विद्वान बदरा पंडित सराहन से देवी को यहां लाए थे तथा माता की मूर्ति दलाणा में स्थापित की गई थी। इसके बाद देवी के आदेश से स्थानीय लोगों ने 9420 फुट ऊंचाई वाली शाली नामक चोटी पर मंदिर बनाया। पहले इस स्थान पर देवी माता का एक छोटा सा मंदिर हुआ करता था, लेकिन अब माँ भीमाकाली मंदिर विकास समिति दलाणा के प्रयासों से परिसर का विकास किया जा रहा है। अब यहां पर 200 से 250 श्रद्धालुओं के ठहरने की सुविधा उपलब्ध है। वर्तमान समय में मंदिर परिसर में यात्रियों की सुविधा हेतु दो सराय भवन और कैंटीन की सुविधा उपलब्ध है। मंदिर में एक पुजारी और चौकीदार स्थायी रूप से कार्यरत है।
माता शाली देवी मंदिर शिमला से करीब 50 किलोमीटर दूर है। यहां पहुंचने के लिए शिमला से खटनोल ग्राम तक सड़क सुविधा उपलब्ध है। खटनोल पहुंचने के बाद मंदिर जाने के लिए तीन घंटे का पैदल रास्ता है। हालाँकि यह रास्ता कठिन है, लेकिन देवदार बान और मौरू के पेड़ों के बीच का यह सफ़र अपने आप में मनमोहक प्रतीत होता है। जैसे-जैसे आप ऊँचाई पर चढ़ते जाते हैं ,चारों ओर का दृश्य आपकी थकान को कम कर देता। आप भी जरूर इस दिव्य धाम का दर्शन कर पुण्य के भागीदार बनें एवं माता शाली का आशीर्वाद प्राप्त करें!

जय मां शाली !!!
जय मां भीमाकाली !!!

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण……12-12-2023

 भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण….12-12-2023

एकता तीर्थ यात्रा संगम सुंदर नगर के बैनर तले इस भारत दर्शन यात्रा का आज दसवां दिन था। हम बिहार राज्य के सबसे पवित्र स्थल गया पहुंच चुके थे। यह यात्रा का ऐसा पड़ाव था, जहां अपने कुल के पितरों (पूर्वजों) के उद्धार हेतु हमें अगले तीन दिन तक पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण की प्रक्रिया पूर्ण करनी थी। हिंदू धर्म मान्यताओं के अनुसार ऐसा माना जाता है कि प्रत्येक हिंदू को जीवन में कम से कम एक बार अपने पितरों के उद्धार हेतु गया में पिंडदान श्राद्ध एवं तर्पण करना चाहिए।

 गया भारत के बिहार राज्य में स्थित एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यह गया ज़िले का मुख्यालय और बिहार राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। इस क्षेत्र के लोग मगही भाषा बोलते हैं। यह भारत के अतंरराष्ट्रीय पर्यटक स्थलों में से एक है। इस नगर का हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्मों में अत्यंत महत्व है। शहर का उल्लेख रामायण और महाभारत में भी मिलता है। गया तीन ओर से छोटी व पथरीली पहाड़ियों से घिरा है, जिनके नाम मंगला-गौरी, श्रृंग स्थान, रामशिला अथवा ब्रह्मयोनि हैं। नगर के पूर्व में फल्गू नदी बहती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए भारत में 55 स्थानों को महत्वपूर्ण माना गया है, लेकिन फल्गु नदी के तट पर स्थित गया शहर का अपना विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि सर्वपितृ अमावस्या के दिन गया में पिंडदान करने से 108 कुल और 7 पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है। पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए इस स्थान को मोक्ष स्थली कहा जाता है। पुराणों में बताया गया है कि प्राचीन शहर गया में भगवान विष्णु स्वयं पितृदेव के रूप में निवास करते हैं।

गया में श्राद्ध कर्म, तर्पण विधि और पिंडदान करने के बाद कुछ भी शेष नहीं रह जाता है और यहां से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त हो जाता है। गया का महत्व इसी से पता चलता है कि फल्गु नदी के तट पर भगवान राम और माता सीता ने राजा दशरथ की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए यहीं पर श्राद्ध कर्म और पिंडदान किया था। महाभारत काल में पांडवों ने भी इसी स्थान पर श्राद्ध कर्म किया था।

