09-12-2023
चित्रकूट की अनुपम और अलौकिक सुंदरता का वर्णन करना शब्दों में संभव नहीं है। चित्रकूट मंदाकिनी नदी के किनारे पर बसा भारत के सबसे प्राचीन तीर्थस्थलों में से एक है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में 38.2 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला शांत और सुन्दर चित्रकूट प्रकृति और ईश्वर की अनुपम देन है। चारों ओर से विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं और वनों से घिरे चित्रकूट को अनेक आश्चर्यो की पहाड़ी कहा जाता है। मंदाकिनी नदी के किनार बने अनेक घाट विशेष कर रामघाट और कामतानाथ मंदिर में पूरे साल श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। अमावस्या के दिन का यहाँ विशेष महत्व माना जाता है। माना जाता है कि भगवान राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ अपने वनवास के चौदह वर्षो में ग्यारह वर्ष चित्रकूट में ही बिताए थे। इसी स्थान पर ऋषि अत्रि और सती अनसुइया ने ध्यान लगाया था। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने चित्रकूट में ही सती अनसुइया के घर जन्म लिया था। यहाँ इसी जिले से सटा हुआ एक स्थान राजापुर है जहाँ कुछ लोग तुलसीदासजी का जन्म स्थान बताते हैं। यहीं रामचरितमानस की मूल प्रति भी रखी हुई है।
यहां सर्वप्रथम हम सती अनसूया के आश्रम पहुंचे। स्फटिक शिला से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर घने वनों से घिरा यह एकान्त आश्रम स्थित है। इस आश्रम में अत्रि मुनी, अनुसुइया, दत्तात्रेय और दुर्वासा मुनि की प्रतिमा स्थापित हैं। इस आश्रम के ठीक सामने गर्म पानी का एक बहुत विशालकाय कुंड है जिसमें हम सभी ने स्नान किया और मंदिर पहुंचकर माता अनुसूया के दर्शन किए।
इसके पश्चात हमारा यात्री दल गुप्त गोदावरी के दर्शन के लिए रवाना हो गया। नगर से 18 किलोमीटर की दूरी पर गुप्त गोदावरी स्थित हैं। यहाँ दो गुफाएँ हैं। एक गुफा चौड़ी और ऊँची है। प्रवेश द्वार संकरा होने के कारण इसमें आसानी से नहीं घुसा जा सकता। गुफा के अंत में एक छोटा तालाब है जिसे गोदावरी नदी कहा जाता है। दूसरी गुफा लंबी और संकरी है, जिससे हमेशा पानी बहता रहता है। कहा जाता है कि इस गुफा के अंत में राम और लक्ष्मण ने दरबार लगाया था।
गुप्त गोदावरी के दर्शन के पश्चात हम मंदाकिनी नदी के दर्शन के लिए चल पड़े। इस नदी पर अनेक घाट बने हुए हैं। यहां का सबसे प्रसिद्ध घाट रामघाट है।
राम घाट वह घाट है जहाँ प्रभु राम नित्य स्नान किया करते थे l इसी घाट पर राम भरत मिलाप मंदिर है। इसी घाट पर गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रतिमा भी है l मंदाकिनी नदी के तट पर बने रामघाट में अनेक धार्मिक क्रियाकलाप चलते रहते हैं। घाट में गेरूआ वस्त्र धारण किए साधु-सन्तों को भजन और कीर्तन करते देख बहुत अच्छा महसूस होता है। शाम को होने वाली यहां की आरती मन को काफी सुकून पहुँचाती है।
हमने भरत मंदिर पहुंचकर महात्मा भरत के दर्शन किए।
चित्रकूट भगवान राम की कर्म भूमि रही है और अपने वनवास के लगभग 11 वर्ष उन्होंने इसी स्थान पर बिताये थे। सचमुच सदियों पुरानी भगवान राम की यादों को आप आज भी उस मिट्टी में महसूस करते हैं। हमारा आज का रात्रि विश्राम भी चित्रकूट में ही होना था। इसलिए इस स्थान को निहारने का, इसको समझने का हमें और अधिक समय मिल गया।
आज का दिन सचमुच में काफी व्यस्त रहा क्योंकि चित्रकूट काफी व्यापक और फैला हुआ क्षेत्र है और यहां पर उपरोक्त वर्णित स्थानों के अतिरिक्त भी बहुत सारे धार्मिक महत्व के स्थल हैं। दिनभर हम अलग-अलग धार्मिक महत्व के स्थानों को घूमते रहे। शाम के भोजन से पहले जैसे ही सभी यात्री संध्याकालीन आरती एवं भजन के लिए एकत्रित हुए तो एकता तीर्थ यात्रा संगम के संचालक आदरणीय सुरजीत राम शर्मा जी ने अपने वक्तव्य में एक दुखद जानकारी साझा की। आज के दिन हमारे दल के एक साथी हम सभी को छोड़कर विष्णु लोक चले गए थे। यह समाचार सुनते ही हम सभी में शोक की लहर दौड़ गई। कुछ समझ नहीं आ रहा था। हालांकि भगवान राम की उस कर्मस्थली पर किसी का विष्णु धाम चले जाना अपने आप में सौभाग्य है, लेकिन हम सभी के लिए व्यथित कर देने वाला था।
लायक राम शर्मा
शिमला
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