भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण 07-01-2024

भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण

07-01-2024


शनि शिंगणापुर में रात्रि विश्राम के पश्चात अगले दिन तड़के ही हम घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग पहुँच गए। आज का दिन काफ़ी व्यस्त रहा।

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत के छत्रपति संभाजीनगर के वेरुल गाँव में शिव को समर्पित एक हिंदू मंदिर है। यह 12 ज्योतिर्लिंग मंदिरों में से एक है। यह मंदिर एक राष्ट्रीय संरक्षित स्थल है, जो एलोरा गुफाओं से डेढ़ किलोमीटर दूर, औरंगाबाद शहर से 30 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में और मुंबई से 300 किलोमीटर पूर्व-उत्तरपूर्व में स्थित है। घृष्णेश्वर का उल्लेख शिव पुराण, स्कंद पुराण, रामायण और महाभारत में मिलता है। घृष्णेश्वर शब्द का अर्थ है “करुणा का स्वामी”।

बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएँ इस मंदिर के समीप ही स्थित हैं। इस मंदिर का निर्माण देवी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था। शहर से दूर स्थित यह मंदिर सादगी से परिपूर्ण है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है। इसे घुश्मेश्वर, घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहा जाता है। यह महाराष्ट्र प्रदेश में दौलताबाद से बारह मील दूर वेरुलगाँव के पास स्थित है।

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर 44,000 वर्ग फीट क्षेत्र में काले पत्थर से बना है, इसमें बहुत सारी मूर्तियाँ हैं, और इसकी आंतरिक तथा बाहरी दीवारों पर बेहतरीन डिज़ाइन हैं। मंदिर के गर्भगृह में एक ज्योतिर्लिंग मूर्ति स्थापित है और मुख्य द्वार के सामने भगवान शिव के प्रिय भक्त नंदी की एक बड़ी मूर्ति मौजूद है।

मंदिर की संरचना 13वीं और 14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत द्वारा नष्ट कर दी गई थी। मुगल-माराठा संघर्ष के दौरान मंदिर का कई बार पुनर्निर्माण किया गया और उसके बाद पुनः विनाश किया गया। शिवाजी के दादा मालोजी भोसले ने पहली बार 16वीं शताब्दी में इसका जीर्णोद्धार किया और मुगल साम्राज्य के पतन के बाद इंदौर की रानी गौतम बाई होल्कर द्वारा वर्ष 1729 में इसके वर्तमान स्वरूप में पुनर्निर्माण किया गया। यह वर्तमान में हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण और सक्रिय तीर्थ स्थल है और रोजाना भक्तों की लंबी कतारें आकर्षित करती हैं। कोई भी मंदिर परिसर और इसके आंतरिक कक्षों में प्रवेश कर सकता है, लेकिन मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए स्थानीय हिंदू परंपरा है कि पुरुषों को नंगे सीने ही प्रवेश की अनुमति है।


घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के विषय में पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, दक्षिण देश में देवगिरि पर्वत के निकट सुधर्मा नामक एक बहुत तेजस्वी एवं तपस्वी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुदेहा था, और दोनों में एक दूसरे के प्रति बहुत प्रेम था। उन्हें किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं थी, परन्तु उनकी कोई संतान नहीं थी।

ज्योतिषीय गणना से पता चला कि सुदेहा के गर्भ से संतान नहीं हो सकती। सुदेहा संतान प्राप्ति के लिए बहुत उत्सुक थी। उसने सुधर्मा से अपनी छोटी बहन से पुनर्विवाह करने का आग्रह किया।

पहले तो सुधर्मा ऐसा नहीं करना चाहता था, लेकिन अंत में उसे अपनी पत्नी की जिद के आगे झुकना पड़ा। वह उसकी बात टाल नहीं सका। उसने अपनी पत्नी की छोटी बहन घुश्मा से विवाह किया और उसे अपने घर ले आया। घुश्मा बहुत ही विनम्र और सदाचारी महिला थी। वह शिव की परम भक्त थी। प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर सच्चे मन से उसकी पूजा करती थी।

शिव की कृपा से कुछ ही दिनों बाद उसके गर्भ से एक बहुत ही सुंदर और स्वस्थ बालक ने जन्म लिया। बालक के जन्म से सुदेहा और घुश्मा दोनों के आनंद का ठिकाना न रहा। दोनों दिन बड़े आराम से बीत रहे थे। थोड़ी देर बाद सुदेहा के मन में एक बुरे विचार ने जन्म लिया। उसने सोचा, “इस घर में मेरा कुछ भी नहीं है। यहां की हर चीज में घुसपैठ हो चुकी है। अब तक सुदेहा के मन का वह बुरा विचार एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका था। ‘उसने मेरे पति को भी अपने वश में कर लिया। यह बालक भी उसका है।’” यह बुरा विचार धीरे-धीरे उसके मन में बढ़ने लगा। इधर घुश्मा का बालक भी बड़ा हो रहा था। धीरे-धीरे वह जवान हो गया। उसका विवाह भी हो गया।