 वायु पुराण, गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण में भी गया शहर का महत्व बताया गया है। गया शहर में हर साल पितृपक्ष के दौरान एक बार मेला लगता है, जिसे पितृपक्ष का मेला भी कहा जाता है। गया शहर हिंदुओं के साथ साथ बौद्ध धर्म के लिए भी पवित्र स्थल है। बोधगया को भगवान बुद्ध की भूमि भी कहा जाता है। यहां पर बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने अपनी शैली में कई मंदिरों का निर्माण करवाया है।

गया शहर के संबंध में एक पौराणिक कथा प्रचलित है। इसके अनुसार गयासुर नामक एक असुर ने कड़ी तपस्या की थी और ब्रह्माजी से वरदान मांगा कि उसका शरीर पवित्र हो जाए और लोग उसके दर्शन कर पाप मुक्त हो जाएं। इस वरदान के बाद लोगों में भय खत्म हो गया और वो पाप करने लगे। पाप करने के बाद वह गयासुर के दर्शन करते और पाप मुक्त हो जाते थे। ऐसा होने से स्वर्ग और नरक का संतुलन बिगड़ने लगा। बड़े-बड़े पापी भी स्वर्ग पहुंचने लगे। इन सबसे बचने के लिए देवतागण गयासुर के पास पहुंचे और यज्ञ के लिए पवित्र स्थान की मांग की। गयासुर ने अपना शरीर ही देवताओं को यज्ञ के लिए दे दिया और कहा कि आप मेरे ऊपर ही यज्ञ करें। जब गयासुर लेटा तो उसका शरीर पांच कोस में फैल गया और यही पांच कोस आगे चलकर गया बन गया। एक कोस क्षेत्र गया-सिर माना जाता है। ढाई कोस तक गया है और पांच कोस तक गया-क्षेत्र है। इसी के मध्य में सब तीर्थ आ जाते हैं।

 गयासुर के पुण्य प्रभाव से वह स्थान तीर्थ के रूप में जाना गया। गया में पहले विविध नामों से 360 वेदियां थी लेकिन अब केवल 54 ही शेष बची हैं। गया में भगवान विष्णु गदाधर के रूप में विराजमान हैं। गयासुर के विशुद्ध शरीर में ब्रह्मा, जनार्दन, शिव तथा प्रपितामह निवास करते हैं। इसलिए पिंडदान व श्राद्ध कर्म के लिए इस स्थान को उत्तम माना गया है।

हिंदू धर्म मान्यता के अनुसार पितर कामना करते हैं कि उनके वंश में कोई ऐसा पुत्र उत्पन्न हो, जो गया जाकर वहां उनका श्राद्ध करे। लोगों में यह भ्रांति घर कर गई है कि गया में पिंडदान करने के पश्चात फिर पितरों का वार्षिक श्राद्ध नहीं करना चाहिए। सच बात तो यह है कि गया में पिंडदान से पितरों की अक्षय तृप्ति होती है। इसलिए यदि उसके पश्चात वार्षिक श्राद्ध ना किया जाए तो श्राद्ध न करने का पाप नहीं होता, किंतु यदि वार्षिक श्राद्ध किया जाए तो वह उत्तम माना जाता है। इससे पितर प्रसन्न ही होते हैं।

अन्य हिंदू तीर्थ स्थलों की भांति गया में भी अलग-अलग क्षेत्र के तीर्थ पुरोहित हैं। इसलिए हम सर्वप्रथम अपने तीर्थ पुरोहित के पास गए और उनका आशीर्वाद लिया। तत्पश्चात पिंडदान की प्रक्रिया के लिए फल्गु के तट की तरफ रवाना हो गए। पूजा-पाठ की प्रक्रिया एवं हमारा मार्गदर्शन करने के लिए पंडित धीरेंद्र मिश्रा जी अगले तीन दिन तक हमारे साथ रहने वाले थे।

 फल्गु में स्नान करने के पश्चात पिंडदान की प्रक्रिया शुरू हुई। यहाँ फल्गु के तट पर पुनपुन और फल्गु दो वेदियां लगती है। पिंड को फल्गु नदी में प्रवाहित किया जाता है तथा इसके बाद तर्पण किया जाता है।

फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने के पश्चात हम 'गयासिर' नामक स्थान पर पहुंच गए। यह स्थान विष्णु पद मंदिर से दक्षिण में स्थित है। इस स्थान पर दो वेदियां लगती हैं।

 प्रथम वेदी गया सिर और द्वितीय गयाकूप। इसी बरामदे में एक छोटा कुंड है और गया सिर वेदि का पिंड इस कुंड में पड़ता है तथा यहां से पश्चिम एक घेरे में गया कूप है। गया कूप पिंड मुंडपृष्ठा नामक स्थान पर पड़ता है।

आज के दिन का हमारा अगला पड़ाव था गया का सबसे प्रसिद्ध  विष्णुपद मंदिर। महारानी अहिल्याबाई द्वारा बनाया गया यह काले पत्थर का अति सुंदर और आकर्षक मंदिर है। मंदिर के अंदर गयासुर की प्रार्थना के अनुसार भगवान विष्णु का चरण चिन्ह है। मंदिर का ऊपरी भाग गुम्बजाकार है, जो देखने में बहुत सुंदर मालूम होता है। मंदिर के ऊपर शिखर पर बाल गोविंद सेन नामक एक गयापाल की चढ़ाई हुई सोने की ध्वजा फहराती है। मंदिर के भीतरी भाग में चांदी से आच्छादित  एक अष्टकोण कुंड में विष्णु का चरण चिन्ह है। मंदिर के सामने के भाग में एक सभा मंडप है। चरण के ऊपर एक चांदी का छात्र सुशोभित है। मंदिर के सभा मंडप में और उसके बाहर दो बड़े घंटे लटक रहे हैं। यहां पर एक विचित्र बात का उल्लेख आवश्यक प्रतीत होता है और वह यह है कि सभा मंडप की छत से पानी की बूंद टपका करती है। जन श्रुति के अनुसार जिस तीर्थ का नाम हृदय में रखकर आप हाथ पसारिए आपके हाथ में एक-दो बूंद पानी की अवश्य गिरेगी।

विष्णु पद मंदिर के 16 वेदी नामक मंडप में 14 स्थान पर और पास के मंडप में दो स्थान पर पिंडदान होता है। वेदियों के नाम इस प्रकार से हैं।

कार्तिकपद, दक्षिणाग्निपद, गार्हपत्याग्निपद, आवहनीयाग्निपद, संध्याग्निपद, आवसंध्याग्निपद, सूर्यपद, चंद्रपद, गणेशपद, उदीचीपद, कण्वपद, मातंगपद, कौचपद, इंद्रपद, अगास्त्यपद और काश्यपद। इसके अतिरिक्त विष्णु पद मंदिर में रूद्रपद, ब्रह्मपद और विष्णुपद तीन वेदियों पर अलग से पिंडदान होता है। कुल मिला करके विष्णु पद मंदिर में 19 वेदियो पर पिंडदान होता है। यह एक लंबी प्रक्रिया है और यहां पर पिंडदान एवं दर्शन करने में बहुत समय लग गया।

हमारा आज का अंतिम पड़ाव था सूरजकुंड। विष्णु कुंड से लगभग थोड़ी दूरी पर यह सरोवर है इस कुंड का उत्तरी भाग उदीची मध्य भाग कनखल और दक्षिण भाग दक्षिण मानस तीर्थ कहलाता है इस कुंड के पश्चिम में एक मंदिर में सूर्य नारायण की चतुर्भुज मूर्ति है जिससे दक्षिणावर के कहते हैं।

सूर्यकुंड से 80 गज दक्षिण फल्गु किनारे जिव्हालोल तीर्थ है और यहां एक पीपल का वृक्ष है। सूरजकुंड में हमने पांच अलग-अलग वेदियों का पिंडदान किया। यह पांच वेदियां इस प्रकार से हैं। उत्तर मानस, दक्षिण मानस, जीव्हालोल, उदीची और  कनखल।गया में प्रथम दिन बहुत व्यस्त रहा और आज हमने लगभग 28 वेदियों पर पिंडदान किया।

