08-12-2023
8 दिसंबर की प्रातः हमारा यात्री दल "एकता तीर्थ यात्रा संगम सुंदर नगर" के बैनर तले अयोध्या से प्रयागराज (इलाहाबाद) के लिए रवाना हुआ। अयोध्या से यह सफर लगभग 3 घंटे का है। भोर की प्रथम किरण के साथ हम प्रयागराज पहुंच गए। प्रयागराज, जिसका भूतपूर्व नाम इलाहाबाद था, उत्तर प्रदेश का प्रमुख नगर है। यह प्रयागराज ज़िले का मुख्यालय है और हिन्दुओं का एक मुख्य तीर्थस्थल है। हिन्दू धर्मग्रन्थों में वर्णित प्रयाग स्थल पवित्रतम नदी गंगा और यमुना के संगम पर स्थित है। यहीं सरस्वती नदी गुप्त रूप से संगम में मिलती है, अतः यह त्रिवेणी संगम कहलाता है, जहां प्रत्येक बारह वर्ष में कुंभ मेला लगता है। यहाँ हर छह वर्षों में अर्द्धकुम्भ और हर बारह वर्षों पर कुम्भ मेले का आयोजन होता है जिसमें विश्व के विभिन्न कोनों से करोड़ों श्रद्धालु पतितपावनी गंगा, यमुना और सरस्वती के पवित्र त्रिवेणी संगम में आस्था की डुबकी लगाने आते हैं।
अतः इस नगर को संगमनगरी, कुंभनगरी, तंबूनगरी आदि नामों से भी जाना जाता है। प्रयागराज के पास मुगल बादशाह अकबर ने एक किला बनवाया और बस्ती बसायी जिसका नाम इलाहबाद रखा। बाद मे प्रयाग राज और इलाहबाद एक ही नाम से जाने जाने लगे। अक्टूबर 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसका नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया।
हिन्दू मान्यता अनुसार, यहां सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने सृष्टि कार्य पूर्ण होने के बाद प्रथम यज्ञ किया था। शाब्दिक अर्थ के अनुसार 'प्र'अर्थात् प्रथम और 'याग' अर्थात् यज्ञ से मिलकर प्रयाग बना। उस स्थान का नाम प्रयाग पड़ा जहाँ भगवान श्री ब्रह्मा जी ने सृष्टि का सबसे पहला यज्ञ सम्पन्न किया था। इस पावन नगरी के अधिष्ठाता भगवान श्री विष्णु स्वयं हैं और वे यहाँ वेणीमाधव रूप में विराजमान हैं। भगवान के यहाँ बारह स्वरूप विद्यमान हैं जिन्हें 'द्वादश माधव' कहा जाता है। यह पावन नगरी सबसे बड़े हिन्दू सम्मेलन महाकुंभ की चार स्थलियों में से एक है, शेष तीन हरिद्वार, उज्जैन एवं नासिक हैं।
सर्वप्रथम हम सभी ने त्रिवेणी संगम में आस्था की डुबकी लगाई। तत्पश्चात संगम के नजदीक मुगलों द्वारा बनाए गए किले के अंदर अक्षयवट के दर्शन किए।
यहां के सबसे प्रसिद्ध हैं - बड़े हनुमान जी। संगम के निकट स्थित यह एक अद्भुत एवं अपने प्रकार का अनोखा मन्दिर है। इस मन्दिर में हनुमान जी की लेटी हुई प्रतिमा है और उनके दर्शनार्थ लोगों को सीढियों से उतर कर नीचे जाना पड़ता है। यह प्रतिमा अत्यन्त विशाल एवं भव्य है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि अंग्रेज़ी शासन ने इस मंदिर को यहाँ से हटवाने के आदेश दिये, किन्तु जैसे-जैसे मूर्ति को हटाने के लिये खुदाई की जाने लगी; वैसे वैसे मूर्ति बाहर आने के बजाय अन्दर धंसती गयी। यही कारण हैं कि यह मंदिर गड्ढे में है। इस मंदिर में बजरंगबली जी के बहुत विशालकाय एवं अलौकिक विग्रह हैं।
भक्ति रस से सराबोर पूरा यात्री दल दोपहर के भोजन के पश्चात् चित्रकूट की तरफ रवाना हो गया। आज का रात्रि ठहराव चित्रकूट में होना था तथा सायं की बेला तक हम चित्रकूट में अपने गंतव्य पर पहुंच चुके थे।
लायक राम शर्मा
शिमला।
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