भारत दर्शन यात्रा : एक संस्मरण.....
04-12-2023
भारत दर्शन यात्रा के दूसरे दिन हमें हिंदुओं के अत्यंत पावन और महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थान कुरुक्षेत्र एवं पिहोवा का भ्रमण करना था। अतः सबसे पहले सुबह बस द्वारा हम पिहोवा की पावन धरा पर पहुंचे।
पिहोवा (जिसका प्राचीन नाम पृथुदक तीर्थ है), कुरुक्षेत्र की 48 कोस परिक्रमा के अंतर्गत श्री कृष्ण और महाभारत से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण हिंदू तीर्थ स्थल है।
पिहोवा को उच्च महत्त्व का धार्मिक स्थान माना जाता है और इसके बारे में यह मान्यता है कि यह कई शताब्दियों पहले अर्थात् महाभारत युद्ध से पहले का शहर था। यह उन दिनों सूख चुकी सरस्वती नदी के तट पर विकसित हुआ था। इसके बावजूद यह अभी भी एक बहुत पवित्र स्थान था, जहाँ लोग अपने पूर्वजों को "पिंडदान" देते थे। इसे अभी भी "पितृधापक तीर्थ" कहा जाता है।
किंवदंती है कि यह प्रयाग या गया से बहुत पहले किए जाने वाले पितृ तर्पणों के लिए सबसे पवित्र स्थान था। ऐसा माना जाता है कि युद्ध शुरू होने से पहले भगवान श्रीकृष्ण पांडवों को इस स्थान पर ले गए थे और उन्हें सरस्वती माता और उनके पूर्वजों का आशीर्वाद दिलाया था। महाभारत के दौरान कुरुक्षेत्र के युद्ध में अपने प्राणों की आहूति देने वाले सैनिकों का पिहोवा में अंतिम संस्कार किया गया था।
इस शहर में सरस्वती सरोवर स्थित है, जहाँ लोग पूजा और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। सरस्वती मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगे स्तंभ कई सदियों पुराने हैं।
पिहोवा सभी हिंदुओं के साथ-साथ सिखों के लिए भी एक पवित्र तीर्थ स्थल माना जाता है। सरस्वती नदी के तट पर पृथुदक/पिहोवा तीर्थ में हिंदू वंशावली रजिस्टर रखे गए हैं जिनसे प्रत्येक हिंदू अपने वंश से संबंधित जानकारी प्राप्त कर सकता है। अतः पिहोवा का पिंडदान एवं तर्पण हेतु अत्यंत महत्त्व माना जाता है।
हमारी यात्रा में उपस्थित लगभग सभी श्रद्धालुओं ने पिहोवा में पवित्र कुंड में स्नान करने के उपरांत पिंडदान एवं तर्पण की प्रक्रिया पूर्ण की। तत्पश्चात हम वापस कुरुक्षेत्र पहुंच गए।
कुरुक्षेत्र का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता के पहले श्लोक में 'धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र' के रूप में किया गया है। कुरुक्षेत्र एक महान ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व का स्थान है जिसे वेदों और वैदिक संस्कृति के साथ जुड़े होने के कारण सभी देशों में श्रद्धा के साथ देखा जाता है। यह वह भूमि है जिस पर महाभारत की लड़ाई लड़ी गई थी और भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ज्योतिसर में कर्म के दर्शन का ज्ञान दिया था। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, कुरुक्षेत्र 48 कोस में फैला एक विशाल क्षेत्र है, जिसमें कई तीर्थ स्थान, मंदिर और पवित्र सरोवर शामिल हैं, जिनके साथ पांडवों और कौरवों तथा महाभारत युद्ध से जुड़ी कई घटनाओं / अनुष्ठानों का संबंध रहा है। कुरुक्षेत्र का आर्य सभ्यता और पवित्र सरस्वती के उद्गम के साथ, इसके विकास से गहरा संबंध है। यह वह भूमि है जहाँ मनुस्मृति ऋषि मनु द्वारा लिखी गई थी और ऋग्वेद का संकलन, सामवेद ज्ञानी ऋषियों द्वारा किया गया था। कुरुक्षेत्र का नाम राजा कुरु के नाम पर रखा गया है जिसने इस भूमि और इसके लोगों की समृद्धि के लिए महान बलिदान दिए।
कुरुक्षेत्र भारत के इतिहास जितना पुराना है। डॉ० आर.सी. मजूमदार के अनुसार, “यह भारत में आर्यों के आव्रजन से पहले भी एक धार्मिक केंद्र था।”
कुरुक्षेत्र पहुंचने पर हमने यहां के अत्यंत महत्त्वपूर्ण ब्रह्म सरोवर एवं ज्योतिसार के दर्शन किये। इसके पश्चात हमारा यात्री - दल दोपहर के भोजन के पश्चात हरिद्वार की तरफ बढ़ गया।
शाम को हरिद्वार में हम सभी ने गंगा स्नान किया तथा गंगा आरती में भाग लिया। इसके उपरांत हम रात्रि विश्राम के लिए अपने गंतव्य स्थान की तरफ रवाना हो गए।