लायक राम शर्मा

शिमला

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण....10/11-12-2023

भारत दर्शन यात्रा : एक संस्मरण....
10/11-12-2023
10 दिसम्बर की प्रात: हमारा दल काशी के लिए रवाना हो गया। आज का दिन सफ़र में ही बीत गया। चित्रकूट से काशी पहुंचने में लगभग आठ से दस घंटे का सफ़र तय करना पड़ता है। शाम ढलने तक हम वाराणसी पहुंच गए। सारे दिन के सफ़र की थकान के पश्चात हम सीधे अपने गंतव्य स्थान में विश्राम के लिए चले गये।
काशी नगरी वर्तमान वाराणसी शहर में स्थित पौराणिक नगरी है। इसे संसार के सबसे पुराने नगरों में माना जाता है। भारत की यह जगत प्रसिद्ध प्राचीन नगरी गंगा के उत्तरी तट पर उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी कोने में वरुणा और असी नदियों के गंगा संगम के बीच बसी हुई है। इस स्थान पर गंगा ने प्राय: चार मील का दक्षिण से उत्तर की ओर घुमाव लिया है और इसी घुमाव के ऊपर यह नगरी स्थित है। 
विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है। पुराणों के अनुसार यह आद्य वैष्णव स्थान है। पहले यह भगवान विष्णु (माधव) की पुरी थी। जहां श्रीहरि के आनंदाश्रु गिरे थे, वहां बिंदु सरोवर बन गया और प्रभु यहां बिंधुमाधव के नाम से प्रतिष्ठित हुए। 
ऐसी एक कथा है कि जब भगवान शंकर ने क्रुद्ध होकर ब्रह्माजी का पांचवां सिर काट दिया, तो वह उनके करतल से चिपक गया। बारह वर्षों तक अनेक तीर्थों में भ्रमण करने पर भी वह सिर उन से अलग नहीं हुआ। किंतु जैसे ही उन्होंने काशी की सीमा में प्रवेश किया, ब्रह्महत्या ने उनका पीछा छोड़ दिया और वह कपाल भी अलग हो गया। जहां यह घटना घटी, वह स्थान कपालमोचन-तीर्थ कहलाया। 
महादेव को काशी इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने इस पावन पुरी को विष्णुजी से अपने नित्य आवास के लिए मांग लिया। तब से काशी उनका निवास-स्थान बन गया।

एक अन्य कथा के अनुसार महाराज सुदेव के पुत्र राजा दिवोदास ने गंगा-तट पर वाराणसी नगर बसाया था। एक बार भगवान शंकर ने देखा कि पार्वती जी को अपने मायके (हिमालय-क्षेत्र) में रहने में संकोच होता है, तो उन्होंने किसी दूसरे सिद्ध क्षेत्र में रहने का विचार बनाया। उन्हें काशी अतिप्रिय लगी। वे यहां आ गए। भगवान शिव के सान्निध्य में रहने की इच्छा से देवता भी काशी में आ कर रहने लगे। राजा दिवोदास अपनी राजधानी काशी का आधिपत्य खो जाने से बड़े दु:खी हुए। उन्होंने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी से वरदान मांगा- देवता देवलोक में रहें, भूलोक मनुष्यों के लिए रहे। सृष्टिकर्ता ने "एवमस्तु" कह दिया। इसके फलस्वरूप भगवान शंकर और देवगणों को काशी छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। शिवजी मन्दराचल पर्वत पर चले तो गए परंतु काशी से उनका मोह कम नहीं हुआ। महादेव को उनकी प्रिय काशी में पुन: बसाने के उद्देश्य से चौंसठ योगिनियों, सूर्यदेव, ब्रह्माजी और नारायण ने बड़ा प्रयास किया। गणेशजी के सहयोग से अन्ततोगत्वा यह अभियान सफल हुआ। ज्ञानोपदेश पाकर राजा दिवोदास विरक्त हो गए। उन्होंने स्वयं एक शिवलिंग की स्थापना करके उस की अर्चना की और बाद में वे दिव्य विमान पर बैठकर शिवलोक चले गए। महादेव काशी वापस आ गए।

