भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 10-11 जनवरी 2024

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण

10-11 जनवरी 2024


10 जनवरी को प्रातः हमारा यात्री दल नासिक से मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के लिए रवाना हुआ। आज का लगभग सारा दिन सफ़र में ही बीत गया। शाम ढलते हम ओंकारेश्वर पहुँच गए। आज का रात्रि ठहराव ओंकारेश्वर में था। अगली सुबह माँ नर्मदा में स्नान के पश्चात ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए। यह ओम् आकार का एक टापू है और माँ नर्मदा के एक छोर पर ओंकारेश्वर तथा दूसरे छोर पर मम्लेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित हैं।


ओंकारेश्वर एक हिन्दू मंदिर है जो मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित है। यह नर्मदा नदी के बीच मंन्धाता या शिवपुरी नामक द्वीप पर स्थित है। यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। सदियों पहले भील जनजाति ने इस जगह पर लोगों की बस्तियाँ बसाई और अब यह स्थान अपनी भव्यता और इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। यह मोरटक्का गांव से लगभग 12 किलोमीटर दूर बसा है।


ॐकारेश्वर का निर्माण नर्मदा नदी से स्वतः ही हुआ है। यह नदी भारत की पवित्रतम नदियों में से एक है और अब इस पर विश्व की सबसे बड़ी बांध परियोजना का निर्माण हो रहा है।


जिस ओंकार शब्द का उच्चारण सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता विधाता के मुख से हुआ, वेद का पाठ इसके उच्चारण के बिना नहीं होता है। इस ओंकार का भौतिक रूप ओंकार क्षेत्र है। इसमें 68 तीर्थ हैं। यहाँ 33 कोटि देवता परिवार सहित निवास करते हैं और 2 ज्योति स्वरूप लिंगों सहित 108 प्रभावशाली शिवलिंग हैं। मध्यप्रदेश में देश के प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंगों में से 2 ज्योतिर्लिंग विराजमान हैं - एक उज्जैन में महाकाल के रूप में और दूसरा ओंकारेश्वर में ओंकारेश्वर-ममलेश्वर के रूप में।


लंबे समय तक ओंकारेश्वर भील राजाओं के शासन का क्षेत्र रहा। देवी अहिल्याबाई होलकर ने यहाँ नित्य मृत्तिका से 18 सहस्त्र शिवलिंग तैयार कर उनका पूजन किया और फिर उन्हें नर्मदा में विसर्जित कर दिया। ओंकारेश्वर नगरी का मूल नाम ‘मान्धाता’ था।


नर्मदा क्षेत्र में ओंकारेश्वर सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है। शास्त्रों के अनुसार, कोई भी तीर्थयात्री देश के सारे तीर्थ कर ले, लेकिन जब तक वह ओंकारेश्वर आकर किए गए तीर्थों का जल लाकर यहाँ नहीं चढ़ाता, तब तक उसके सारे तीर्थ अधूरे माने जाते हैं। ओंकारेश्वर तीर्थ के साथ नर्मदाजी का भी विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार, जमुनाजी में 15 दिन का स्नान और गंगाजी में 7 दिन का स्नान जो पुण्यफल प्रदान करता है, उतना पुण्य नर्मदाजी के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।


ओंकारेश्वर तीर्थ क्षेत्र में चौबीस अवतार, माता घाट (सेलानी), सीता वाटिका, धावड़ी कुंड, मार्कण्डेय शिला, मार्कण्डेय संन्यास आश्रम, अन्नपूर्णाश्रम, विज्ञान शाला, बड़े हनुमान, खेड़ापति हनुमान, ओंकार मठ, माता आनंदमयी आश्रम, ऋणमुक्तेश्वर महादेव, गायत्री माता मंदिर, सिद्धनाथ गौरी सोमनाथ, आड़े हनुमान, माता वैष्णोदेवी मंदिर, चाँद-सूरज दरवाजे, वीरखला, विष्णु मंदिर, ब्रह्मेश्वर मंदिर, सेगाँव के गजानन महाराज का मंदिर, काशी विश्वनाथ, नरसिंह टेकरी, कुबेरेश्वर महादेव, चन्द्रमोलेश्वर महादेव के मंदिर, रामकृष्ण तपोवन आश्रम भी दर्शनीय हैं।


इस मंदिर में शिव भक्त कुबेर ने तपस्या की थी और शिवलिंग की स्थापना की थी, जिसे शिव ने देवताओं के धनपति के रूप में स्वीकार किया था। कुबेर के स्नान के लिए शिवजी ने अपनी जटा के बाल से कावेरी नदी उत्पन्न की थी। यह नदी कुबेर मंदिर के बाजू से बहकर नर्मदाजी में मिलती है, जिसे छोटी परिक्रमा करने वाले भक्तों ने प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में देखा है। यही कावेरी ओंकार पर्वत का चक्कर लगाते हुए संगम पर वापस नर्मदाजी से मिलती है, इसे नर्मदा-कावेरी संगम कहते हैं।


नर्मदा किनारे जो बस्ती है, उसे विष्णुपुरी कहते हैं। यहाँ नर्मदाजी पर पक्का घाट है। सेतु (अथवा नौका) द्वारा नर्मदाजी को पार करके यात्री मान्धाता द्वीप में पहुँचता है। उस ओर भी पक्का घाट है। यहाँ घाट के पास नर्मदाजी में कोटितीर्थ या चक्रतीर्थ माना जाता है। यहीं स्नान करके यात्री सीढ़ियों से ऊपर चढ़कर ओंकारेश्वर मंदिर में दर्शन करने जाते हैं। मंदिर तट पर ही कुछ ऊँचाई पर स्थित है।


