भारत दर्शन यात्रा: एक संस्मरण....
17-19/12/2023
आज भोर की पहली किरण के साथ ही काठमांडू की सुंदर वादियों से हमारी वापसी यात्रा शुरू हुई।सारा दिन सफर में बीत गया। रात्रि विश्राम के लिए रास्ते में रुके और दूसरे दिन सुबह फिर से यात्राशुरू हुई। नेपाल और भारत की सीमा के साथ-साथ हिमालय पर्वत की तलहटी में बसे बिहार औरझारखंड में यात्रा बहुत ही आनंदमयी एवं रोमांच पैदा कर देने वाली थी। यहां की वनस्पति, वन्यजीव तथा नैसर्गिक सौन्दर्य मंत्र मुग्ध कर देने वाले थे । 18 तारीख की शाम होते-होते हम झारखंडके देवघर स्थित महादेव के वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग पहुंच चुके थे। रात्रि विश्राम के पश्चात 19 तारीखको सुबह लगभग 4:00 बजे बाबा बैद्यनाथ के दर्शन के लिए हम चल पड़े।
वैद्यनाथ मन्दिर भारतवर्ष के झारखण्ड राज्य के देवघर नामक स्थान में अवस्थित एक प्रसिद्ध मंदिरहै। शिव का एक नाम 'बैद्यनाथ भी है, इस कारण लोग इसे 'वैद्यनाथ धाम' भी कहते हैं। यह एकसिद्धपीठ है। इस कारण इस लिंग को "कामना लिंग" भी कहा जाता हैं।
देवघर में शिव का अत्यन्त पवित्र और भव्य मन्दिर स्थित है। हर वर्ष सावन के महीने में स्रावण मेलालगता है जिसमें लाखों श्रद्धालु "बोल-बम!" "बोल-बम!" का जयकारा लगाते हुए बाबा भोलेनाथके दर्शन करने आते हैं। ये सभी श्रद्धालु अजगैबीनाथ मंदिर , सुल्तानगंज से पवित्र गंगा का जललेकर लगभग सौ किलोमीटर की अत्यन्त कठिन पैदल यात्रा कर बाबा को जल चढाते हैं। मन्दिर केसमीप ही एक विशाल तालाब भी स्थित है। बाबा बैद्यनाथ का मुख्य मन्दिर सबसे पुराना है जिसकेआसपास अनेक अन्य मन्दिर भी बने हुए हैं। बाबा भोलेनाथ का मन्दिर माँ पार्वती जी के मन्दिर सेजुड़ा हुआ है।
इस लिंग की स्थापना का इतिहास यह है कि एक बार असुरराज रावण ने हिमालय पर जाकरशिवजी की प्रसन्नता के लिये घोर तपस्या की और अपने सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ानेशुरू कर दिये। एक-एक करके नौ सिर चढ़ाने के बाद दसवाँ सिर भी काटने को ही था कि शिवजीप्रसन्न होकर प्रकट हो गये। उन्होंने उसके दसों सिर ज्यों-के-त्यों कर दिये और उससे वरदान माँगनेको कहा। रावण ने लंका में जाकर उस लिंग को स्थापित करने के लिये उसे ले जाने की आज्ञामाँगी। शिवजी ने अनुमति तो दे दी, पर इस चेतावनी के साथ दी कि यदि मार्ग में इसे पृथ्वी पर रखदेगा तो वह वहीं अचल हो जाएगा। अन्ततोगत्वा वही हुआ। रावण शिवलिंग लेकर चला पर मार्ग मेंएक चिताभूमि आने पर उसे लघुशंका निवृत्ति की आवश्यकता हुई। रावण उस लिंग को एक व्यक्तिको थमा लघुशंका-निवृत्ति करने चला गया। इधर उन व्यक्ति ने ज्योतिर्लिंग को बहुत अधिक भारीअनुभव कर भूमि पर रख दिया। फिर क्या था, लौटने पर रावण पूरी शक्ति लगाकर भी उसे न उखाड़सका और निराश होकर मूर्ति पर अपना अँगूठा गड़ाकर लंका को चला गया। इधर ब्रह्मा, विष्णुआदि देवताओं ने आकर उस शिवलिंग की पूजा की। शिवजी का दर्शन होते ही सभी देवी देवताओंने शिवलिंग की वहीं उसी स्थान पर प्रतिस्थापना कर दी और शिव-स्तुति करते हुए वापस स्वर्ग कोचले गये। जनश्रुति व लोक-मान्यता के अनुसार यह वैद्यनाथ-ज्योतिर्लिग मनोवांछित फल देने वालाहै।
यहाँ पर शिव दर्शन के लिए भक्तों का ताँता लगा रहता है। भीड़ ज़्यादा होने के कारण हमारे दल कोदर्शन करने में लगभग दो या तीन घंटे का समय लग गया। इसके उपरांत हमारा अगला पड़ाव थावैद्यनाथ से लगभग 42 किलोमीटर दूर वासुकीनाथ।
सुबह का भोजन करने के उपरांत हमारा दल वासुकीनाथ के लिए चल पड़ा और दोपहर बाद हमसभी वासुकीनाथ पहुँच गए हैं यहाँ मंदिर यहाँ का एक प्रसिद्ध मंदिर है तथा बिलकुल वैद्यनाथ मंदिरकी तर्ज़ पर यह बना हुआ है।
वासुकिनाथ अपने शिव मन्दिर के लिये जाना जाता है। वैद्यनाथ मन्दिर की यात्रा तब तक अधूरीमानी जाती है जब तक वासुकिनाथ में दर्शन नहीं किये जाते। (यह मान्यता हाल फ़िलहाल मेंप्रचलित हुई है। पहले ऐसी मान्यता का प्रचलन नहीं था। न ही पुराणों में ऐसा वर्णन है।) यह मन्दिरदेवघर से 42 किलोमीटर दूर जरमुण्डी गाँव के पास स्थित है। यहाँ पर स्थानीय कला के विभिन्नरूपों को देखा जा सकता है। इसके इतिहास का सम्बन्ध नोनीहाट के घाटवाल से जोड़ा जाता है।वासुकिनाथ मन्दिर परिसर में कई अन्य छोटे-छोटे मन्दिर भी हैं।
आज शाम को हमारा पड़ाव वासुकीनाथ में ही था तथा हमने यहाँ के छोटे से बाज़ार में ख़रीददारीका आनंद उठाया। मन में इस बात का सुकून था कि इस बहुत लंबी और भव्य यात्रा के दौरान हमनेमहादेव के द्वितीय ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर दिए थे।
लायक राम शर्मा
शिमला।
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