हरिद्वार, उत्तराखण्ड के हरिद्वार जिले का एक पवित्र नगर तथा सनातन (हिन्दुओं) का प्रमुख तीर्थ है। यह हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों अर्थात् सप्तपुरियों में से एक है। 3139 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने स्रोत गोमुख (गंगोत्री हिमनद) से 256 किमी की यात्रा करके गंगा नदी हरिद्वार में मैदानी क्षेत्र में प्रथम प्रवेश करती है, इसलिए हरिद्वार को 'गंगाद्वार' के नाम से भी जाना जाता है। हरिद्वार का अर्थ "हरि (ईश्वर) का द्वार" होता है।
पश्चात्कालीन हिंदू धार्मिक कथाओं के अनुसार, हरिद्वार वह स्थान है जहाँ अमृत की कुछ बूँदें भूल से घड़े से गिर गयीं, जब धन्वन्तरी उस घड़े को समुद्र मंथन के बाद ले जा रहे थे। ध्यातव्य है कि कुम्भ या महाकुम्भ से सम्बद्ध कथा का उल्लेख किसी पुराण में नहीं है। प्रक्षिप्त रूप में ही इसका उल्लेख होता रहा है। अतः कथा का रूप भी भिन्न-भिन्न रहा है।
एक मान्यता के अनुसार वह स्थान जहाँ पर अमृत की बूंदें गिरी थीं उसे हर की पौड़ी पर ब्रह्म कुण्ड माना जाता है।
'हर की पौड़ी' हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट माना जाता है जहाँ गंगा का मंदिर भी है। हर की पौड़ी पर लाखों यात्री स्नान करते हैं और यहाँ का पवित्र गंगा जल देश के प्राय: सभी स्थानो में यात्रियों द्वारा ले जाया जाता है। प्रति वर्ष चैत्र में मेष संक्रांति के समय मेला लगता है जिसमें लाखों यात्री इकट्ठे होते हैं। प्रति बारह वर्षों पर जब सूर्य और चंद्र मेष राशि में और बृहस्पति कुंभ राशि में स्थित होते हैं, तब यहां कुंभ का मेला लगता है। उसके छठे वर्ष अर्धकुंभ का मेला भी लगता है। इनमें कई लाख यात्री इकट्ठे होते और गंगा में स्नान करते हैं। यहाँ अनेक मंदिर और देवस्थल हैं। माया देवी का मंदिर पत्थर का बना हुआ है। संभवत: यह 10वीं शताब्दी का बना होगा। इस मंदिर में माया देवी की मूर्ति स्थापित है। इस मूर्ति के तीन मस्तक और चार हाथ हैं।
लोगों का विश्वास है कि यहाँ मरनेवाला प्राणी परमपद पाता है और स्नान से जन्म-जन्मांतर का पाप कट जाता है और परलोक में हरिपद की प्राप्ति होती है।
हरिद्वार तीर्थ के रूप में बहुत प्राचीन तीर्थ है परंतु नगर के रूप में यह बहुत प्राचीन नहीं है। हरिद्वार नाम भी उत्तर पौराणिक काल में ही प्रचलित हुआ है। महाभारत में इसे केवल 'गंगाद्वार' ही कहा गया है। पुराणों में इसे गंगाद्वार, मायाक्षेत्र, मायातीर्थ, सप्तस्रोत तथा कुब्जाम्रक के नाम से वर्णित किया गया है। प्राचीन काल में कपिलमुनि के नाम पर इसे 'कपिला' भी कहा जाता था। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ कपिल मुनि का तपोवन था।
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगीरथ ने, जो सूर्यवंशी राजा सगर के प्रपौत्र (श्रीराम के एक पूर्वज) थे, गंगाजी को सतयुग में वर्षों की तपस्या के पश्चात् अपने 60000 पूर्वजों के उद्धार और कपिल ऋषि के शाप से मुक्त करने के लिए पृथ्वी पर लाया।
'हरिद्वार' नाम का संभवतः प्रथम प्रयोग पद्मपुराण में हुआ है। पद्मपुराण के उत्तर खंड में गंगा-अवतरण के एक प्रसंग में हरिद्वार की अत्यधिक प्रशंसा करते हुए उसके सर्वश्रेष्ठ तीर्थ होने की बात कही गयी है।
ह्युनसांग भी सातवीं शताब्दी में हरिद्वार आया था और इसका वर्णन उसने 'मोन्यु-लॉ' नाम से किया है। मोन्यू-लॉ को आधुनिक मायापुरी गाँव समझा जाता है जो हरिद्वार के निकट में ही है। प्राचीन किलों और मंदिरों के अनेक खंडहर यहाँ आज भी विद्यमान हैं।
प्रकृतिप्रेमियों के लिए हरिद्वार स्वर्ग जैसा सुन्दर है। हरिद्वार भारतीय संस्कृति और सभ्यता का एक बहुरूपदर्शन प्रस्तुत करता है। यह चार धाम यात्रा के लिए प्रवेश द्वार भी है (उत्तराखंड के चार धाम हैं: बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री)। इसलिए भगवान शिव के अनुयायी और भगवान विष्णु के अनुयायी इसे क्रमशः हरद्वार और हरिद्वार के नाम से पुकारते हैं -- हर अर्थात् शिव (केदारनाथ) और हरि अर्थात् विष्णु (बद्रीनाथ) तक जाने का द्वार।
हिंदुओं की ऐसी मान्यता है कि कोई भी धार्मिक यात्रा जगत के स्वामी भगवान विष्णु की नगरी हरिद्वार से शुरू होती है तथा यहीं पर आकर संपन्न होती है; इसी आशय के साथ हमारी यात्रा का औपचारिक श्री गणेश भी हरिद्वार से ही हुआ। आज का दिन बहुत व्यस्त रहा, थका देने वाला रहा इसलिए सभी यात्री भोजन के पश्चात रात्रि विश्राम के लिए चले गए।
लायक राम शर्मा
शिमला
❤ सत्य सनातन धर्म की जय 🕉❤
ReplyDeleteEngrossing Article!
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