अंततः एक दिन सुदेहा ने रात्रि में सोते समय घुश्मा के युवा पुत्र को मार डाला। उसने उसका शव ले जाकर उसी तालाब में फेंक दिया, जिसमें घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंगों का विसर्जन किया करती थी। प्रातःकाल सभी को इसकी जानकारी हुई। सारे घर में कोहराम मच गया। सुधर्मा और उसकी पुत्रवधू दोनों सिर पीटकर फूट-फूटकर रोने लगीं। किन्तु घुश्मा सदैव की भाँति शिवपूजा में लीन रही, मानो कुछ हुआ ही न हो। पूजा समाप्त करके वह पार्थिव शिवलिंगों को तालाब में छोड़ने के लिए चल पड़ी। जब वह तालाब से लौटने लगी तो उसका प्रिय पुत्र तालाब के अन्दर से निकलता हुआ दिखाई दिया। वह सदैव की भाँति आया और घुश्मा के चरणों पर गिर पड़ा।

मानो उसी समय कहीं निकट ही शिवजी भी वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने घुश्मा से वर माँगने को कहा। वे सुदेहा के इस जघन्य कृत्य से अत्यन्त क्रोधित थे। वे अपने त्रिशूल से उसका गला काटने के लिए आतुर थे। घुश्मा ने हाथ जोड़कर शिवजी से कहा- ‘प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरी उस अभागिनी को क्षमा कर दीजिए। उसने घोर पाप किया है, किन्तु आपकी कृपा से मुझे मेरा पुत्र वापस मिल गया। अब उसे क्षमा कर दीजिए मेरे स्वामी! मेरी एक और प्रार्थना है, लोक-कल्याण के लिए आप इसी स्थान पर चिरकाल तक निवास करें।’

शिव ने ये दोनों बातें स्वीकार कर लीं। ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर वे वहीं रहने लगे। सती शिवभक्त घुश्मा की आराधना के कारण वे यहां घुश्मेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हुए।


घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के पश्चात हम एलोरा की विश्वविख्यात गुफ़ाओं को देखने के लिए निकल पड़े। यह सचमुच में हमारी प्राचीन धरोहर का एक अनुपम उदाहरण है। इन गुफाओं को देखकर हम आश्चर्यचकित रह गए।

एलोरा या एल्लोरा (मूल नाम वेरुल) एक पुरातात्विक स्थल है, जो भारत में औरंगाबाद, महाराष्ट्र से 30 किलोमीटर (18.6 मील) की दूरी पर स्थित है। इन्हें राष्ट्रकूट वंश के शासकों द्वारा बनवाया गया था। अपनी स्मारक गुफाओं के लिए प्रसिद्ध, एलोरा यूनेस्को द्वारा घोषित एक विश्व धरोहर स्थल है।

एलोरा भारतीय पाषाण शिल्प स्थापत्य कला का सार है। यहाँ 34 “गुफ़ाएँ” हैं, जो असल में एक ऊर्ध्वाधर खड़ी चरणाद्रि पर्वत का एक फ़लक है। इसमें हिन्दू, बौद्ध और जैन गुफा मन्दिर बने हैं। ये पाँचवीं और दसवीं शताब्दी में बने थे। यहाँ 12 बौद्ध गुफाएँ (1-12), 17 हिन्दू गुफाएँ (13-29) और 5 जैन गुफाएँ (30-34) हैं। ये सभी आस-पास बनीं हैं और अपने निर्माण काल की धार्मिक सौहार्द को दर्शाती हैं।

एलोरा के 34 मठ और मंदिर औरंगाबाद के निकट 2 किलोमीटर के क्षेत्र में फैले हैं। इन्हें ऊँची बेसाल्ट की खड़ी चट्टानों की दीवारों को काटकर बनाया गया है। अपनी समग्रता में 254 फीट लंबा और 154 फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक खंड को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानतः 40,000 टन भार के पत्थरों को ताला से बचाया गया है। इसके निर्माण के लिए पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर से काटकर 90 फुट ऊँचा मंदिर उकेरा गया। मंदिर के बाहर चारों ओर मूर्ति-आलंकरणों से भरा हुआ है। दुर्गम पहाड़ियों वाला एलोरा 600 से 1000 ईसवी के काल का है, यह प्राचीन भारतीय सभ्यता का जीवंत प्रदर्शन करता है। बौद्ध, हिन्दू और जैन धर्म को समर्पित यह पवित्र स्थल न केवल अद्वितीय कलात्मक सृजन और एक तकनीकी उत्कृष्टता है, बल्कि यह प्राचीन भारत के धैर्यवान चरित्र की व्याख्या भी करता है। यह यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल है।