ऐसी मान्यता है कि काशी में कहीं पर भी मृत्यु के समय भगवान विश्वेश्वर (विश्वनाथजी) प्राणियों के दाहिने कान में तारक मन्त्र का उपदेश देते हैं। तारक मन्त्र सुन कर जीव भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है। यह मान्यता है कि केवल काशी ही सीधे मुक्ति देती है, जबकि अन्य तीर्थस्थान काशी की प्राप्ति कराके मोक्ष प्रदान करते हैं।
काशी की महिमा विभिन्न धर्म ग्रन्थों में गायी गयी है। काशी शब्द का अर्थ है, प्रकाश देने वाली नगरी। जिस स्थान से ज्ञान का प्रकाश चारों ओर फैलता है, उसे काशी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि काशी-क्षेत्र में देहान्त होने पर जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है । काशी-क्षेत्र की सीमा निर्धारित करने के लिए प्राचीन काल में पंचक्रोशी मार्ग का निर्माण किया गया। जिस वर्ष अधिमास लगता है, उस वर्ष इस महीने में पंचक्रोशी यात्रा की जाती है। पंचक्रोशी यात्रा करके भक्तगण भगवान शिव और उनकी नगरी काशी के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं।
 ऐसी मान्यता है कि पंचक्रोशी यात्रा से लौकिक और पारलौकिक अभीष्टि की सिद्धि होती है। अधिमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। लोक-भाषा में इसे मलमास कहा जाता है।
भगवान शिव की इस प्रिय नगरी के दर्शनों के लिए हम आतुर थे। बस सुबह का इंतज़ार बाकी था।
11 दिसंबर की सुबह हमारा यात्री दल बस से सर्वप्रथम गंगा घाट की तरफ रवाना हुआ। यहां पर मां गंगा अपने भव्य एवं दिव्य स्वरुप में विराजमान है। हम सभी ने मां गंगा में स्नान किया और स्टीमर के द्वारा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का इस्तेमाल करते हुए हम मणिकर्णिका घाट से होते हुए मंदिर परिसर में पहुंच गए। काशी विश्वनाथ की भव्यता और दिव्यता का वर्णन शब्दों में कर पाना मुश्किल है। देवाधिदेव महादेव को यहां साक्षात महसूस किया जा सकता है।
 गेट नंबर 3 से हमने मंदिर में प्रवेश किया। अभी तक हम जितने स्थानों पर गए उनमें सबसे बढ़िया व्यवस्था एवं सुरक्षा के प्रबंध यहां पर देखने को मिले। इस प्रकार अपनी यात्रा के दौरान (माया) हरिद्वार तथा अयोध्या के पश्चात हिंदुओं के तीसरे पवित्र शहर अर्थात तीसरी पुरी तथा देवाधिदेव महादेव के प्रथम ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ के दर्शन पूर्ण किए।
बाबा काशी विश्वनाथ जी के दर्शन के उपरांत हम वापस अपने होटल पहुंच गए और दिन का भोजन करने के पश्चात हमारा दल बिहार की पवित्र भूमि गया की तरफ रवाना हो गया। शाम तक हम गया पहुंच गए।
लायक राम शर्मा
शिमला