मंदिर के अहाते में पंचमुख गणेशजी की मूर्ति है। प्रथम तल पर ओंकारेश्वर लिंग विराजमान हैं। श्री ओंकारेश्वर का लिंग अनगढ़ है। यह लिंग मंदिर के ठीक शिखर के नीचे न होकर एक ओर हटकर स्थित है। लिंग के चारों ओर जल भरा रहता है। मंदिर का द्वार छोटा है, ऐसा लगता है जैसे गुफा में प्रवेश कर रहे हों। पास में ही पार्वतीजी की मूर्ति है। ओंकारेश्वर मंदिर में सीढ़ियाँ चढ़कर दूसरी मंजिल पर महाकालेश्वर लिंग के दर्शन होते हैं। यह लिंग शिखर के नीचे है। तीसरी मंजिल पर सिद्धनाथ लिंग है, जो शिखर के नीचे है। चौथी मंजिल पर गुप्तेश्वर लिंग है। पाँचवीं मंजिल पर ध्वजेश्वर लिंग है।


तीसरी, चौथी और पाँचवीं मंजिलों पर स्थित लिंगों के ऊपर अष्टभुजाकार आकृतियाँ बनी हैं, जो एक-दूसरे में गुंथी हुई हैं। द्वितीय तल पर स्थित महाकालेश्वर लिंग के ऊपर छत समतल न होकर शंक्वाकार है और वहाँ अष्टभुजाकार आकृतियाँ नहीं हैं। प्रथम और द्वितीय तल के शिवलिंगों के प्रांगणों में नंदी की मूर्तियाँ स्थापित हैं, जबकि तृतीय तल के प्रांगण में नंदी की मूर्ति नहीं है। यह प्रांगण केवल एक खुली छत के रूप में है। चतुर्थ और पंचम तल के प्रांगण नहीं हैं; वे ओंकारेश्वर मंदिर के शिखर में समाहित हैं।


श्री ओंकारेश्वरजी की परिक्रमा में रामेश्वर मंदिर तथा गौरीसोमनाथ के दर्शन हो जाते हैं। ओंकारेश्वर मंदिर के पास अविमुतश्वर, ज्वालेश्वर, केदारेश्वर आदि कई मंदिर हैं।


मान्धाता टापू में दो परिक्रमाएँ होती हैं - एक छोटी और एक बड़ी। ओंकारेश्वर की यात्रा तीन दिन की मानी जाती है। इस यात्रा में यहाँ के सभी तीर्थ आ जाते हैं।


ममलेश्वर भी एक ज्योतिर्लिंग है। ममलेश्वर मंदिर अहिल्याबाई होलकर द्वारा बनवाया गया था। गायकवाड़ राज्य द्वारा नियत किए गए बहुत से ब्राह्मण यहाँ पार्थिव पूजन करते रहते हैं। यात्री चाहें तो पहले ममलेश्वर का दर्शन करके फिर नर्मदा पार होकर ओंकारेश्वर जा सकते हैं, किंतु नियम यह है कि पहले ओंकारेश्वर का दर्शन करें, फिर लौटते समय ममलेश्वर का दर्शन करें।


ममलेश्वर-प्रदक्षिणा में वृद्धकालेश्वर, बाणेश्वर, मुक्तेश्वर, कर्दमेश्वर और तिलभाण्डेश्वर के मंदिर मिलते हैं। ममलेश्वर का दर्शन करने के बाद (निरंजनी अखाड़े में) स्वामीकार्तिक (अघोरी नाले में) अघोरेश्वर गणपति, मारुति का दर्शन करते हुए नृसिंहटेकरी तथा गुप्तेश्वर होकर (ब्रह्मपुरी में) ब्रह्मेश्वर, लक्ष्मीनारायण, काशीविश्वनाथ, शरणेश्वर, कपिलेश्वर और गंगेश्वर के दर्शन करके विष्णुपुरी लौटकर भगवान विष्णु के दर्शन करें।


भगवान के महान भक्त अम्बरीष और मुचुकुन्द के पिता सूर्यवंशी राजा मान्धाता ने इस स्थान पर कठोर तपस्या की थी। उसी महान पुरुष मान्धाता के नाम पर इस पर्वत का नाम मान्धाता पर्वत पड़ा।


ओंकारेश्वर लिंग प्राकृतिक शिवलिंग है। इसके चारों ओर हमेशा जल भरा रहता है। प्रायः किसी मंदिर में लिंग की स्थापना गर्भ गृह के मध्य में की जाती है, जबकि ओंकारेश्वर लिंग मन्दिर के गुम्बद के नीचे नहीं है। इसकी एक विशेषता यह है कि मन्दिर के ऊपरी शिखर पर भगवान महाकालेश्वर की मूर्ति लगी हुई है।


ओंकारेश्वर के दर्शन अद्वैत मत का प्रतीक हैं, जिसमें ओंकार शब्द ओम (ध्वनि) और अकार (सृष्टि) से मिलकर बना है।


आदि शंकराचार्य की गुफा: ओंकारेश्वर वह स्थान है जहाँ आदि शंकराचार्य ने अपने गुरु गोविंद भगवत्पाद से मुलाकात की थी। यह गुफा आज भी शिव मंदिर के ठीक नीचे पाई जाती है, जहाँ आदि शंकराचार्य की एक प्रतिमा स्थापित की गई है।


ओंकारेश्वर में विभिन्न मंदिरों में दर्शन करने में लगभग सारा दिन बीत गया। दोपहर के बाद हम उज्जैन के लिए रवाना हुए। आज का रात्रि ठहराव उज्जैन में था।


लायक राम शर्मा

शिमला

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