एलोरा की गुफाओं में हमारा यात्री दल काफ़ी समय तक रहा है। यहाँ के अद्भुत नज़ारे को अपने कैमरे में क़ैद करके हम वापस घृष्णेश्वर पहुँच गए। भोजन के बाद हम विश्व प्रसिद्ध शिरडी मंदिर के लिए रवाना हो गए। लगभग तीन घंटे के सफ़र के बाद हम शिरडी पहुँच गए। यहाँ कुछ समय होटल में विश्राम करने के पश्चात हम साईं बाबा के दर्शनों के लिए चल पड़े।

शिरडी भारत के महाराष्ट्र राज्य के अहमदनगर ज़िले की राहाता तालुका में स्थित एक नगर है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग 160 पर अहमदनगर से लगभग 83 किमी और कोपरगाँव से लगभग 15 किमी दूर है। यह स्थान साईं बाबा के लिए प्रसिद्ध है और यहाँ उनका एक विशाल साईं बाबा समाधी मंदिर है। इसलिए इसे साईंनगर शिरडी भी कहते हैं। साईं मंदिर विश्व के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है।

शिरडी एक लोकप्रिय धार्मिक पर्यटन स्थल है, जहाँ हर दिन भारी संख्या में पर्यटक आते हैं। शिरडी महान संत साईं बाबा का निवास स्थान है। शिरडी का मुख्य आकर्षण शिरडी शहर के मध्य में स्थित साईं बाबा समाधि मंदिर है। साईं बाबा के शरीर को यहीं पर अनंत विश्राम के लिए रखा गया है। साईं बाबा समाधि मंदिर का निर्माण 1917-1918 में नागपुर के एक करोड़पति और साईं बाबा के एक परम भक्त श्रीमंत गोपालराव बूटी ने करवाया था। इसे मूल रूप से भगवान कृष्ण की मूर्ति रखने के लिए बनाया गया था, लेकिन बाद में यह वह स्थान बन गया जहाँ साईं बाबा के अंतिम अवशेष रखे गए थे। यह समाधि मंदिर दुनिया भर के बाबा के भक्तों के लिए बहुत श्रद्धा रखता है।

साईं बाबा समाधि मंदिर बहुत ही खूबसूरती से बनाया गया है, जिसमें बहुत ही बारीकी और बेहतरीन डिज़ाइन है और यह शिरडी का मुख्य आकर्षण है। समाधि सफेद संगमरमर के पत्थरों से बनाई गई है। समाधि के चारों ओर सजावटी रेलिंग से सुसज्जित की गई है। साईं बाबा की अद्भुत मूर्ति, जिसमें उन्हें सिंहासन पर बैठे हुए दिखाया गया है, 1954 में बालाजी वसंत द्वारा इतालवी संगमरमर से बनाई गई थी। इस मूर्ति को ऊपर एक खुली चांदी की छतरी से सजाया गया है। मंदिर के सामने एक विशाल सभा हॉल है जिसमें 600 भक्त बैठ सकते हैं और हॉल के एक हिस्से में साईं बाबा की विभिन्न वस्तुएँ प्रदर्शित हैं। मंदिर की पहली मंजिल पर साईं बाबा के जीवन को दर्शाती तस्वीरों और कलाकृतियों का संग्रह है।

साईं बाबा का मंदिर सुबह 5 बजे से रात 11 बजे तक खुला रहता है और भक्तगण बड़ी संख्या में कतारों में खड़े होकर साईं बाबा का आशीर्वाद लेने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते हैं। गुरु पूर्णिमा, दशहरा और राम नवमी जैसे अवसरों पर मंदिर रात भर खुला रहता है। हर गुरुवार और त्योहारों के दौरान, साईं बाबा की तस्वीर को एक पालकी में रंग-बिरंगे जुलूस के रूप में मंदिर से बाहर निकाला जाता है। 

साईं बाबा के भक्तों के लिए यह एक महत्वपूर्ण स्थान है। साईं बाबा समाधि मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही बाबा के अनुयायियों को शांति और सुकून का एहसास होता है। यहाँ आध्यात्मिक रूप में साईं बाबा की उपस्थिति और ‘भगवान के बच्चे’ के करीब महसूस किया जा सकता है।

हमारा आज का रात्रि ठहराव शिरडी में ही था।


लायक राम शर्मा

शिमला

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