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण.....09-12-2023

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण.....
09-12-2023
चित्रकूट की अनुपम और अलौकिक सुंदरता का वर्णन करना शब्दों में संभव नहीं है। चित्रकूट मंदाकिनी नदी के किनारे पर बसा भारत के सबसे प्राचीन तीर्थस्थलों में से एक है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में 38.2 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला शांत और सुन्दर चित्रकूट प्रकृति और ईश्वर की अनुपम देन है। चारों ओर से विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं और वनों से घिरे चित्रकूट को अनेक आश्चर्यो की पहाड़ी कहा जाता है। मंदाकिनी नदी के किनार बने अनेक घाट विशेष कर रामघाट और कामतानाथ मंदिर में पूरे साल श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। अमावस्या के दिन का यहाँ विशेष महत्व माना जाता है। माना जाता है कि भगवान राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ अपने वनवास के चौदह वर्षो में ग्यारह वर्ष चित्रकूट में ही बिताए थे। इसी स्थान पर ऋषि अत्रि और सती अनसुइया ने ध्यान लगाया था। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने चित्रकूट में ही सती अनसुइया के घर जन्म लिया था। यहाँ इसी जिले से सटा हुआ एक स्थान राजापुर है जहाँ कुछ लोग तुलसीदासजी का जन्म स्थान बताते हैं। यहीं रामचरितमानस की मूल प्रति भी रखी हुई है।
 यहां सर्वप्रथम हम सती अनसूया के आश्रम पहुंचे। स्फटिक शिला से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर घने वनों से घिरा यह एकान्त आश्रम स्थित है। इस आश्रम में अत्रि मुनी, अनुसुइया, दत्तात्रेय और दुर्वासा मुनि की प्रतिमा स्थापित हैं। इस आश्रम के ठीक सामने गर्म पानी का एक बहुत विशालकाय कुंड है जिसमें हम सभी ने स्नान किया और मंदिर पहुंचकर माता अनुसूया के दर्शन किए।
 इसके पश्चात हमारा यात्री दल गुप्त गोदावरी के दर्शन के लिए रवाना हो गया। नगर से 18 किलोमीटर की दूरी पर गुप्त गोदावरी स्थित हैं। यहाँ दो गुफाएँ हैं। एक गुफा चौड़ी और ऊँची है। प्रवेश द्वार संकरा होने के कारण इसमें आसानी से नहीं घुसा जा सकता। गुफा के अंत में एक छोटा तालाब है जिसे गोदावरी नदी कहा जाता है। दूसरी गुफा लंबी और संकरी है, जिससे हमेशा पानी बहता रहता है। कहा जाता है कि इस गुफा के अंत में राम और लक्ष्मण ने दरबार लगाया था।
      गुप्त गोदावरी के दर्शन के पश्चात हम मंदाकिनी नदी के दर्शन के लिए चल पड़े। इस नदी पर अनेक घाट बने हुए हैं। यहां का सबसे प्रसिद्ध घाट रामघाट है।
राम घाट वह घाट है जहाँ प्रभु राम नित्य स्नान किया करते थे l इसी घाट पर राम भरत मिलाप मंदिर है। इसी घाट पर गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रतिमा भी है l मंदाकिनी नदी के तट पर बने रामघाट में अनेक धार्मिक क्रियाकलाप चलते रहते हैं। घाट में गेरूआ वस्त्र धारण किए साधु-सन्तों को भजन और कीर्तन करते देख बहुत अच्छा महसूस होता है। शाम को होने वाली यहां की आरती मन को काफी सुकून पहुँचाती है।
हमने भरत मंदिर पहुंचकर महात्मा भरत के दर्शन किए।
चित्रकूट भगवान राम की कर्म भूमि रही है और अपने वनवास के लगभग 11 वर्ष उन्होंने इसी स्थान पर बिताये थे। सचमुच सदियों पुरानी भगवान राम की यादों को आप आज भी उस मिट्टी में महसूस करते हैं। हमारा आज का रात्रि विश्राम भी चित्रकूट में ही होना था। इसलिए इस स्थान को निहारने का, इसको समझने का हमें और अधिक समय मिल गया।
आज का दिन सचमुच में काफी व्यस्त रहा क्योंकि चित्रकूट काफी व्यापक और फैला हुआ क्षेत्र है और यहां पर उपरोक्त वर्णित स्थानों के अतिरिक्त भी बहुत सारे धार्मिक महत्व के स्थल हैं। दिनभर हम अलग-अलग धार्मिक महत्व के स्थानों को घूमते रहे। शाम के भोजन से पहले जैसे ही सभी यात्री संध्याकालीन आरती एवं भजन के लिए एकत्रित हुए तो एकता तीर्थ यात्रा संगम के संचालक आदरणीय सुरजीत राम शर्मा जी ने अपने वक्तव्य में एक दुखद जानकारी साझा की। आज के दिन हमारे दल के एक साथी हम सभी को छोड़कर विष्णु लोक चले गए थे। यह समाचार सुनते ही हम सभी में शोक की लहर दौड़ गई। कुछ समझ नहीं आ रहा था। हालांकि भगवान राम की उस कर्मस्थली पर किसी का विष्णु धाम चले जाना अपने आप में सौभाग्य है, लेकिन हम सभी के लिए व्यथित कर देने वाला था।
 

लायक राम शर्मा
 शिमला

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 23 जनवरी 2024

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 23 जनवरी 2024 अगली प्रातः हमारा यात्री दल सुबह-सबेरे ही कृष्ण जन्मभूमि मथुरा में दर्शन के लिए पहुँच गया। आज का...